एफ एंड सीसी विवाद,… एफ एंड सीसी में बदलाव बन गया पॉलीटिकल पावर चैलेंज !
निशाना सहित मुद्दा केवल और केवल एफ एंड सीसी के दो पार्षद सदस्य,परिषद हाउस की बैठक में कथित रूप से एफ एंड सीसी पर भ्रष्टाचार के आरोप
एफ एंड सीसी के इस खेल पर पार्टी के बड़े नेताओं की भी नज़रें टिकी हुई पॉलीटिकल सपोर्ट के चलते दोनों सदस्य फिर से चुने गए तो क्या होगा
पटौदी /9 जुलाई 2026 /अटल हिन्द /फतह सिंह उजाला
दुनिया की सबसे बड़ी पॉलीटिकल पार्टी भाजपा और इसकी डबल इंजन ही नहीं ट्रिपल इंजन की सरकार बिना भेदभाव अधिक से अधिक विकास कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन व्यक्तिगत वैचारिक भिन्नता को कथित रूप से पॉलीटिकल पावर के रूप में कुछ लोगों के द्वारा पॉलिटिकल चैलेंज बना दिया जाता है या बना लिया जाता है। जब इस प्रकार के हालात हो तो फिर आम जनता को इसका खामियाजा अवरुद्ध विकास कार्य या विकास कार्य नहीं होने के रूप में भुगतने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
पटौदी जाटोली मंडी परिषद में भी पिछले कई महीनो से यही पॉलीटिकल पावर प्रतिष्ठा का सवाल बनी देखी जा रही है। पॉलीटिकल पावर भी तब तक ही पावर है ,जब तक चुने गए प्रतिनिधि का कार्यकाल पूरा नहीं हो। चुनाव का कार्यकाल पूरा होने के बाद जनप्रतिनिधि की पावर को पावर की जरूरत महसूस की जाती है। ऐसा अक्सर देखने में भी आता रहा है । विकास कार्यों अथवा परियोजनाओं में अनावश्यक रुकावट डालने के आरोप कथित रूप से एफ एंड सीसी पर परिषद के ही वाइस चेयरमैन अमित शर्मा के द्वारा हाउस की बैठक में भाजपा की विधायक विमला चौधरी की मौजूदगी में गरजते हुए लगाए जाते रहे हैं। पिछली बैठक में चैलेंज तो यहां तक किया गया कि अब एक ही टारगेट और लक्ष्य एफ एंड सीसी को बदलना है। इसके लिए कानूनी विकल्प भी खुले रखे गए हैं।
इसी मामले में जानकार लोगों का कहना है कि एक बार चुनी गई अथवा गठित की गई एफ एंड सीसी अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी। इससे पहले इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव संभव नहीं है। बताया गया है कि एफ एंड सीसी में पटौदी जाटोली मंडी परिषद के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, कार्यकारी अधिकारी सहित निगम के अधिकारी स्थाई रूप से होते हैं । चुने गए सदस्यों के द्वारा अपने बीच के ही दो पार्षद सदस्यों का चयन किया जाता है । इसमें एक महिला पार्षद का होना भी आवश्यक बताया गया है । राजनीति के जानकारो के मुताबिक सत्ता या फिर पावर किसी भी पार्टी की हो। चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़कर जीतने वाले उम्मीदवार ही कई बार कथित रूप से छोटी-छोटी बातों को नाक का सवाल बना लेते हैं।
चुनाव जीतकर सत्ताधारी पार्टी के सदस्यता स्वीकार करना ही पर्याप्त नहीं होता? यहां पर समस्या पार्टी की विचारधारा को संबंधित व्यक्ति के द्वारा आत्मसात नहीं किया जाना होता है। यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ है। भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले चुनाव जीतने वाले कथित रूप से अपने आप को पुराने कार्यकर्ताओं के मुकाबले अधिक समर्पित और वफादार साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं । पटौदी जाटोली मंडी परिषद के हाउस के सदस्यों को राजनीतिक रूप से देखा जाए तो सभी सदस्य आज के समय में भाजपा के ही सदस्य एवं पदाधिकारी कहे जा सकते हैं। लेकिन नवागत भाजपा सदस्य, भाजपा की रीति नीति मैं अपने आप को शायद पूरी तरह से ढाल नहीं सके हैं।
कथित रूप से एफ एंड सीसी के जो दो सदस्य पार्षद निशाने पर हैं ,जिनको बदलने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया जा रहा है। यदि अपना कार्यकाल पूरा किया जाने के उपरांत एक बार फिर से यही दोनों सदस्य चुन लिए गए, तो एफ एंड सीसी को बदलने वाले दावेदार फिर कौन सा दांव आजमाएंगे?
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