विरोध, पुलिस कार्रवाई और पासपोर्ट रद्द करने की अफवाहें: दिल्ली में प्रशासनिक कार्रवाई और संवैधानिक अधिकारों का सच
लेखक: राजकुमार अग्रवाल
सड़क से सोशल मीडिया तक फैला भ्रम
हाल के दिनों में देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक भावनात्मक और तनावपूर्ण दृश्य देखने को मिला। जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच तीखी बहस, गिड़गिड़ाते नागरिक और उन्हें समझाती-हटाती पुलिस के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए।
इस घटनाक्रम के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक खबर और सर्कुलर की तरह दावों की बाढ़ आ गई। यह दावा किया गया कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने एक विशेष आदेश जारी किया है, जिसके तहत उपद्रवियों और असामाजिक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया जाएगा और उन्हें 12 महीने तक के लिए सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाएगा।
इस खबर के सामने आते ही नागरिक समाज, छात्रों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में चिंता की लहर दौड़ गई। सवाल उठने लगे कि क्या देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर ताला लग रहा है? क्या पुलिस को यह अधिकार रातों-रात मिल गया है, या फिर यह कानून पहले से मौजूद था?
इस विशेष विश्लेषण में हम इन सभी सवालों के कानूनी, संवैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं की बिंदुवार और निष्पक्ष जांच करेंगे।
क्या सचमुच पासपोर्ट रद्द करने का नया आदेश आया है?
सच्चाई और अफवाह के बीच के अंतर को समझना बेहद आवश्यक है। जब इस दावे का गहराई से पुलिस रिकॉर्ड्स और आधिकारिक बयानों के माध्यम से सत्यापन किया गया, तो पूरी स्थिति साफ हो गई।
दिल्ली पुलिस का आधिकारिक स्पष्टीकरण
दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर चल रही पासपोर्ट रद्द करने और बिना ट्रायल 12 महीने तिहाड़ जेल भेजने की खबरों का आधिकारिक रूप से खंडन किया है। पुलिस की ओर से स्पष्ट किया गया है कि:
ऐसा कोई विशेष या नया नियम उस दिन नहीं बनाया गया था।
विरोध प्रदर्शन में शामिल सामान्य प्रदर्शनकारियों के पासपोर्ट सामूहिक रूप से रद्द करने का कोई पुलिस आयुक्त स्तरीय नया आदेश जारी नहीं किया गया है।
वायरल दावे भ्रामक और आधी-अधूरी जानकारी पर आधारित हैं।
क्या पासपोर्ट रद्द करने और 12 महीने तिहाड़ भेजने का नया आदेश आया? — झूठ (भ्रामक)
सच्चाई: दिल्ली पुलिस या पुलिस कमिश्नर ने ऐसा कोई विशेष नया कानून या सामूहिक आदेश जारी नहीं किया है। पुलिस के पास संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने का अधिकार होता है, अपनी मर्जी से नया कानून या सजा तय करने का नहीं।
पासपोर्ट रद्द करने का सच: पुलिस किसी का पासपोर्ट सीधे रद्द नहीं कर सकती। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (धारा 10) के तहत यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसक दंगे या गंभीर अपराध में कोर्ट में चार्जशीट दायर होती है या कोर्ट आदेश देती है, तभी पासपोर्ट अथॉरिटी या कोर्ट पासपोर्ट जब्त/रद्द करती है। हालांकि, अगर किसी प्रदर्शनकारी पर एफआईआर दर्ज होती है, तो पुलिस वेरिफिकेशन (PVR) नेगेटिव हो सकता है, जिससे भविष्य में पासपोर्ट बनने या री-न्यू होने में अड़चन आती है।
12 महीने तिहाड़ जेल का सच: पुलिस किसी को बिना कोर्ट में पेश किए 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती। 12 महीने तक जेल में रखने का अधिकार केवल अदालत या कड़े निरोधात्मक कानूनों (जैसे NSA) के तहत सक्षम प्राधिकारी की समीक्षा के बाद ही संभव है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद भी….कॉकरोच अभिजीत दीपके जंतर मंतर छोड़ नहीं रहे और PROTEST भी बंद नहीं कर रहे थे।
जैसे ही यह खबर आई कि पुलिस कमिश्नर ने एक ऑर्डर जारी किया है, जिसमें दंगाई और असामाजिक तत्वों की पहचान करके..
उनके खिलाफ एक्शन लेने और… pic.twitter.com/CdEDChCI9H
— Komal Rathore (@Shekhawat_089) July 26, 2026
वीडियो का सच और घुटनों पर बैठने का मामला — आंशिक सच
वीडियो की हकीकत: वीडियो में नीली टी-शर्ट पहना युवक पुलिस अधिकारी के सामने हाथ जोड़कर और जमीन पर बैठकर टेंट लगाने की अनुमति (Permisiion) मांग रहा है (जैसा कि वीडियो में वह बार-बार कहता सुनाई दे रहा है—”सर टेंट लगाने दीजिए”)।
दावे का भ्रामक पहलू: सोशल मीडिया पर इसे इस तरह पेश किया जा रहा है कि वह किसी ‘पासपोर्ट रद्द होने’ या ‘तिहाड़ जेल जाने’ के डर से रहम की भीख मांग रहा है, जो कि दावों का गलत और सनसनीखेज प्रस्तुतीकरण है।
सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा यह दावा कि “पुलिस कमिश्नर ने पासपोर्ट रद्द करने और 12 महीने जेल भेजने का नया फरमान जारी कर दिया है”, पूरी तरह से भ्रामक और अफवाह है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस द्वारा दी जाने वाली चेतावनियों और कड़े नियमों को बढ़ा-चढ़ाकर अफवाह के रूप में पेश किया गया है।
कानूनी प्रक्रिया क्या कहती है?
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में पुलिस कमिश्नर या कोई भी अधिकारी अपनी मर्जी से रातों-रात कोई “नया कानून” नहीं बना सकता। कानून बनाने का अधिकार केवल संसद (Parliament) और राज्य विधानमंडलों के पास होता है। पुलिस केवल लागू कानूनों का पालन कराने वाली संस्था (Law Enforcement Agency) है।
पासपोर्ट रद्द करने और जब्ती के मौजूदा कानून क्या हैं?
हालांकि, पुलिस का यह कहना कि कोई “नया कानून” नहीं बना, इसका मतलब यह नहीं है कि पासपोर्ट पर कोई कार्रवाई हो ही नहीं सकती। भारत में पासपोर्ट जारी करने, रोकने या रद्द करने के नियम पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (Passports Act, 1967) के तहत तय होते हैं।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के मुख्य कानूनी प्रावधान
| कानूनी प्रावधान | धारा (Section) | स्थिति / कारण | परिणाम / कार्रवाई |
| आपराधिक मामला दर्ज होना | धारा 10(3)(e) | यदि कोर्ट में आरोप (Charges) तय हो चुके हों या चार्जशीट दायर हो। | पासपोर्ट अथॉरिटी द्वारा पासपोर्ट जब्त (Impound) या रद्द किया जा सकता है। |
| प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट | धारा 6(2) | पासपोर्ट सत्यापन (PVR) के दौरान व्यक्ति पर गंभीर FIR दर्ज मिलना। | नया पासपोर्ट जारी करने या पुराने का री-न्यू करने का आवेदन खारिज हो सकता है। |
धारा 10(3) की प्रक्रियात्मक बारीकियां:
अदालत का अधिकार: यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में अदालत में आरोप तय हो चुके हैं या कोई मामला लंबित है, तो पासपोर्ट प्राधिकरण उस व्यक्ति का पासपोर्ट जब्त या रद्द कर सकता है।
पुलिस की भूमिका: पुलिस खुद पासपोर्ट रद्द नहीं करती। पुलिस केवल अदालत में या क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (RPO) को व्यक्ति के आपराधिक रिकॉर्ड (FIR) की जानकारी भेजती है। पासपोर्ट रद्द करने का अंतिम निर्णय पासपोर्ट अधिकारी या अदालत का होता है।
विदेश यात्रा पर रोक: यदि किसी व्यक्ति पर हिंसक दंगे (Rioting), लोक सेवक पर हमला या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज होता है, तो पुलिस सत्यापन (PVR) में ‘Adverse’ (प्रतिकूल) रिपोर्ट लगा दी जाती है, जिससे नया पासपोर्ट बनना या री-न्यू होना रुक जाता है।
तिहाड़ जेल में 12 महीने तक रखने का प्रावधान और पुलिस के अधिकार
सोशल मीडिया के दावों में दूसरा बड़ा बिंदु था—”12 महीने के लिए तिहाड़ जेल भेजना”। यह दावा किस कानूनी व्यवस्था से प्रेरित है और इसकी असलियत क्या है?
निरोधात्मक हिरासत (Preventive Detention)
भारतीय कानून में पुलिस को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए निरोधात्मक कार्रवाई करने के अधिकार प्राप्त हैं:
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) / CrPC के प्रावधान: पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में ले सकती है, जिससे शांति भंग (Breach of Peace) होने की पूरी आशंका हो।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) एवं अन्य कड़े कानून: अत्यंत गंभीर स्थितियों में, जहां राज्य की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था को गंभीर खतरा हो, वहां निरोधात्मक हिरासत का प्रावधान होता है।
न्यायिक समीक्षा आवश्यक: पुलिस किसी को भी बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती। 12 महीने या उससे अधिक समय तक जेल में रखने का निर्णय केवल अदालत या सक्षम प्राधिकारी (Advisory Board) की न्यायिक समीक्षा के बाद ही संभव है, पुलिस अधिकारी के व्यक्तिगत आदेश पर नहीं।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन बनाम हिंसक उपद्रव: संवैधानिक दृष्टिकोण
इस पूरे विवाद के केंद्र में भारत का संविधान और मौलिक अधिकार हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (Article 19) नागरिकों को कुछ बुनियादी स्वतंत्रताएं प्रदान करता है।
संवैधानिक अधिकार बनाम कानूनी सीमाएं
| श्रेणी | संवैधानिक अधिकार / कानूनी धारा | विवरण एवं सीमाएं | व्यावहारिक/प्रशासनिक प्रभाव |
| अभिव्यक्ति की आजादी | अनुच्छेद 19(1)(a) | नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रखने और विरोध दर्ज कराने का पूर्ण अधिकार है। | सरकार या प्रशासन की नीतियों के खिलाफ बिना हिंसा के आवाज़ उठाई जा सकती है। |
| सभा/प्रदर्शन का अधिकार | अनुच्छेद 19(1)(b) | बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने और जुलूस/धरना देने की स्वतंत्रता। | इसके लिए प्रशासन/पुलिस की पूर्व अनुमति लेना और निर्धारित स्थान पर प्रदर्शन करना आवश्यक है। |
| युक्तियुक्त निर्बंधन | अनुच्छेद 19(2) | लोक व्यवस्था (Public Order), राज्य की सुरक्षा और संप्रभुता के हित में अधिकारों पर रोक लगाई जा सकती है। | उपद्रव या रास्ता जाम करने की स्थिति में पुलिस को भीड़ हटाने का कानूनी अधिकार होता है। |
| पासपोर्ट पर कार्रवाई | पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (धारा 10) | केवल पुलिस की FIR से पासपोर्ट रद्द नहीं होता; इसके लिए कोर्ट में चार्जशीट या गंभीर आरोप तय होना आवश्यक है। | गंभीर आपराधिक मुकदमों (हिंसा/दंगा) में पुलिस सत्यापन (PVR) प्रतिकूल (Adverse) हो सकता है। |
| निरोधात्मक हिरासत | BNSS / CrPC (धारा 169/170) | शांति व्यवस्था भंग होने की आशंका पर पुलिस एहतियातन हिरासत में ले सकती है। | पुलिस 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए किसी को हिरासत में नहीं रख सकती। |
न्यायालय का दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य) में साफ कहा है कि विरोध दर्ज कराना लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, लेकिन विरोध की आड़ में हिंसा करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या आम नागरिकों का रास्ता रोकना मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं आता।
शांतिपूर्ण समाधान: केंद्र सरकार और पुलिस का रुख
वायरल वीडियो और उससे उपजे विवाद के बीच जमीनी हकीकत यह भी है कि पुलिस और प्रशासन की प्राथमिकता स्थिति को संभालना और बातचीत से समाधान निकालना होती है।
आश्वासन और बातचीत: हालिया प्रदर्शनों के दौरान जब तनाव बढ़ा, तो शासन और वरिष्ठ मंत्रियों की उपस्थिति में वार्ता के रास्ते खोले गए।
केस न दर्ज करने का आश्वासन: शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों (जैसे परीक्षा सुधार या पेपर लीक मुद्दों) को उठा रहे युवाओं पर अकारण आपराधिक मुकदमे दर्ज न करने और सकारात्मक कदम उठाने के आश्वासन दिए गए, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त हुए।
सख्त चेतावनी केवल हिंसक तत्वों के लिए: दिल्ली पुलिस की ओर से जारी सार्वजनिक चेतावनियां केवल उन तत्वों के लिए थीं जो भीड़ का फायदा उठाकर तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने का प्रयास करते हैं।
नागरिक अधिकार और कानून का संतुलन
दिल्ली पुलिस के नाम से फैला ‘पासपोर्ट रद्द करने और 12 महीने जेल’ का वायरल दावा कानूनी रूप से भ्रामक और प्रक्रियात्मक रूप से गलत है। न तो पुलिस रातों-रात ऐसा कोई नया कानून बना सकती है, और न ही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बिना कानूनी प्रक्रिया के ऐसी कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि, नागरिकों को यह समझना होगा कि:
कानूनी प्रक्रिया मौजूद है: यदि कोई व्यक्ति प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी या पुलिस बल पर हमले का दोषी पाया जाता है, तो उस पर दर्ज FIR उसके पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन और भविष्य की सरकारी नौकरियों/विदेश यात्राओं को कानूनी रूप से प्रभावित कर सकती है।
अभिव्यक्ति की सीमाएं: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध का अधिकार तब तक सुरक्षित है जब तक वह शांतिपूर्ण है।
एक परिपक्व लोकतंत्र में पुलिस प्रशासन का कर्तव्य शांति और सुरक्षा बनाए रखना है, वहीं नागरिकों का कर्तव्य अपनी मांगों को संवैधानिक दायरे में रहकर उठाना है। किसी भी अफवाह पर विश्वास करने के बजाय आधिकारिक चैनलों और कानूनी प्रक्रियाओं पर भरोसा करना ही सही मार्ग है।

