आरएसएस: सौ साल का इतिहास, लेकिन रजिस्ट्रेशन का नामोनिशान नहीं! टैक्स का बोझ आम आदमी पर, बड़े संगठनों पर छूट?
आरएसएस का रजिस्ट्रेशन और टैक्स विवाद: क्या कानून के दायरे से बाहर है सबसे बड़ा संगठन?
जागो भारत, इससे पहले कि तुम्हारा हक भी किसी ‘टैक्स फ्री’ संस्था की भेंट चढ़ जाए!
सवाल जो झकझोरें
1-अगर आरएसएस इतना पारदर्शी और राष्ट्रभक्त है, तो रजिस्ट्रेशन और ऑडिट से क्या डर?
2-गुरुदक्षिणा के नाम पर जमा धन का इस्तेमाल कहां-कहां होता है? पब्लिक रिपोर्ट क्यों नहीं?
3-सहयोगी संगठनों (संगठन परिवार) की कुल संपत्ति कितनी? BJP, VHP, ABVP आदि मिलाकर प्रभाव कितना?
4-प्रधानमंत्री का “सबसे बड़ा NGO” बयान – क्या यह प्रमोशन नहीं?
5-क्या देश में दोहरी व्यवस्था चलेगी – एक आम आदमी के लिए, दूसरी प्रभावशाली संस्थाओं के लिए?
लेखक: राजकुमार अग्रवाल, सम्पादक, अटल हिन्द
दोस्तों, कल्पना कीजिए। आप हर महीने सैलरी से TDS कटवाते हो, घर की प्रॉपर्टी पर प्रॉपर्टी टैक्स भरते हो, हर चीज पर GST देते हो। छोटी दुकान चलाने वाला, रिक्शा चलाने वाला, किसान – सबका हिसाब-किताब सरकार के पास है। लेकिन एक ऐसा संगठन, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा वॉलंटियर ऑर्गनाइजेशन बताता है, सौ साल से चल रहा है, हजारों-लाखों एकड़ जमीन, करोड़ों की प्रॉपर्टी,
कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने हाल ही में इस बहस को फिर से छेड़ दिया। उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर पूछा – रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं? फंडिंग का हिसाब-किताब कहां है? टैक्स क्यों नहीं देते? जवाब में आरएसएस का राग अलापा गया – “हम बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स हैं, रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं, कानून का उल्लंघन नहीं किया।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती उसका ‘पारदर्शी’ होना है। एक ऐसा तंत्र जहाँ सत्ता, संस्थाएं और नागरिक—तीनों एक संविधान की परिधि में बंधे होते हैं। भारत का संविधान हमें यह सिखाता है कि कानून की निगाह में हर कोई बराबर है। लेकिन, जब हम इस आईने को अपने चारों ओर देखते हैं, तो एक भयावह धुंधलापन नजर आता है। एक तरफ आम आदमी है, जो अपनी मेहनत की कमाई का एक-एक पैसा टैक्स के रूप में चुकाता है, और दूसरी तरफ हैं वे ‘अदृश्य’ संगठन और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग, जिनके लिए कानून की परिभाषाएं शायद अलग हैं।
आज का यह सवाल केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक का है जो अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा देश के विकास में योगदान देता है। सवाल यह है: सौ साल का इतिहास रखने वाली आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) जैसी संस्थाएं कानून के दायरे से बाहर क्यों हैं? इनका वित्तीय लेखा-जोखा टैक्स की नजरों से दूर क्यों है? और क्या भारत का लोकतंत्र केवल आम आदमी के लिए ही जवाबदेही तय करता है?
कानून क्या कहता है? रजिस्ट्रेशन जरूरी है या नहीं?
भारत में कोई सामान्य कानून नहीं है जो हर नागरिक समूह को रजिस्टर होने को मजबूर करे। सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860, ट्रस्ट एक्ट, या कंपनियां एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन वैकल्पिक है। लेकिन स्केल बड़ा होने पर जवाबदेही बढ़ जाती है।
आरएसएस खुद को “बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स” कहता है। इसका मतलब – कोई लीगल एंटिटी नहीं, इसलिए इनकम टैक्स, FCRA, ऑडिट से बचाव। लेकिन सवाल उठता है – इतनी बड़ी संस्था कैसे प्रॉपर्टी खरीदती है, हेडक्वार्टर बनाती है (दिल्ली का 150 करोड़ का?), प्रचारक रखती है, स्कूल-कॉलेज चलाती है?
1970 के दशक में इनकम टैक्स विभाग ने गुरुदक्षिणा (स्वयंसेवकों का चंदा) पर टैक्स लगाने की कोशिश की। आरएसएस ने मुट्यूअलिटी का सिद्धांत दिया – “हम सदस्यों से ही लेते हैं, सदस्यों को ही देते हैं, इसलिए टैक्स नहीं।” पटना हाईकोर्ट ने 1994 में इसे मान लिया। लेकिन क्या यह छूट सिर्फ आरएसएस के लिए है? क्या कोई और संगठन भी यही दलील दे सकता है?
FCRA (विदेशी योगदान विनियमन कानून): विदेशी फंडिंग पर सख्ती है। लेकिन आरएसएस कहता है – हम विदेशी फंड नहीं लेते। फिर सहयोगी संगठन? विदेश में तो कई आरएसएस से जुड़े ग्रुप रजिस्टर्ड हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा NGO? किस आधार पर?
दुनिया का सबसे बड़ा NGO’ और उसके अनसुलझे राज
प्रधानमंत्री ने एक बार आरएसएस को ‘दुनिया का सबसे बड़ा NGO’ कहा था। यदि यह दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है, तो क्या इसकी पारदर्शिता का मानक भी दुनिया में सबसे ऊंचा होना चाहिए? लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है।
आरएसएस खुद को किसी सरकारी पंजीकरण (Registration) के दायरे से बाहर बताती है। उनका तर्क है कि उन्होंने कानून के विरुद्ध कुछ नहीं किया। लेकिन कानून केवल ‘अपराध न करने’ का नाम नहीं है, यह ‘उत्तरदायित्व’ निभाने का नाम भी है। एक ऐसा संगठन जिसके पास लाखों स्वयंसेवक हैं, जो देश की विचारधारा से लेकर राजनीति तक में अपनी गहरी पैठ रखता है, उसका यह कहना कि ‘हम सदस्य का रिकॉर्ड नहीं रखते’—यह आम आदमी के साथ एक भद्दा मजाक है।
क्या यह संभव है कि एक इतना विशाल तंत्र बिना किसी दस्तावेजी रिकॉर्ड के चल रहा हो? यदि कोई छोटा सा ट्रस्ट या एनजीओ भी भारत में काम करता है, तो उसे आयकर विभाग (Income Tax Department) के कड़े नियमों, धारा 12A और 80G के पचड़ों, और विदेशी चंदा नियमन अधिनियम (FCRA) के ऑडिट से गुजरना पड़ता है। तो फिर आरएसएस को यह छूट क्यों? क्या यह संस्था संविधान से ऊपर है?
क्या टैक्स सिर्फ आम आदमी की नियति है?
भारत का आयकर कानून कहता है कि जिसकी कमाई एक निश्चित सीमा से अधिक है, उसे टैक्स देना होगा। एक छोटे दुकानदार से लेकर एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी तक, हर कोई इस दायरे में आता है। फिर ऐसे ‘कथित’ सांस्कृतिक संगठनों की कमाई टैक्स-फ्री क्यों रहती है?
करोड़ों-अरबों का साम्राज्य, विशाल कार्यालय, बड़े-बड़े आयोजन—इनके पीछे का धन कहां से आता है? अगर यह दान है, तो उस दान का ऑडिट क्यों नहीं? पारदर्शिता क्यों नहीं? जब आम आदमी पेट्रोल खरीदने से लेकर आटा खरीदने तक पर टैक्स देता है, तो उसे यह जानने का पूरा अधिकार है कि इन बड़ी संस्थाओं को दी गई ‘टैक्स छूट’ का असली फायदा किसको मिल रहा है। यह छूट दरअसल उस आम आदमी की जेब से ही छीनी गई सब्सिडी है, जिसे शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाना चाहिए था।
तुलना:
राजनीतिक पार्टियां आयकर रिटर्न भरती हैं (हालांकि कुछ छूट)।
बड़े ट्रस्ट जैसे बिरला, टाटा – सब रजिस्टर्ड, ऑडिटेड।
छोटे NGO को FCRA के तहत हर साल रिपोर्टिंग।
फिर आरएसएस को विशेष छूट क्यों? फायदा किसको? स्वयंसेवकों को? या शीर्ष नेतृत्व को जो बिना जवाबदेही के प्रभाव चलाते हैं?
‘आरएसएस बनाम अन्य संस्थाएं’
| संस्था | रजिस्ट्रेशन | ऑडिट | टैक्स स्थिति |
| NGO/Trusts | अनिवार्य | अनिवार्य | शर्तों के साथ छूट |
| राजनीतिक पार्टियां | अनिवार्य | अनिवार्य | रिपोर्टिंग आवश्यक |
| RSS | वैकल्पिक (Body of Individuals) | निजी | मुट्यूअलिटी सिद्धांत |
आयकर कानून के तहत, ‘मुट्यूअलिटी का सिद्धांत’ यह मानता है कि कोई व्यक्ति स्वयं से लाभ नहीं कमा सकता। आरएसएस का तर्क है कि चूंकि धन स्वयंसेवकों से आता है और उन्हीं पर खर्च होता है, इसलिए यह ‘आय’ नहीं है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह सिद्धांत उन विशाल परिसंपत्तियों और व्यावसायिक गतिविधियों पर भी लागू होता है जो इस चंदे से खड़ी की गई हैं? यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता की मांग सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाती है।”
| मापदंड | आम ट्रस्ट/NGO | RSS (दावा) | आम आदमी के लिए सवाल |
| रजिस्ट्रेशन | अनिवार्य | वैकल्पिक (BOI) | क्या कानून सबके लिए बराबर नहीं? |
| ऑडिट | अनिवार्य (FCRA/IT) | निजी/आंतरिक | जनता को जानकारी क्यों नहीं? |
| संपत्ति | पब्लिक डोमेन में | संगठन के नाम/निजी | किसका है यह मालिकाना हक? |
वैश्विक स्तर पर, FATF (Financial Action Task Force) जैसे संगठन इस बात पर जोर देते हैं कि कोई भी बड़ी संस्था, चाहे वह धार्मिक हो या सांस्कृतिक, यदि बड़े पैमाने पर वित्तीय लेनदेन करती है, तो उसका ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए ताकि मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी फंडिंग पर नजर रखी जा सके।”
नेताओं की पेंशन और रियायतें: आम आदमी का गुस्सा
नेताओं की मौज: अपराधी भी पेंशनभोगी, और जनता?
आरएसएस की बात से अलग, यह बहस अधूरी है यदि हम उन जनसेवकों की बात न करें जो खुद को कानून से ऊपर मानते हैं। आज भारत में एक बार विधायक या सांसद बन जाने का मतलब है—जीवन भर की सुरक्षा और पेंशन। यह पेंशन उसे तब भी मिलती है जब वह जेल की सलाखों के पीछे हो।
आप देखिए, एक सामान्य सरकारी कर्मचारी को 30-40 साल की सेवा के बाद पेंशन मिलती है, और वह भी नई पेंशन स्कीम (NPS) के तहत। लेकिन नेताजी, जिन्होंने शायद एक बार विधानसभा का चेहरा देख लिया, वे जीवनभर के लिए खजाने पर बोझ बन जाते हैं। क्या यह लोकतंत्र है या सामंतवाद का नया संस्करण? जब जनता अपने बुढ़ापे के लिए दर-दर की ठोकरें खाती है, तब ये नेता सरकारी तिजोरी से अपनी पेंशन और रियायतें वसूलते हैं। यह अनाप-शनाप रियायतें इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था का निर्माण जनता के लिए नहीं, बल्कि खुद को बचाने और पालने के लिए किया गया है।
लोकतंत्र का संवैधानिक सच
हम जिस लोकतंत्र में जी रहे हैं, वहां ‘सेवक’ मालिक बन बैठा है और ‘जनता’ खैरात की आस में खड़ी है। अगर हम वाकई एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं, तो यह जरूरी है कि:
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समान कानून: सभी बड़े संगठनों, चाहे वे धार्मिक हों, सांस्कृतिक हों या राजनीतिक हों, उन्हें अनिवार्य पंजीकरण और ऑडिट के दायरे में लाया जाए।
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टैक्स पारदर्शिता: किसी को भी बिना उचित ऑडिट के टैक्स फ्री न रखा जाए। पारदर्शिता का मतलब यह नहीं कि वे कितना कमाते हैं, बल्कि यह है कि उस कमाई का स्रोत क्या है और खर्च कहाँ हो रहा है।
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पेंशन सुधार: जनप्रतिनिधियों की पेंशन प्रणाली पर पुनर्विचार हो। अपराधी छवि वाले नेताओं की सरकारी सुविधाएं तुरंत समाप्त होनी चाहिए।
टैक्स छूट का अर्थ
राजस्व हानि – सरकार को टैक्स कम मिलता है, आम आदमी पर बोझ।
भ्रष्टाचार और दुरुपयोग की गुंजाइश।
असमानता – बड़े संगठन मजबूत, छोटे दबे।
जवाबदेही की कमी से लोकतंत्र कमजोर।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी NGOs पर स्क्रूटनी बढ़ रही है। FATF गाइडलाइंस, विदेशी फंडिंग की जांच। भारत में भी FCRA सख्त हुआ है। लेकिन आरएसएस जैसे अपवाद क्यों?
बैमानों को जवाब दो
भारत लोकतंत्र है। यहां हर संस्था, चाहे कितनी भी पुरानी या शक्तिशाली, जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती। आरएसएस का सौ साल का इतिहास सम्मानजनक हो सकता है – अनुशासन, सेवा, राष्ट्रवाद की बात। लेकिन धुंधलापन खत्म होना चाहिए।
टैक्स सिर्फ आम आदमी नहीं, हर बड़े संगठन दे। पेंशन हर अपराधी नेता को नहीं, बल्कि सच्चे सेवकों को। रियायतें राष्ट्रहित में हों, न कि किसी खास विचारधारा को मजबूत करने के लिए।
प्रियांक खड़गे ने बहस छेड़ी। अब जनता को आगे बढ़ना चाहिए। RTI, PIL, जन-आंदोलन – सब हथियार इस्तेमाल हों। पारदर्शिता से ही विश्वास बनेगा
आरएसएस अगर सच में राष्ट्र का है, तो अपना हिसाब-किताब देश को दे।
नहीं तो यह सिर्फ सत्ता का सहारा बने रहेगा, जबकि आम आदमी टैक्स का बोझ ढोता रहेगा।
अब जागने का समय है
यह लेख किसी संस्था के प्रति विद्वेष नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार की मांग है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने अपनी संस्थाओं को जवाबदेह नहीं बनाया, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला होता चला गया। आरएसएस का अपना इतिहास जितना धुंधला है, देश का भविष्य उतना ही स्पष्ट होना चाहिए।
आम आदमी को यह समझना होगा कि जब तक वह सवाल नहीं पूछेगा, तब तक यह ‘अदृश्य तंत्र’ उसे लूटता रहेगा। ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वाले खुद अपनी ईमानदारी साबित क्यों नहीं करते? यह सवाल अब सड़कों से लेकर संसद तक गूंजना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ वोट डालना नहीं, बल्कि सत्ता और उससे जुड़े संगठनों को कटघरे में खड़ा करना भी है।
जागो भारत, इससे पहले कि तुम्हारा हक भी किसी ‘टैक्स फ्री’ संस्था की भेंट चढ़ जाए!
यह लेख किसी संस्था के प्रति विद्वेष नहीं, बल्कि ‘समान कानून’ की मांग है। यदि भारत में एक छोटे दुकानदार को ₹100 के टैक्स का हिसाब देना पड़ता है, तो राष्ट्र निर्माण का दावा करने वाली संस्थाएं अपना ‘वित्तीय घोषणा पत्र’ जारी करने से क्यों कतराती हैं? समय आ गया है कि हम ‘लोकतंत्र’ को केवल वोट तक सीमित न रखें, बल्कि उसे ‘पारदर्शिता’ के पैमाने पर भी तौलें।

