सत्ता का शिखर या लोकतंत्र का क्षरण: 2014 के बाद का भारत और नीतियों का सच | आलेख: राजकुमार अग्रवाल

आलेख : राजकुमार अग्रवाल
जब हुक्मरान अपनी जय-जयकार के शोर में इतने मसरूफ हो जाएं कि उन्हें सड़कों पर उठती सिसकियां और आक्रोश न सुनाई दे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ रहा है।”
भारतीय राजनीति के इतिहास में सत्ता का एक ही नियम रहा है—जब-जब जनादेश को निरंकुशता का लाइसेंस मान लिया गया, तब-तब जनता के सब्र का बांध टूटा है। संसद की ऊंची दीवारों के भीतर गूंजते भाषण और सड़कों पर गूंजते दमन के सन्नाटे के बीच की दूरी जब बढ़ने लगती है, तो सवाल केवल एक सरकार का नहीं रहता; सवाल पूरे तंत्र के अस्तित्व और उसकी मंशा का बन जाता है।
दमन की नीति और खामोश की जाती आवाजें
आज देश जिस दौर से गुजर रहा है, वहां विरोध के स्वर को ‘संवाद’ के जरिए हल करने के बजाय ‘ताकत’ के बल पर कुचलने की परिपाटी सी बन गई है। चाहे अपनी हक की मांग के लिए दूर-दराज से आए छात्र हों, अपनी फसलों के वाजिब दाम के लिए सड़कों पर डटे किसान हों, या अपनी रोजी-रोटी की असुरक्षा से जूझता मजदूर—हर किसी के हिस्से में समाधान की जगह पुलिस की लाठियां, वॉटर कैनन और आंसू गैस के गोले ही आते हैं।
जंतर-मंतर से लेकर राजधानी की सीमाओं तक, जनविरोधी नीतियों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘साजिश’ का ठप्पा लगाकर खारिज कर देना सत्ता की सबसे आसान रणनीति बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या तंत्र के इस डरावने बल प्रयोग से लोगों के पेट की भूख, बेरोजगारों की हताशा और नौजवानों का गुस्सा शांत हो जाएगा?
परीक्षा प्रणालियों का ढहता ढांचा और युवाओं का अनिश्चित भविष्य
आज देश का युवा सबसे बड़े असमंजस और आक्रोश के मुहाने पर खड़ा है। सालों की मेहनत, मां-बाप के खून-पसीने की कमाई और सुनहरे भविष्य के सपने जब एक ही झटके में पेपर लीक और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं, तो नौजवानों का भरोसा केवल परीक्षा संस्थाओं से नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र से उठ जाता है।
नीट (NEET) से लेकर राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं तक फैली अव्यवस्था यह साफ बयान करती है कि सत्ता की प्राथमिकता में युवाओं का भविष्य नहीं, बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी और जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना है। जवाबदेही तय करने के बजाय जब संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों को संरक्षण दिया जाने लगे, तो सड़कों पर आक्रोश का फूटना अनिवार्य हो जाता है।
गोदी मीडिया का पर्दाफाश और जन-सोशल मीडिया की ताकत
एक दौर था जब देश की मुख्यधारा मीडिया सरकार की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछती थी और जनभावनाओं को आवाज देती थी। आज स्थिति यह है कि टीवी चैनलों के चमचमाते स्टूडियो सत्ता के प्रवक्ता बनकर रह गए हैं। जनता की बदहाली, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलताओं को लीपापोती कर छिपाने का जो ‘नैरेटिव’ गढ़ा जाता है, वह अब दरकने लगा है।
लेकिन, सत्ता के इस प्रायोजित प्रचार तंत्र के सामने अब सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता एक नई ताकत बनकर उभरी है। सच्चाई को दबाने की जितनी कोशिशें की जाती हैं, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए वह उतनी ही तेजी से बेनकाब हो रही है। गोदी मीडिया का तिलिस्म अब टूट रहा है और आम नागरिक सीधे अपनी आंखों देखी हकीकत को दुनिया के सामने रख रहा है।
दरकती सत्ता और एकजुट होता जन-आक्रोश
इतिहास गवाह है कि जब-जब दमन का चक्र अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तब-तब समाज के विभिन्न वर्ग जो कल तक अलग-अलग थे, खुद-ब-खुद एक साझा मंच पर आने लगते हैं। आज छात्र, किसान, मजदूर और आम मध्यम वर्ग एक ही पीड़ा से गुजर रहे हैं—और वह पीड़ा है सत्ता की बेरुखी और नीतियों की विफलता।
पश्चिम से उठती किसान आंदोलन की गूंज हो, दिल्ली के मुहाने पर खड़े युवा हों या असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की छटपटाहट, ये तमाम घटनाएं अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखी जा सकतीं। यह उस अंदरूनी असंतोष का प्रस्फुटन है, जिसे सत्ता की विभाजनकारी राजनीति और आंकड़ों के मायाजाल से अब और अधिक समय तक ढका नहीं जा सकता।
क्या यह बदलाव की सुगबुगाहट है?
लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई नहीं होता। जब हुक्मरानों को यह गलतफहमी हो जाए कि वे अमर हैं और जनता का सब्र असीमित, तो इतिहास उन्हें बेदर्दी से आइना दिखाता है।
सड़कों पर उमड़ता यह जनसैलाब, लाठियों के आगे न झुकने वाला छात्रों का हौसला और व्यवस्था के खिलाफ उठते तीखे सवाल इस बात का साफ संकेत हैं कि अब चुप्पी टूट चुकी है। जो लीपापोती सालों से की जा रही थी, वह अब उखड़ रही है। अब देखना यह है कि सत्ता अपने अहंकार के बुर्ज पर ही बैठी रहेगी या वक्त की इस इबारत को पढ़कर जनतंत्र के वास्तविक मूल्यों की ओर लौटेगी?
(लेखक ‘दैनिक अटल हिंद’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

