चेहरा स्कैन करती पुलिस, सिमटती प्राइवेसी और लोकतंत्र का भविष्य: AI के दौर में कानून बनाम नागरिक स्वतंत्रता
लेखक: राजकुमार अग्रवाल
पुलिस की तकनीक, फेशियल रिकग्निशन, अपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम और संवैधानिक अधिकार
सड़कों पर AI स्कैनिंग और उठते बड़े सवाल
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और खबरों में एक वीडियो काफी चर्चा में रहा है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि रात में गश्त कर रहे पुलिसकर्मी एक आम इंसान को रोकते हैं, उसका नाम पूछते हैं और फिर अपने मोबाइल ऐप से उसका चेहरा स्कैन करते हैं। कुछ ही सेकंड में उस इंसान का नाम, पिता का नाम, उम्र, घर का पता और पुराना आपराधिक रिकॉर्ड (अगर कोई हो) स्क्रीन पर आ जाता है। पुलिस अधिकारी अपने साथी कर्मचारियों को समझाते हैं कि इस तकनीक की मदद से संदिग्धों और भागे हुए अपराधियों को तुरंत पकड़ा जा रहा है।
भूमिका और घटना से जुड़े उप-शीर्षक (Introductory / Event)
सड़कों पर AI का पहरा: कैसे काम करती है यह तकनीक?
रात की गश्त और ऑन-द-स्पॉट चेहरा स्कैनिंग
एक क्लिक में पूरा रिकॉर्ड: क्या है यह मोबाइल ऐप?
पहली नज़र में तो यह पुलिस व्यवस्था को बेहतर और हाई-टेक बनाने का अच्छा तरीका लगता है। लेकिन जब इसे हमारे संविधान, नागरिकों के अधिकारों और निजता (प्राइवेसी) की नज़र से देखा जाए, तो कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या पुलिस को अधिकार है कि वह सड़क पर चलते किसी भी व्यक्ति को रोककर उसका चेहरा या बायोमेट्रिक डेटा स्कैन करे? यह कानून कब और किसने बनाया? क्या यह तरीका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले प्राइवेसी के हक का उल्लंघन है? यह लेख इन्हीं सब सवालों का आसान और सटीक जवाब देता है।

यह कौन सा कानून है और इसे किसने पास किया?
सड़क पर पुलिस द्वारा की जा रही इस डिजिटल जांच और चेहरा स्कैन करने का मुख्य कानूनी आधार केंद्र सरकार का ‘अपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022’ (Criminal Procedure (Identification) Act, 2022) है।
किसने पेश किया: इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में पेश किया था।
संसद की मंजूरी: मार्च-अप्रैल 2022 में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से यह पास हुआ और अप्रैल 2022 में राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली।
कब से लागू हुआ: गृह मंत्रालय के आदेश के मुताबिक यह कानून 4 अगस्त 2022 से पूरे देश में लागू हो गया।
पुराना कानून: इस नए कानून ने अंग्रेजों के ज़माने के 100 साल पुराने ‘बंदी पहचान अधिनियम, 1920’ की जगह ली।
निजता और नागरिक अधिकार (Privacy / Rights)
प्राइवेसी पर चोट? सुप्रीम कोर्ट का पुट्टास्वामी फैसला और अनुच्छेद 21आम नागरिकों में बढ़ता ‘चिलिंग इफेक्ट’ और डर का माहौल
सड़क पर स्वाभिमान की परीक्षा: बिना शक चेकिंग कितनी जायज?
तकनीकी बदलाव: पुराने कानून में सिर्फ फिंगरप्रिंट और लिखावट (Handwriting) लेने का नियम था। नए 2022 के कानून ने पुलिस को चेहरा पहचानने (Facial Recognition), आंखों की पुतली (Iris) स्कैन करने और बायोलॉजिकल सैंपल लेने की कानूनी छूट दे दी।
इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों की पुलिस अपने विशेष ऐप (जैसे यूपी में Trinetra App, राजस्थान में TRACE App या CCTNS सिस्टम) का इस्तेमाल करती है। ये ऐप सीधे गृह मंत्रालय के CCTNS और NATGRID के केंद्रीय डेटाबेस से जुड़े होते हैं।
पुलिस को चेहरा स्कैन करने का अधिकार कितना और किस सीमा तक है?
कानून के मुताबिक पुलिस को जांच के दौरान संदिग्धों की पहचान करने का हक है। 2022 के कानून की धारा 3 और धारा 4 पुलिस को इन लोगों का डेटा/स्कैन लेने की ताकत देती है:
दोषी साबित हो चुके लोग: जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है।
गिरफ्तार लोग: जिन्हें किसी गंभीर अपराध के सिलसिले में पकड़ा गया हो।
हिरासत में लिए गए लोग: जिन्हें शांति भंग करने या किसी आशंका के चलते हिरासत में लिया गया हो।
कोर्ट का आदेश: अगर जांच अधिकारी को किसी संदिग्ध की जांच करनी हो, तो वह मजिस्ट्रेट से इजाजत ले सकता है।
अधिकार की सीमा और इसका गलत इस्तेमाल:
कानून की असली मंशा के हिसाब से पुलिस सिर्फ उन्हीं लोगों का बायोमेट्रिक या फेस-स्कैन कर सकती है जो गिरफ्तार हैं, जिन पर केस (FIR) दर्ज है या जो किसी अपराध में संदिग्ध हैं।
सड़क पर आराम से चल रहे किसी भी आम नागरिक को—जिस पर न कोई एफआईआर है और न ही वह किसी अपराध में शामिल है—सिर्फ “रैंडम चेकिंग” के नाम पर रोककर चेहरा स्कैन करना कानून के गलत इस्तेमाल का सवाल खड़ा करता है। हालांकि, धारा 6 कहती है कि अगर कोई कानूनी रूप से मांगी गई जानकारी देने से मना करता है, तो इसे सरकारी काम में रुकावट (BNS की धारा 221) माना जा सकता है—लेकिन इसके लिए पुलिस का ऐसा मांगना कानून के दायरे में होना ज़रूरी है।
क्या यह प्राइवेसी, आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा है?
सड़कों और आम जगहों पर ऑटोमैटिक फेस-स्कैनिंग तकनीक का बिना रोक-टोक इस्तेमाल आम नागरिकों के अधिकारों के लिए काफी संवेदनशील है:
समाधान
सुरक्षा कवच या कड़ा पहरा? लोकतंत्र में संतुलन की ज़रूरतपारदर्शी SOP और कोर्ट की निगरानी ही असली समाधान
तकनीक का इस्तेमाल कानून के दायरे में ही मुमकिन
निजता का अधिकार (Right to Privacy)
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक ‘पुट्टास्वामी फैसले’ में साफ कहा था कि प्राइवेसी का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। कोर्ट ने इसके लिए 3 शर्तें रखी थीं:
कानूनी आधार: कार्रवाई के लिए स्पष्ट कानून होना चाहिए।
सही मकसद: मकसद देश की सुरक्षा या अपराध रोकना होना चाहिए।
सही दायरा (आनुपातिकता): पुलिस की कार्रवाई सिर्फ उतनी ही होनी चाहिए जितनी बेहद ज़रूरी हो।
बिना किसी वजह या शक के सड़क चलते आम इंसान का चेहरा स्कैन करके नेशनल डेटाबेस से मिलाना सुप्रीम कोर्ट के इन नियमों के खिलाफ जा सकता है।
आजादी से घूमने पर दिमागी असर (Chilling Effect)
जब लोगों को यह लगने लगता है कि सड़क पर चलते हुए उनकी हर गतिविधि और चेहरा बिना उनकी मर्जी के पुलिस डेटाबेस में ट्रैक हो रहा है, तो इसे समाज में “चिलिंग इफेक्ट” कहते हैं। इससे लोग डर के माहौल में जीने लगते हैं और संविधान से मिली खुलकर घूमने और बोलने की आजादी पर एक अनजाना दबाव बन जाता है।
AI की गलतियां और गलत पहचान
तकनीकी विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक, चेहरा पहचानने वाले सॉफ्टवेयर 100% सही नहीं होते। कम रोशनी, चश्मा, दाढ़ी या गलत एंगल की वजह से AI कभी-कभी गलत पहचान (False Positive) बता देता है। अगर AI की गलती से किसी बेकसूर आम इंसान को पुराने अपराधी के रूप में दिखा दिया जाए, तो सड़क पर उसकी जो बेइज्जती होगी, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
डेटा की सुरक्षा का डर
देश में ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023’ लागू तो है, लेकिन इसमें सरकारी और जांच एजेंसियों को काफी छूट दी गई है। पुलिस और NCRB द्वारा इकट्ठे किए गए इस बड़े डेटा को कैसे सुरक्षित रखा जा रहा है और क्या इसका इस्तेमाल भविष्य में आम लोगों या विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए तो नहीं होगा—यह चिंता नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग लगातार उठा रहे हैं।
सुरक्षा और आजादी के बीच संतुलन का रास्ता
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज के दौर में अपराधियों और क्राइम से निपटने के लिए पुलिस को AI और आधुनिक तकनीक देना बहुत ज़रूरी है। गुमशुदा बच्चों को तलाशने, लावारिस शवों की पहचान करने और भागे हुए बड़े अपराधियों को पकड़ने में इस तकनीक ने काफी मदद की है।
लेकिन, तकनीक को आम जनता का ‘सुरक्षा कवच’ होना चाहिए, उनकी आजादी पर ‘कड़ा पहरा’ नहीं। एक मजबूत लोकतंत्र में सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन होना बेहद ज़रूरी है। इसके लिए ये कदम उठाए जाने चाहिए:
साफ और पारदर्शी नियम (SOP): पुलिस विभाग को सड़क पर मोबाइल से होने वाली फेस-स्कैनिंग के लिए साफ और सार्वजनिक नियम जारी करने चाहिए, ताकि आम लोगों को परेशान न होना पड़े।
कोर्ट की निगरानी: बिना वजह चेकिंग के बजाय सिर्फ पक्के शक, एफआईआर या कोर्ट की मंज़ूरी के बाद ही चेहरा या बायोमेट्रिक स्कैन किया जाए।
डेटा की सुरक्षा: पुलिस डेटाबेस की नियमित जांच होनी चाहिए ताकि यह पक्का हो सके कि बेकसूर नागरिकों के फोटो या डेटा हमेशा के लिए सर्वर पर जमा न रहें।
कानून का मान और पुलिस का डर तभी तक बना रह सकता है जब तक तकनीक का इस्तेमाल कानून के दायरे में और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हुए किया जाए।

