सोशल मीडिया पर ‘मर्दाना कमजोरी’ का बढ़ता बाजार: पुरुषों की असुरक्षा, मुनाफे का खेल और डिजिटल धोखाधड़ी का सच
मुनाफे का खेल, पुरुषों की असुरक्षा और डिजिटल धोखाधड़ी

कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,
हरियाणा –
डिजिटल क्रांति ने समाज को अभूतपूर्व सुविधाएँ प्रदान की हैं। आज स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, विशेषज्ञों की सलाह और चिकित्सा सेवाएँ कुछ क्लिक की दूरी पर उपलब्ध हैं। लेकिन इसी डिजिटल दुनिया का एक दूसरा चेहरा भी है, जहाँ लोगों की कमजोरियों, आशंकाओं और सामाजिक संकोच को मुनाफे के अवसर में बदल दिया गया है।
सोशल मीडिया पर यदि कोई क्षेत्र सबसे तेज़ी से फैल रहा है, तो वह है ‘मर्दाना कमजोरी’ के नाम पर चल रहा विज्ञापनों और उत्पादों का विशाल कारोबार। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, शॉर्ट वीडियो प्लेटफ़ॉर्म और मैसेजिंग ऐप्स पर ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ है, जो कुछ दिनों में पुरुषत्व बढ़ाने, वैवाहिक जीवन सुधारने या चमत्कारी शक्ति देने का दावा करते हैं।
यह केवल एक व्यावसायिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य साक्षरता और डिजिटल नियमन से जुड़ा गंभीर विषय है। यह उद्योग पुरुषों की उस झिझक का लाभ उठाता है, जो उन्हें यौन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर खुले रूप से चर्चा करने से रोकती है। विज्ञापन पहले भय पैदा करते हैं, फिर उसी भय का समाधान बेचते हैं। यही इस पूरे कारोबार का सबसे बड़ा व्यापारिक मॉडल है।
भारतीय समाज में यौन स्वास्थ्य आज भी खुलकर चर्चा का विषय नहीं बन पाया है। अधिकांश पुरुष ऐसी समस्याओं पर परिवार या चिकित्सक से बात करने में संकोच महसूस करते हैं। इस संकोच का फायदा उठाकर सोशल मीडिया पर स्वयंभू विशेषज्ञ, बिना प्रमाण वाले वैद्य, इन्फ्लुएंसर और कई कंपनियाँ ऐसे उत्पाद बेचती हैं जिनकी प्रभावशीलता के ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। “सात दिन में असर”, “100 प्रतिशत गारंटी”, “गुप्त फार्मूला”, “हज़ारों लोगों ने पाया लाभ” जैसे दावे आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन ये अक्सर वैज्ञानिक चिकित्सा के मानकों पर खरे नहीं उतरते।
इन विज्ञापनों की भाषा भी ध्यान देने योग्य होती है। वे सीधे उत्पाद नहीं बेचते, बल्कि पहले व्यक्ति के आत्मविश्वास पर सवाल उठाते हैं। संदेशों में यह संकेत दिया जाता है कि यदि कोई विशेष उत्पाद नहीं लिया गया, तो वैवाहिक जीवन प्रभावित होगा, सम्मान कम हो जाएगा या पुरुषत्व अधूरा रह जाएगा। इस प्रकार एक सामान्य स्वास्थ्य चिंता को सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान से जोड़ दिया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक लोग बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं।
सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म इस समस्या को और बढ़ा देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने एक बार ऐसे विज्ञापन को देखा या उस पर क्लिक किया, तो प्लेटफ़ॉर्म उसे बार-बार इसी प्रकार की सामग्री दिखाने लगते हैं। धीरे-धीरे उपयोगकर्ता को यह भ्रम होने लगता है कि यह समस्या बहुत सामान्य है और अधिकांश लोग ऐसे उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव कई बार अनावश्यक चिंता भी पैदा कर सकता है।
डर का व्यापार और मर्दाना कमजोरी का मनोविज्ञान
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यौन स्वास्थ्य केवल दवाओं से जुड़ा विषय नहीं है। अनेक मामलों में तनाव, अवसाद, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हार्मोन संबंधी असंतुलन, धूम्रपान, शराब का सेवन, नींद की कमी और अस्वस्थ जीवनशैली जैसी स्थितियाँ भी भूमिका निभाती हैं। ऐसे मामलों में केवल तथाकथित “शक्ति बढ़ाने वाली” दवा लेना समस्या का समाधान नहीं होता। सही निदान और प्रमाण-आधारित चिकित्सा ही उचित मार्ग है।
सोशल मीडिया पर चल रहे इस कारोबार में एक और चिंता नकली समीक्षाओं और झूठे अनुभवों की है। अनेक विज्ञापनों में ऐसे लोगों के कथित अनुभव दिखाए जाते हैं, जिनकी सत्यता की पुष्टि करना कठिन होता है। डॉक्टरों जैसी वेशभूषा पहनाकर विज्ञापन प्रस्तुत किए जाते हैं, जिससे आम व्यक्ति भ्रमित हो सकता है। कई बार “आयुर्वेदिक”, “हर्बल” या “प्राकृतिक” जैसे शब्दों का उपयोग यह धारणा बनाने के लिए किया जाता है कि उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित है। जबकि प्राकृतिक होना अपने आप में सुरक्षा या प्रभावशीलता की गारंटी नहीं है।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि आयुर्वेद भारत की एक समृद्ध और वैज्ञानिक चिकित्सा परंपरा है, जिसके अपने सिद्धांत, शोध और योग्य चिकित्सक हैं। समस्या आयुर्वेद नहीं, बल्कि उसके नाम पर बिना पर्याप्त प्रमाण, बिना गुणवत्ता नियंत्रण या भ्रामक दावों के साथ उत्पाद बेचने की प्रवृत्ति है। इसलिए किसी भी चिकित्सा पद्धति में योग्य और पंजीकृत चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि वे वित्तीय धोखाधड़ी, फर्जी निवेश योजनाओं और अन्य भ्रामक विज्ञापनों पर निगरानी रख सकते हैं, तो स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापनों के लिए भी अधिक कठोर सत्यापन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। स्वास्थ्य से जुड़े दावों का वैज्ञानिक आधार, आवश्यक अस्वीकरण और नियामक मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्लेटफ़ॉर्मों की सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।
सरकारी नियामक संस्थाओं को भी डिजिटल विज्ञापनों की निगरानी मजबूत करनी होगी। केवल प्रिंट और टेलीविजन माध्यमों पर नियम लागू करना पर्याप्त नहीं है। आज अधिकांश युवा और मध्यम आयु वर्ग सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताता है, इसलिए भ्रामक स्वास्थ्य विज्ञापनों के विरुद्ध डिजिटल स्तर पर प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है। साथ ही, लोगों को यह जानकारी भी दी जानी चाहिए कि किसी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में प्रमाणित चिकित्सक से परामर्श लेना क्यों आवश्यक है।
इस विषय का एक सामाजिक पक्ष भी है। पुरुषों से अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वे शारीरिक और मानसिक रूप से हमेशा मजबूत रहें। इसी कारण कई पुरुष अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को स्वीकार करने या सहायता लेने से बचते हैं। यह सोच बदलने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य समस्या होना कमजोरी नहीं है, और समय पर उपचार लेना जिम्मेदार व्यवहार है।
मीडिया की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। समाचार माध्यमों और डिजिटल कंटेंट निर्माताओं को सनसनीखेज दावों के बजाय प्रमाण-आधारित जानकारी को बढ़ावा देना चाहिए। स्वास्थ्य पत्रकारिता का उद्देश्य लोगों को जागरूक बनाना होना चाहिए, न कि भय और भ्रम पैदा करना। विशेषज्ञों की राय, वैज्ञानिक शोध और सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों को अधिक स्थान दिया जाना चाहिए।
शिक्षा संस्थानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों के माध्यम से यौन स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना भी समय की आवश्यकता है। जब समाज में सही जानकारी बढ़ेगी, तो भ्रामक विज्ञापनों का प्रभाव स्वतः कम होगा। स्वास्थ्य साक्षरता जितनी मजबूत होगी, डिजिटल धोखाधड़ी की संभावना उतनी ही घटेगी।
मर्दाना कमजोरी के नाम पर सोशल मीडिया पर भ्रामक विज्ञापनों का बाजार गर्म है।
यह भी आवश्यक है कि उपभोक्ता स्वयं सजग रहें। किसी भी ऐसे विज्ञापन से सावधान रहें जो असाधारण परिणाम, तत्काल असर या “100 प्रतिशत गारंटी” का दावा करता हो। यदि किसी उत्पाद के बारे में वैज्ञानिक जानकारी, निर्माता की विश्वसनीयता या नियामक स्वीकृति स्पष्ट नहीं है, तो उस पर भरोसा करने से पहले विशेषज्ञ सलाह लेना उचित होगा।
अंततः, सोशल मीडिया पर ‘मर्दाना कमजोरी’ का बढ़ता बाज़ार केवल एक स्वास्थ्य या विज्ञापन का मुद्दा नहीं है; यह समाज की मानसिकता, डिजिटल नैतिकता, उपभोक्ता संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। पुरुषों की असुरक्षाओं को मुनाफे का साधन बनाना न तो नैतिक है और न ही सामाजिक रूप से उचित। समाधान डर बेचने में नहीं, बल्कि सही जानकारी, वैज्ञानिक चिकित्सा, स्वस्थ जीवनशैली और खुले संवाद को बढ़ावा देने में है।
एक सशक्त समाज वही है जहाँ स्वास्थ्य को शर्म नहीं, बल्कि जागरूकता का विषय माना जाए; जहाँ उपचार विज्ञापनों के दावों से नहीं, बल्कि प्रमाण-आधारित चिकित्सा से तय हो; और जहाँ डिजिटल मंच लोगों की कमजोरियों का व्यापार करने के बजाय उनकी भलाई के लिए उत्तरदायी भूमिका निभाएँ। तभी सोशल मीडिया सचमुच ज्ञान, संवाद और जनकल्याण का माध्यम बन सकेगा।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
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