भारतीय न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को लेकर आम आदमी के मन में हमेशा से एक गहरी उलझन रही है। कानून की किताबों में लिखा है कि न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है, यानी वह अमीर-गरीब, बड़े-छोटे, मशहूर-गुमनाम सबको एक तराजू पर तौलती है।
लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इस आदर्श की धज्जियां उड़ाती नजर आती है। जब कोई आरोपी समाज में लोकप्रिय हो, उसके पीछे लाखों अनुयायियों की भावनाएँ जुड़ी हों और उसकी जेब में महंगे वकीलों की फौज खड़ी करने की ताकत हो, तो अदालत का रुख भी कई बार उस सामान्य आरोपी से एकदम अलग दिखाई देता है, जो न तो मशहूर है और न जिसके पास साधन हैं। पटना में 2 जून की घटना ने इस पूरे सवाल को एक बार फिर ताजा कर दिया,
जब कदमकुआं थाना क्षेत्र में स्थित ज्ञान बिंदु जी.एस. एकेडमी और खान सर के कोचिंग संस्थान के बीच विवाद हुआ, मारपीट हुई और फायरिंग भी हुई। इस पूरे मामले में पटना जिला न्यायालय ने चर्चित शिक्षाविद और लाखों छात्रों के बीच लोकप्रिय शिक्षक खान सर की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी।
खान सर की ओर से उनके वकील अरविंद मउआर ने पटना के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश रूपेश देव की अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत देते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया।
दूसरी ओर, उसी मामले में एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आई। ज्ञान बिंदु एकेडमी के निदेशक रौशन आनंद की जमानत याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी और वे फिलहाल जेल में बंद हैं। इसी मामले में जेल में बंद खान सर के दो सुरक्षा गार्ड दीपक कुमार और तालेबर सिंह की नियमित जमानत याचिका पर भी सुनवाई हुई और उनका मामला अभी लटका हुआ है।
यानी जो लोग कह रहे थे कि उन्होंने खान सर के कहने पर हवा में गोली चलाई, वे जेल की सलाखों के पीछे हैं और जो व्यक्ति उन पर आरोप लगा रहे थे, वह न्यायालय से संरक्षण पाकर आजाद घूम रहे हैं।
यह विरोधाभास सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है। भारतीय न्यायिक इतिहास में ऐसे अनेक प्रकरण दर्ज हैं, जहाँ आरोपी की सामाजिक हैसियत, उसकी लोकप्रियता या उसकी आर्थिक ताकत ने न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित किया। वर्ष 2002 में सलमान खान पर काले हिरण के शिकार का मामला चला।
दशकों तक चले इस मुकदमे में राजस्थान की निचली अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे पलट दिया। इस पूरे दौर में यह बात किसी से छुपी नहीं थी कि एक मशहूर अभिनेता को कोई साधारण व्यक्ति जैसी परेशानी नहीं उठानी पड़ी। जमानत तत्काल मिली, सुनवाई टलती रही और आखिरकार वे बरी हो गए।
इसी तरह संजय दत्त के हथियार मामले में भी कई दशकों तक न्यायिक प्रक्रिया चली। जेल में समय बिताया जरूर, लेकिन हर मोड़ पर कानूनी राहत मिलती रही। राजनीतिक रसूख वाले आरोपियों का किस्सा तो और भी लंबा है।
लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में दोषी ठहराए गए, किंतु उनकी बीमारी और अन्य आधारों पर बार-बार जमानत मिलती रही। जगन मोहन रेड्डी पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में गिरफ्तारी हुई, लेकिन उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई और बाद में वे मुख्यमंत्री बन गए। इन सब में एक धागा, जो एक-सा नजर आता है, वह है बड़े और दिग्गज वकीलों की भूमिका।
भारत में कानूनी पेशे की एक कड़वी सच्चाई यह है कि न्यायालय में बहस के कौशल के साथ-साथ वकील का नाम, उसका रुतबा और संबंध भी उतने ही अहम हो जाते हैं। जब कोई बड़ा वकील किसी मामले में पैरवी करता है, तो अदालत का माहौल ही बदल जाता है।
उसकी दलीलें उसी तथ्य को एक नए कोण से प्रस्तुत करती हैं, जिसे एक साधारण वकील शायद ढंग से कह भी नहीं पाता। वह जमानत की पात्रता, धाराओं की प्रकृति, पूर्व के न्यायिक निर्णयों और संविधान के प्रावधानों को इस प्रकार पिरोता है कि न्यायाधीश के सामने उसका मुवक्किल निर्दोष नहीं तो कम से कम संदेह के दायरे में जरूर आ जाता है।
खान सर के मामले में भी उनके वकील ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि पुलिस ने दबाव बनाने के लिए हत्या के प्रयास और शस्त्र अधिनियम जैसी गंभीर धाराएँ लगाई हैं और घटना में कोई व्यक्ति गोली लगने से घायल नहीं हुआ। यह तर्क कितना सफल रहा, यह अदालत के आदेश से साफ हो गया।
बड़े वकीलों का दबाव केवल दलीलों तक सीमित नहीं होता। कई बार यह दबाव प्रक्रियागत चालाकी के रूप में सामने आता है। सुनवाई को टालना, नई याचिकाएँ दाखिल करना, एक के बाद एक उच्च न्यायालयों में जाना और अंततः उच्चतम न्यायालय तक पहुँचना, ये सब वे औजार हैं जिनका इस्तेमाल कर बड़े मुकदमों में समय खरीदा जाता है।
जब तक मुकदमा चलता रहता है, आरोपी या तो जमानत पर बाहर रहता है या फिर जेल में भी वे सुविधाएँ हासिल कर लेता है, जो एक साधारण कैदी की कल्पना से परे होती हैं। इसके अलावा, प्रसिद्ध वकीलों के पास न्यायपालिका के भीतर के अनौपचारिक संबंध भी होते हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि न्यायाधीश खरीदे जाते हैं, क्योंकि ऐसा प्रमाण बिरला ही मिलता है, किंतु एक अनुभवी न्यायविद यह जरूर जानता है कि कौन-सी अदालत, कौन-सा पीठ और कौन-सा दिन उसके मुवक्किल के लिए अनुकूल हो सकता है।
आम आदमी जब इन सब बातों को देखता है, तो उसके मन में न्याय के प्रति आस्था डगमगाने लगती है। वह देखता है कि एक सुरक्षा गार्ड, जो किसी के आदेश पर काम कर रहा था, जेल में है।
एक संस्थान का निदेशक, जिसने शायद इसी तरह का काम किसी और के इशारे पर किया हो, जेल में है। लेकिन जो व्यक्ति इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है और जिसके सुरक्षाकर्मियों ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने उसके कहने पर हथियार चलाए, वह न्यायालय के संरक्षण में आजाद है।
यह दोहरापन न्यायिक व्यवस्था की उस बड़ी कमजोरी को उजागर करता है, जिसे सुधारने की बात हर दशक में होती है, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदलता। न्याय का सिद्धांत कहता है कि संदेह का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए। अग्रिम जमानत का प्रावधान इसीलिए बना है ताकि किसी निर्दोष को बिना कारण जेल की यातना न भोगनी पड़े।
किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यही प्रावधान चुनिंदा लोगों के लिए ढाल बन जाता है और बाकी सब उसी कानून की तलवार के नीचे खड़े रहते हैं। जब तक न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं आएगी, जब तक गरीब और अमीर आरोपी के बीच का फर्क अदालत के भीतर भी मिटाया नहीं जाएगा, तब तक भारत की न्याय प्रणाली आम आदमी के लिए टेढ़ी खीर ही बनी रहेगी।



