भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कानून, NCRB आंकड़े और न्याय व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण। जानिए सामाजिक, कानूनी और संस्थागत पहलुओं पर आधारित यह विस्तृत संपादकीय रिपोर्ट।
लेखक: राजकुमार अग्रवाल,
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में महिलाओं के सम्मान और उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक स्तर पर विभिन्न दावे किए जाते हैं
लेकिन धरातल की वास्तविक स्थिति कई मायनों में इन दावों से भिन्न और अत्यधिक संवेदनशील दिखाई देती है
सामाजिक विश्लेषणों से यह बात सामने आती है कि महिलाओं का शोषण करने के लिए अक्सर धर्म और अंधश्रद्धा की आड़ का सहारा लिया जाता है
जब किसी कृत्य को धार्मिक रीति-रिवाजों या संतों के कथित आशीर्वाद का आवरण पहना दिया जाता है तो पीड़ित पक्ष को आरंभ में भ्रम की स्थिति में रखा जा सकता है
इसी अज्ञानता और गहरी आस्था का अनुचित लाभ उठाकर कतिपय तत्वों द्वारा सुनियोजित छल को अंजाम दिया जाता है
विगत वर्षों में कानून के समक्ष बेनकाब हुए कई कथित धर्मगुरुओं के मामले इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि समाज में आस्था का दुरुपयोग बढ़ा है
न्यायालयीय इतिहास गवाह है कि गुरमीत राम रहीम और आसाराम बापू जैसे मामलों में अंततः कानून ने कठोरता से अपना काम किया है
विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या किसी एक वर्ग या धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि सत्ता, रसूख और अंधभक्ति के उस गठजोड़ की है जिसका शिकार अमूमन कमजोर और प्रभावित महिलाएं होती हैं
कानूनी दृष्टिकोण से महिलाओं के साथ होने वाले इन अपराधों पर बात करते समय इसके वैधानिक ढांचे को समझना आवश्यक है
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 (जो पूर्व में भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 375 थी) के अनुसार महिला की स्वतंत्र सहमति के बिना बनाया गया शारीरिक संबंध बलात्कार की श्रेणी में आता है
वर्तमान वैधानिक प्रावधानों के अनुसार जबरदस्ती, भय दिखाना, नशे की हालत में रखना या विवाह का झूठा आश्वासन देकर सहमति प्राप्त करना भी कानूनन अपराध माना गया है
सर्वोच्च न्यायालय ने ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह’ जैसे विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि सहमति का स्वतंत्र होना अनिवार्य है और दबाव में ली गई सहमति मान्य नहीं है
इस गंभीर विषय का एक व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी है जिस पर फोरेंसिक विज्ञान गहराई से विचार करता है
चिकित्सा विज्ञान और फॉरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार जबरदस्ती या हिंसक प्रयास की स्थितियों में पीड़ित और आरोपी के मध्य शारीरिक संघर्ष की प्रबल संभावना रहती है
विशेषज्ञ मानते हैं कि तीव्र भय या हिंसक स्थिति में मानव शरीर में ‘फाइट या फ्लाइट’ वाले हार्मोन जैसे एड्रेनालाईन का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है जो शारीरिक और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है
फोरेंसिक जांच के दौरान कपड़ों का फटना, नाखूनों के खरोंच के निशान या अन्य शारीरिक साक्ष्य मामले को वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
अदालतों में मुकदमों की सुनवाई के दौरान यदि फॉरेंसिक और डाक्टरी जांच में ऐसे संघर्ष के न्यूनतम साक्ष्य भी नहीं मिलते तो न्यायविदों द्वारा मामले की सत्यता की गहन समीक्षा की जाती है
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ विदेशी मीडिया संगठनों और एजेंसियों द्वारा भारत की छवि को लेकर नकारात्मक रिपोर्टिंग की जाती है जो चिंता का विषय है
इस वैश्विक परिदृश्य के बीच देश में दर्ज होने वाले अपराधों के आंकड़ों की वास्तविक और गहन समीक्षा करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में देश भर में बलात्कार के 28,046 मामले दर्ज किए गए थे
इसके पश्चात वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़कर 31,677 हुई और वर्ष 2022 की रिपोर्ट में लगभग 31,516 मामले दर्ज पाए गए
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2012 के निर्भया मामले के बाद कानूनी कड़ाई और सामाजिक चेतना के कारण पुलिस थानों में मामलों की रिपोर्टिंग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है
NCRB की वार्षिक रिपोर्टों का एक अन्य कड़वा सच यह भी है कि दर्ज होने वाले कुल मामलों में से लगभग 85 से 89 प्रतिशत मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं बल्कि परिचित या रिश्तेदार ही होते हैं
इन दर्ज मामलों के बीच सबसे बड़ी न्यायिक चुनौती यह है कि अदालतों में आरोपियों को सजा मिलने की दर (Conviction Rate) आज भी मात्र 27 से 30 प्रतिशत के आसपास ही बनी हुई है
इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि दर्ज होने वाले कुल मुकदमों में से एक बड़ा हिस्सा कानूनी रूप से न्यायालय में सिद्ध नहीं हो पाता और आरोपी बरी हो जाते हैं
पुलिस रिकॉर्ड्स और न्यायिक विश्लेषणों से यह भी स्पष्ट होता है कि दर्ज मामलों में से कुछ हिस्से आपसी रंजिश, प्रेम संबंधों के टूटने या वैवाहिक विवादों के कारण उपजे प्रतिशोध पर आधारित होते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई अवसरों पर कानून के दुरुपयोग और झूठे मुकदमों पर चिंता व्यक्त की है क्योंकि एक गलत आरोप किसी भी व्यक्ति के सामाजिक जीवन और गरिमा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है
न्यायविदों का यह भी मत है कि प्रत्येक दोषमुक्ति (Acquittal) को झूठा मामला नहीं माना जा सकता क्योंकि कई बार पुलिस जांच में त्रुटियां और साक्ष्यों का अभाव भी इसका कारण बनता है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष सभी को समानता का अधिकार प्रदान करता है जिसे पूर्णतः धरातल पर उतारना प्रशासनिक तंत्र का दायित्व है
प्रशासनिक और पुलिस प्रणाली के विश्लेषणों में अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि आम नागरिकों और रसूखदार व्यक्तियों के मामलों में जांच की गति और प्रक्रिया में अंतर दिखाई देता है
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्टों और चुनाव आयोग को दिए गए उम्मीदवारों के शपथ पत्रों (Form-26) के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि संसद और विभिन्न विधानसभाओं के कई सदस्यों पर आपराधिक मामले लंबित हैं
इन रिपोर्टों के अनुसार विभिन्न राजनीतिक दलों के कुछ जनप्रतिनिधियों पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से जुड़ी धाराएं भी दर्ज हैं जो वर्तमान राजनीतिक शुचिता पर एक बड़ा सवाल हैं
न्यायिक विश्लेषकों का मानना है कि रसूखदार और प्रभावशाली लोगों के मामलों में अक्सर पुलिस जांच की गति धीमी हो जाती है और अदालतों में चार्जशीट दाखिल होने में लंबा समय लग जाता है
आर्थिक और सामाजिक रूप से सुदृढ़ लोग उत्कृष्ट कानूनी सहायता प्राप्त कर लेते हैं जिससे पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई को अंत तक जारी रखना अत्यधिक कठिन हो जाता है
सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कई बार इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि प्रभावशाली लोगों के मामलों में ट्रायल की गति को तेज करने की आवश्यकता है
राष्ट्रीय महिला आयोग और विधि आयोग के निष्कर्ष भी यह संकेत देते हैं कि देश में वैधानिक प्रावधान पर्याप्त हैं परंतु उनके प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन में सुधार की महती आवश्यकता है
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के गठन के बावजूद देश की अदालतों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लाखों मामले लंबित पड़े होना हमारी न्याय प्रक्रिया की एक बड़ी चुनौती है
निष्कर्ष के तौर पर यह पूरी तरह स्पष्ट है कि जब तक देश की पुलिस और न्यायिक मशीनरी आम नागरिक और प्रभावशाली व्यक्ति दोनों के मामलों में एक समान निष्पक्षता और गति से कार्य नहीं करेगी तब तक पूर्ण न्याय की संकल्पना अधूरी रहेगी
देश को इस सामाजिक बुराई और अपराधों से मुक्त करने के लिए धर्म के नाम पर जारी अंधविश्वास को समाप्त करना होगा और प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह राजनीति के प्रभाव से मुक्त करना होगा
महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा के लिए कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन, त्वरित न्याय प्रक्रिया और सामाजिक चेतना का होना ही वर्तमान समय का सबसे बड़ा राष्ट्रीय तकाजा है
सधन्यवाद,
राजकुमार अग्रवाल
संपादक, दैनिक अटल हिन्द
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