जब नाविक युद्ध का शिकार बन जाते हैं: चार भारतीय जानें, एक वैश्विक संकट
युद्ध के बीच फंसे भारतीय नाविक: चार मौतें और सिस्टम की लापरवाही
===जैकब क्लिंट द्वारा लिखा गया लेख==
समुद्रों को हमेशा से दुनिया के व्यापार का रास्ता माना गया है, जिससे दुनिया का लगभग 90% व्यापार होता है और अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ती हैं। लेकिन इस तरक्की के पीछे एक कड़वा और अनदेखा सच भी छिपा है। कच्चे तेल, खाने-पीने की चीजों, दवाइयों और फैक्ट्रियों के सामान की हर खेप अपनी मंजिल तक सिर्फ इसलिए पहुंच पाती है, क्योंकि लाखों नाविक (seafarers) अपने परिवारों से दूर, महीनों समंदर में बिताते हैं और भारी खतरों का सामना करते हैं। तूफान, समुद्री डाकू और हादसे तो इस पेशे के पुराने खतरे हैं ही, लेकिन आज एक नया और कहीं ज्यादा खतरनाक खतरा सामने आ गया है। आम नागरिकों वाले क्रू (crew) को ले जाने वाले कमर्शियल जहाज अब देशों की आपसी दुश्मनी और मिलिट्री जंग का शिकार बन रहे हैं। व्यापारिक समुद्री रास्ते अब जंग के मैदान में बदल रहे हैं, जहां बेकसूर नाविकों को अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।
फारस की खाड़ी (Persian Gulf), ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक बार फिर दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री इलाके बन गए हैं। दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग पांचवां हिस्सा और एलएनजी (LNG) का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं संकरे रास्तों से गुजरता है, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हैं। लेकिन बढ़ते तनाव, सेनाओं की तैनाती, ड्रोन हमलों और नौसैनिक टकरावों ने इन रास्तों से गुजरना एक खतरनाक जुआ बना दिया है। सरकारें जहां अपनी रणनीतियों और कूटनीति पर बहस कर रही हैं, वहीं ये नाविक बिना किसी हथियार के, इंसानियत की भलाई के लिए अपनी ड्यूटी निभाते हुए इन खतरनाक इलाकों से गुजर रहे हैं।
भारत के लिए यह संकट बहुत बड़ा है। भारत दुनिया को नाविक देने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है, जिसके साढ़े तीन लाख से ज्यादा नाविक दुनिया भर के जहाजों पर काम कर रहे हैं। भारतीय अधिकारी और क्रू दुनिया के सबसे आधुनिक तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को चलाते हैं, ताकि वैश्विक व्यापार थमे नहीं। उनका योगदान सिर्फ शिपिंग इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है। भारत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल और एलएनजी इन्हीं रास्तों से देश में आता है। ये नाविक जो पैसा कमाकर घर भेजते हैं, उससे हजारों परिवार चलते हैं और देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है। लेकिन देश और दुनिया की तरक्की में इतना बड़ा योगदान देने के बाद भी, इन मजदूरों की तरफ किसी का ध्यान तब तक नहीं जाता, जब तक कि कोई बड़ा हादसा न हो जाए।
जून 2026 में चार भारतीय नाविकों की मौत ने इस सैन्यीकृत (militarised) होती दुनिया में समुद्री कामगारों की असुरक्षा को साफ उजागर कर दिया है। इनमें से तीन नाविक—हिमाचल प्रदेश के डेक कैडेट आदित्य शर्मा, उत्तर प्रदेश के इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया और आंध्र प्रदेश के चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश—’MT Settebello’ नाम के तेल टैंकर पर काम करते हुए मारे गए। फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया (FSUI) को मिली जानकारी के मुताबिक, इस जहाज पर 28 क्रू मेंबर थे, जिनमें 24 भारतीय थे। ओमान की खाड़ी में बढ़ते मिलिट्री तनाव के दौरान इस जहाज पर हमला हुआ। 21 भारतीय नाविक तो बच गए, लेकिन इस हमले ने पीछे उजड़े हुए परिवार और डरा हुआ नाविक समाज छोड़ दिया।
‘MT Settebello’ पर हुआ हादसा कोई अकेली घटना नहीं थी। यह दुनिया के उस खतरनाक ट्रेंड को दिखाता है जहां आम व्यापारिक जहाजों को देशों की आपसी लड़ाई का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। नाविकों के पास न तो हथियार होते हैं और न ही वे किसी मिलिट्री ऑपरेशन का हिस्सा होते हैं। उनका काम सिर्फ दुनिया भर के लिए खाना, तेल और दवाइयां पहुंचाना है। लेकिन आज उन्हें ऐसे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है जहां मिसाइलें और ड्रोन हमले आम बात हो गए हैं। मिलिट्री टारगेट और आम नागरिक जहाजों के बीच का अंतर खत्म होता जा रहा है, जिससे बेकसूर नाविकों की जान पर बन आई है।
अभी नाविक समाज इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि एक और भारतीय नाविक की बेहद दुखद परिस्थितियों में जान चली गई। तमिलनाडु के रहने वाले 35 साल के सेकंड ऑफिसर निशांत उइर्थनाथन ‘MT Celestial Sea’ जहाज पर तैनात थे। ओमान के दुक्म पोर्ट (Duqm Port) पर जहाज रुकने के दौरान वे गंभीर रूप से बीमार हो गए। FSUI के मुताबिक, उन्हें तुरंत इलाज और अस्पताल ले जाने की बार-बार मांग की गई, लेकिन कथित तौर पर समय रहते कोई कदम नहीं उठाया गया। तीन दिनों तक उनकी हालत बिगड़ती रही और 11 जून 2026 को उनका निधन हो गया। निशांत की मौत किसी हमले से नहीं हुई, बल्कि यह नाविकों के एक और बड़े संकट को दिखाती है—समय पर इलाज न मिलना और ‘मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन 2006’ के तहत नाविकों के अधिकारों की अनदेखी। उनकी मौत यह याद दिलाती है कि सिस्टम की लापरवाही भी बंदूक की गोली जितनी ही जानलेवा हो सकती है।
इन चार मौतों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यवस्था की कमियों को पूरी तरह खोलकर रख दिया है। ‘मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन 2006′, जिसे नाविकों के अधिकारों का कानून माना जाता है, साफ कहता है कि हर नाविक को सुरक्षित माहौल, तुरंत मेडिकल सुविधा और वित्तीय सुरक्षा मिलनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय नियम भी कहते हैं कि जहाज के मालिकों और देशों की सरकार की जिम्मेदारी है कि वे समुद्र में काम करने वालों की जान की रक्षा करें। लेकिन हाल की घटनाओं से साफ है कि जब जहाज युद्ध क्षेत्रों में होते हैं, तो ये कानून कागजी बनकर रह जाते हैं। नाविकों की जिंदगी को देशों की आपसी दुश्मनी या प्रशासनिक लापरवाही के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
इस संकट की गंभीरता को देखते हुए, FSUI ने सिर्फ दुख जताने के बजाय न्याय के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया। यूनियन ने भारत सरकार को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि खतरे वाले इलाकों में भारतीय नाविकों को कड़ी सुरक्षा दी जाए, कूटनीतिक रास्तों का इस्तेमाल हो और जान गंवाने वाले परिवारों को उचित मुआवजा मिले। यूनियन ने शिपिंग महानिदेशालय (DG Shipping) से भी जवाबदेही की मांग की है।
FSUI के लिए एकजुटता सिर्फ कागजी बयानों तक सीमित नहीं थी। यूनियन के सीनियर नेता खुद पीड़ित परिवारों के दुख में शामिल होने उनके घर पहुंचे। जनरल सेक्रेटरी मनोज यादव उत्तर प्रदेश के देवरिया में शिवानंद चौरसिया के अंतिम संस्कार में शामिल हुए। जॉइंट सेक्रेटरी जैकब क्लिंट और CITU के नेशनल सेक्रेटरी कश्मीर सिंह ठाकुर हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर पहुंचे, ताकि आदित्य शर्मा के परिवार को ढाढस बंधा सकें। विशाखापट्टनम में चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश और थूथुकुडी (तमिलनाडु) में निशांत के अंतिम संस्कार में भी यूनियन के बड़े नेता शामिल हुए। यह दिखाता है कि मजदूर संगठन सिर्फ काम की जगह पर ही नहीं, बल्कि दुख की घड़ी में भी मजदूरों के साथ खड़े हैं।
इस मुहिम ने जल्द ही अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। 22 जून 2026 को पीड़ित परिवारों ने एक ऑनलाइन मीटिंग में अपनी बात रखी, जिसमें शिपिंग महानिदेशक (DG Shipping) श्री श्याम जगन्नाथन (IAS), अंतरराष्ट्रीय नाविक ट्रस्ट (ITF Seafarers’ Trust) की प्रमुख केटी हिगिनबॉटम और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की एग्जीक्यूटिव ऑफिसर अलेक्जेंड्रा स्ज़ेपेन्स्की शामिल हुईं। इस मीटिंग से साफ हो गया कि अब आम नाविकों की सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता देनी ही होगी।
देश की सीमाओं से बाहर जाकर जवाबदेही तय करने के लिए, FSUI ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सामने भी इस मामले को उठाया है। यूनियन ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मांग की है कि इन मौतों की जांच की जाए, युद्ध क्षेत्रों में जहाजों की सुरक्षा बढ़ाई जाए और देशों के सियासी फायदों के लिए नाविकों के अधिकारों की बलि न चढ़ाई जाए।
आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया, पटनाला सुरेश और निशांत की मौतों को सिर्फ चार हादसों के रूप में भूल नहीं जाना चाहिए। यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री समुदाय के लिए एक बड़ा सबक है। नाविकों ने युद्ध, महामारी (Pandemics) और आर्थिक संकटों के बीच भी काम करना जारी रखा ताकि दुनिया में कभी खाना, तेल या दवाइयां कम न पड़ें। फिर भी वे दुनिया के सबसे असुरक्षित कामगारों में से हैं। अगर जहाजों से व्यापार चलता है, तो नाविक उस व्यापार की जान हैं। उनकी सुरक्षा को पैसों या राजनीति से कमतर नहीं आंका जा सकता।
दुनिया पर अपने नाविकों का सिर्फ आभार ही उधार नहीं है, बल्कि वह उन्हें सुरक्षा, सम्मान और न्याय देने के लिए भी कर्जदार है। FSUI की यह लड़ाई सिर्फ चार परिवारों के लिए नहीं है, बल्कि यह इस बात की मुहिम है कि आगे से कभी किसी नाविक को युद्ध या सिस्टम की लापरवाही के आगे बेबस न छोड़ दिया जाए। नाविक मजदूर हैं, सैनिक नहीं। उनका काम जहाज की कमान संभालना और इंजन रूम देखना है, जंग की अग्रिम पंक्ति (frontline) पर खड़े होना नहीं। उनका यह बलिदान पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर करना चाहिए कि जो मजदूर वैश्विक अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं, उनकी सुरक्षा सबसे पहले होनी चाहिए।
(लेखक फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया – FSUI के जॉइंट सेक्रेटरी हैं, जो CITU से संबद्ध है)

