दिल्ली लाठीचार्ज से देर रात के समझौते तक: छात्रों को इंसाफ मिला या हाथों में थमा दिया गया झुनझुना?
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर संसद के गलियारों तक 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच जो कुछ घटा, वह देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक और तीखा सबक दर्ज कर गया। सड़कों पर उतरते नौजवान, पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज, लहुलूहान होते छात्र-छात्राएं, बैकफुट पर आई सरकार और आखिरकार देर रात का एक ऐसा समझौता, जिस पर अब देश के हर सजग नागरिक को सोचना पड़ रहा है। क्या छात्रों की जायज़ मांगों पर वाकई इंसाफ हुआ है या फिर हर बार की तरह इस बार भी युवाओं के हाथ में सिर्फ एक और सियासी ‘झुनझुना’ थमा दिया गया है?
20 जुलाई को CJP के हजारों छात्र जंतर-मंतर से संसद की तरफ मार्च करने निकले। मांग साफ थी – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा घोटालों की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार। पुलिस ने मार्च रोकने की कोशिश की। लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़ी गई। युवा लड़के-लड़कियां, कुछ तो नाबालिग, घायल हो गए। वीडियो वायरल हुए – लाठियां पड़ती हुई, छात्रों के सिर फटे हुए, लड़कियों पर भी मार।
दिल्ली पुलिस पर आरोप लगा कि सादे कपड़ों में पुलिस वाले भी लाठी चला रहे थे। विपक्ष ने इसे “फासीवादी दमन” कहा। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, अमित शाह ने खुद दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई को “कायराना” बताया। शायद आंतरिक कलह, या फिर जन-गुस्से को शांत करने की कोशिश।
इस घटना ने पूरे देश में आग लगाई। मुंबई, बेंगलुरु, पटना, लखनऊ – हर जगह छात्र सड़कों पर आए। “कॉकरोच” का प्रतीक युवाओं के बीच वायरल हो गया – छोटा, लेकिन जिद्दी और हर जगह फैलने वाला।21 से 24 जुलाई तक जंतर-मंतर पर धरना जारी रहा। बारिश में भी छात्र डटे रहे। टेंट हटाए गए, स्टेज तोड़ा गया, लेकिन आंदोलन थमा नहीं।
विपक्षी नेता भी समर्थन में आए। यह सिर्फ NEET लीक का मुद्दा नहीं रह गया था। युवा पूछ रहे थे – क्यों हर साल पेपर लीक होता है? क्यों NTA (National Testing Agency) पर कोई लगाम नहीं? क्यों मेरिट की बलि चढ़ाई जा रही है?
आरक्षण के नाम पर जनरल कैटेगरी के छात्रों में गुस्सा भी था, लेकिन मुख्य मुद्दा शिक्षा की विश्वसनीयता का था। इस कायराना हरकत की आग देखते ही देखते देश भर के विश्वविद्यालयों और सड़कों तक फैल गई। गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल तक और बिहार से लेकर तमिलनाडु तक नौजवान सड़कों पर उतर आए।
गृह मंत्रालय के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस की इस नाकामी और पुलिसिया बर्बरता ने केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया। माहौल इतना गरमा गया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा तक देना पड़ा। यह इस्तीफ़ा किसी नैतिक ज़िम्मेदारी का नतीजा कम, और भड़कते जनआक्रोश को शांत करने की एक सियासी मजबूरी अधिक नज़र आता है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा हैरान करने वाला दृश्य था सत्ता के शीर्ष नेतृत्व का रवैया। एक तरफ सड़कों पर छात्र खून बहा रहे थे, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधी रात को जारी एक ‘रील’ वीडियो ने आग में घी डालने का काम किया। संकट के उस दौर में, जब देश का भविष्य अस्पतालों में पट्टियाँ बंधवा रहा था, तब सोशल मीडिया पर आधी रात को प्रचार सामग्री या रील बनाकर जनता के सामने आना किस संवेदनशीलता को दर्शाता है? उस वीडियो में किए गए बड़े-बड़े दावों और लच्छेदार बातों में क्या वास्तव में छात्रों के दर्द का मरहम था, या फिर सिर्फ अपनी छवि को बचाने का एक और जनसंपर्क (PR) हथकंडा?
जब विरोध का पारा अनियंत्रित होने लगा, तो आनन-फानन में केंद्र सरकार ने छात्र प्रतिनिधियों को बातचीत की मेज पर बुलाया और एक ‘ऐतिहासिक समझौते’ की घोषणा कर दी गई। कागज़ों पर कुछ आश्वासन दिए गए, एक जांच समिति के गठन की बात कह दी गई और आंदोलन को स्थगित करा दिया गया।

पर असली सवाल यही है: क्या यह समझौता कोई समाधान है या सिर्फ एक और झुनझुना?
यदि निष्पक्षता से विश्लेषण करें, तो सत्ता की कूटनीति के आगे एक बार फिर छात्र राजनीति भोली साबित हुई है। इस पूरे समझौते का लब्बोलुआब यह है कि सरकार ने तात्कालिक तौर पर सड़कों से भीड़ को हटा दिया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तो हो गया, लेकिन जो बुनियादी ढांचा इस बदहाली के लिए जिम्मेदार है, उसमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं हुआ। पुलिस की उस कायराना लाठीचार्ज के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डालने की नींव रख दी गई है।
तथ्य यह है कि आज भी सत्ता के समीकरण और फैसले लेने की असली चाबी यानी ‘लड्डू’ नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के हाथों में ही है। सरकार जब चाहे जांच समितियों के नाम पर समय टाल सकती है, और कुछ महीनों बाद जब सड़कों का शोर थम जाएगा, तब यह समझौता महज़ एक फाइल बनकर रद्दी की टोकरी में पड़ा मिलेगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी जन-आंदोलन को सिर्फ ‘आश्वासन की घुट्टी’ पिलाकर शांत किया गया है, परिणाम कभी छात्रों या आम जनता के पक्ष में नहीं निकले।
आधी रात की रील में बोले गए मीठे शब्द और ‘युवा-शक्ति’ के गुणगान केवल एक नैरेटिव गढ़ने का जरिया थे। वास्तविक राहत तब होती जब पुलिस अधिकारियों पर मामला दर्ज होता, शिक्षा तंत्र का पारदर्शी पुनर्गठन होता और छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ फेंका जाता। लेकिन इसके बजाय, सरकार ने सिर्फ एक ‘डैमेज कंट्रोल’ की पटकथा लिखी, जिसमें मीडिया मैनेजमेंट था, इस्तीफे का नाटक था, और अंत में एक कागज़ी समझौता।
25 जुलाई की यह सुबह दिल्ली की सड़कों को भले शांत दिखा रही हो, लेकिन यह शांति स्थायी न्याय की शांति नहीं है। यह समझौता छात्रों की जीत कम और सत्ता की रणनीतिक चाल ज्यादा लगती है। जब तक ‘लड्डू’ पूरी तरह से जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के हाथ में नहीं आता, और निर्णय की ताकत सिर्फ एक चेहरे या सत्ता के केंद्र के पास केंद्रित रहती है, तब तक हर ऐसा समझौता केवल युवाओं को बहलाने के लिए थमाया गया एक चमकदार ‘झुनझुना’ ही साबित होगा। देश के छात्रों को यह समझना होगा कि आश्वासन से कभी भविष्य नहीं बदलता, भविष्य बदलता है ठोस नीतिगत बदलावों से—जिसका इस पूरे समझौते में अब भी दूर-दूर तक अकाल है।

