1 मई 2026 से भारत में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत में एक साथ ₹993 की भारी बढ़ोतरी कर दी गई है। इससे दिल्ली में इसकी नई कीमत ₹3,071.50 हो गई है (पहले लगभग ₹2,078.50 थी)। अन्य शहरों में भी यही स्थिति है — मुंबई में ₹3,024.50, कोलकाता में ₹3,177 और चेन्नई में ₹3,232 तक पहुंच गई है।
इसके उलट, घरेलू (14.2 kg) सिलेंडर की कीमत में अभी कोई बदलाव नहीं किया गया है। दिल्ली में यह अभी भी ₹913 के आसपास है (मार्च 2026 में ₹60 की आखिरी बढ़ोतरी के बाद)। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत दी है, जबकि कमर्शियल सेक्टर पर पूरा बोझ डाला गया है।
भारत में LPG की खपत और उत्पादन — सही आंकड़े
- कुल खपत (FY 2025-26): लगभग 33.212 मिलियन टन (मार्च 2026 में अस्थायी रूप से 13% गिरकर 2.379 मिलियन टन रह गई, लेकिन पूरे साल 6% की बढ़ोतरी हुई)।
- घरेलू खपत: कुल LPG का 85-87% हिस्सा घरों में इस्तेमाल होता है। मार्च 2026 में घरेलू सिलेंडर की बिक्री 8.1% घटी।
- कमर्शियल/नॉन-डोमेस्टिक: कुल खपत का 10% से कम। मार्च में यह 48% तक घटी, क्योंकि सरकार ने घरेलू सप्लाई प्राथमिकता दी।
- उत्पादन: FY26 में 13.1 मिलियन टन (पिछले सालों से थोड़ा ज्यादा)। मार्च में रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल्स से LPG की तरफ मोड़कर उत्पादन बढ़ाया गया (1.4 मिलियन टन)।
- आयात निर्भरता: भारत अपनी जरूरत का लगभग 40-60% आयात करता है (पहले 60% आयात, हाल में घरेलू उत्पादन बढ़ने से सुधार)। ज्यादातर आयात मिडिल ईस्ट (खासकर सऊदी, UAE, कतर) से होता है, जो Strait of Hormuz से गुजरता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर पड़ा।
कमर्शियल LPG की खपत कुल का छोटा हिस्सा होने के बावजूद, इसका असर खाने-पीने के कारोबार पर गहरा पड़ता है क्योंकि होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और छोटे फूड बिजनेस इसी पर निर्भर रहते हैं।इंसानी सोच के नजरिए से देखें तो…यह बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है।
आम इंसान की जेब पर इसका दोहरा असर पड़ रहा है:
- सीधा असर आम लोगों पर: रेहड़ी-पटरी वाले, ढाबे, छोटे रेस्टोरेंट और होटल अब महंगे दामों पर खाना बनाएंगे। चाय, नाश्ता, थाली या बाहर का खाना महंगा हो जाएगा। शादी-ब्याह, पार्टी या सामूहिक भोजन में भी खर्च बढ़ेगा। ग्रामीण इलाकों में भी छोटे खानपान वाले बिजनेस इससे प्रभावित होंगे।
- छोटे उद्योगों और MSME पर बोझ: भारत में लाखों छोटे रेस्टोरेंट, कैटरिंग सर्विस, sweet shops, bakery और फूड प्रोसेसिंग यूनिट कमर्शियल LPG पर चलती हैं। उनका फ्यूल खर्च पहले से ही ऑपरेशनल कॉस्ट का बड़ा हिस्सा होता है।
- ₹993 प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी (एक साल में कुल बढ़ोतरी ₹1,500+ बताई जा रही है) उनके मार्जिन को और पतला कर देगी। कई जगहों पर वे कीमतें बढ़ाने या मेन्यू बदलने पर मजबूर होंगे। कुछ छोटे बिजनेस वैकल्पिक ईंधन (जैसे firewood या PNG जहां उपलब्ध हो) की तरफ सोच रहे हैं, लेकिन इससे खाने का स्वाद और hygiene प्रभावित हो सकता है।
- महंगाई का चक्र: खाने की थाली महंगी होने से परिवारों का बजट बिगड़ेगा। जो लोग अक्सर बाहर खाते हैं (मिडिल क्लास, युवा, मजदूर), उनकी रोजमर्रा की लागत बढ़ेगी। हालांकि पेट्रोल-डीजल और घरेलू LPG में अभी इजाफा नहीं हुआ, लेकिन पूरे एनर्जी सेक्टर में तनाव बना हुआ है।
सरकार का पक्ष: मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत के पास तेल-गैस का पर्याप्त भंडार है, घरेलू सप्लाई प्राथमिकता पर है, और पेट्रोल-डीजल-घरेलू गैस की कीमतें अभी स्थिर रखी गई हैं।
कमर्शियल LPG पूरी तरह मार्केट-डिटर्माइंड (डिरेगुलेटेड) है, इसलिए ग्लोबल बेंचमार्क (सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस) के हिसाब से कीमतें बदलती हैं।आगे क्या प्रभाव पड़ सकता है?
- छोटे उद्योग: अगर तनाव लंबा चला तो और बढ़ोतरी या सप्लाई दबाव हो सकता है। इससे कई छोटे बिजनेस बंद होने या स्केल डाउन करने की नौबत आ सकती है। बड़े होटल-रेस्टोरेंट बेहतर तरीके से झेल सकते हैं, लेकिन छोटे ढाबे और स्ट्रीट वेंडर मुश्किल में पड़ेंगे।
- आम जनता: घरेलू सिलेंडर पर अभी राहत है, लेकिन अगर आयात महंगा रहा तो सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा या आगे घरेलू कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं। लंबे समय में PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) का विस्तार एक समाधान हो सकता है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर अभी सीमित है।
- सकारात्मक पहलू: सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ा रही है (रिफाइनरियों को LPG की तरफ मोड़ना, PMUY जैसी योजनाएं) और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा दे रही है। लेकिन वैश्विक घटनाओं (जैसे Hormuz में तनाव) से भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की कमजोरी साफ दिखती है।
यह बढ़ोतरी मिडिल ईस्ट तनाव का नतीजा है, जो ग्लोबल सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही है। घरेलू उपभोक्ताओं को बचाया गया है, लेकिन कमर्शियल सेक्टर और उससे जुड़े छोटे उद्योग-व्यवसायों तथा आम लोगों की जेब पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।
लंबे समय में ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना, आयात स्रोतों में विविधता लाना और PNG/CGD नेटवर्क का विस्तार जरूरी है। फिलहाल, छोटे खानपान वाले बिजनेस और उपभोक्ता दोनों को सतर्क रहना होगा — क्योंकि एक झटके में 1000 रुपये की बढ़ोतरी खाने की थाली से लेकर पूरे कारोबार की लागत को प्रभावित कर रही है।


