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राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई से  मुलाकात ना कर भजन लाल परिवार को नकारा 

राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई से  मुलाकात ना कर भजन लाल परिवार को नकारा

-राजकुमार अग्रवाल –

 चंडीगढ़। राहुल गांधी के साथ “पप्पू” का टैग लगना कई बार मन को अखरता रहा है। अक्सर यह लगा कि भाजपा की आईटी सेल और कांग्रेस के राहुल गांधी विरोधी खेमे ने पूरी प्लानिंग के साथ उन्हें जनता के बीच नकारा और नाकाम सिद्ध करने के लिए पप्पू “बना” दिया है।।
लेकिन हरियाणा कांग्रेस में चल रहे हालिया विवाद ने यह साबित कर दिया है कि राहुल गांधी को “दूसरी” ताकतों ने पप्पू नहीं बनाया है बल्कि वे “खुद” के कर्मों से ही पप्पू साबित हो गए हैं।
हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा के हमेशा खिलाफ नजर आने वाले राहुल गांधी ने पिछले 8 साल के दौरान तीन बार यह साबित किया कि उनमें मन तो पार्टी का नेतृत्व करने की “योग्यता” है और ना ही सही समय पर फैसले लेने की “क्षमता” है।
अवसर नंबर 1
अशोक तंवर राहुल गांधी के बेहद विश्वासपात्र लोगों में शामिल थे। अशोक तंवर के जरिए राहुल गांधी भूपेंद्र हुड्डा को आसानी से सियासी तौर पर “निपटा” सकते थे।
कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के कारण उनके पास फैसले लेने की सुपर पावर भी थी लेकिन साढ़े 5 साल तक राहुल गांधी अशोक तंवर को हरियाणा में पार्टी का संगठन देने की हरी झंडी नहीं दिखा पाए।
भूपेंद्र हुड्डा की फिक्सिंग मैनेजमेंट के आगे राहुल गांधी की प्रधानगी फेल हो गई। राहुल गांधी भूपेंद्र हुड्डा को तो खत्म नहीं कर पाए लेकिन उल्टे भूपेंद्र हुड्डा ने अशोक तंवर को जरूर पद से हटवा दिया। अशोक तवर की विदाई से साबित हो गया कि भूपेंद्र हुड्डा राहुल गांधी अपने साथियों का सही समय पर न तो हाथ पकड़ते हैं और ना ही उनके हित के फैसले लेते हैं।
अवसर नंबर दो
भूपेंद्र हुड्डा के विरोध में ही कुमारी शैलजा को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था। शैलजा सोनिया गांधी की बेहद करीबी नेताओं में मानी जाती हैं।
शैलजा के साथ भी वही सब कुछ किया गया जो अशोक तंवर के साथ किया गया था। 3 साल तक शैलजा राहुल गांधी और सोनिया गांधी से हरियाणा में पार्टी की संगठन बनवाने के लिए रिक्वेस्ट करती रही लेकिन भूपेंद्र हुड्डा के घोर विरोधी होने का दिखावा करने वाले राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने संगठन बनाने के हरी झंडी नहीं दिखाई।
भूपेंद्र हुड्डा ने जी 23 के नाम पर ब्लैकमेलिंग करते हुए कुमारी शैलजा को भी अध्यक्ष पद से हटवा दिया और अपनी कठपुतली उदयभान को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनवा दिया जिससे एक बार फिर साबित हो गया कि राहुल गांधी अपने परिवार से जुड़े लोगों को भी “बचाने” और “बढ़ाने” में सक्षम नहीं है। हरियाणा की राज्यसभा सीट पर कुमारी शैलजा का सबसे पहला दावा होने के बावजूद लगातार दो बार गांधी परिवार भूपेंद्र हुड्डा के प्रेशर में शैलजा को टिकट नहीं दे पाया।
अफसर नंबर 3
हरियाणा जनहित कांग्रेस के कांग्रेस में विलय के दौरान राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई से कुछ बड़े वादे किए थे। 6 साल तक उनमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया गया।
हरियाणा कांग्रेस के वर्तमान विवाद में भी राहुल गांधी कुलदीप बिश्नोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की हरी झंडी दिखा चुके थे लेकिन भूपेंद्र हुड्डा ने प्रियंका गांधी के साथ सेटिंग करके रातों-रात पासा पलट दिया और उदय भान को अध्यक्ष बनवा लिया। कुलदीप बिश्नोई राहुल गांधी से मिलकर बात साफ करना चाहते थे लेकिन एक महीने में राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई से मिलना भी जरूरी नहीं समझा।
अगर राहुल गांधी समझदार होते तो वे कुलदीप बिश्नोई को तुरंत बुलाकर अपनी मजबूरियों का हवाला देकर उन्हें रजामंद कर लेते लेकिन ऐसा करने की बजाय राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई को अनदेखा कर दिया। यह भी तब किया गया जब कुलदीप बिश्नोई का एक वोट राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए बेहद महत्व रखता है।
ऐसे नाजुक मौके पर भी राहुल गांधी ने कुलदीप बिश्नोई से मिलना जरूरी नहीं समझा जिससे यह साबित हो गया कि राहुल गांधी “मानसिक” और “सियासी” तौर पर परिपक्व नहीं हैं।
बात यह है कि पिछले 10 साल के दौरान राहुल गांधी को देश की सबसे बड़ी पुरानी पार्टी कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बनाया गया लेकिन राहुल गांधी न तो पार्टी की “कसौटी” पर खरा उतर पाए और ना ही जनता की “उम्मीदों” पर खरा उतर पाए।
उनकी अगुवाई में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर देना तो दूर लगातार एक के बाद एक प्रदेश में हार की शिकार होती चली गई।
राहुल गांधी सियासी तौर पर बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर पूरी तरह से फेल साबित हो गए हैं।
सही समय पर सपोर्ट नहीं मिलने के कारण राहुल गांधी के सबसे करीबी साथी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद और मिलिंद देवड़ा जैसे युवा प्रभावशाली नेता कांग्रेस छोड़ने को मजबूर हो गए।
राहुल गांधी की नाक के नीचे हरियाणा से राव इंद्रजीत सिंह, बीरेंद्र सिंह, अवतार भड़ाना, धर्मवीर सिंह रमेश कौशिक और जितेंद्र मलिक जैसे नेता भी कांग्रेस छोड़ने को मजबूर हो गए।
राहुल गांधी एक भी मौके पर सही फैसला नहीं ले पाए जिसके चलते कांग्रेस गर्त में चली गई है।
कुलदीप बिश्नोई को राजी करके राहुल गांधी हरियाणा और राजस्थान दोनों में कांग्रेस की सरकार बनवाने का गोल्डन चांस हासिल कर सकते थे क्योंकि हरियाणा में जहां गैर जाट वोटरों पर आज भी भजनलाल परिवार का बड़ा असर है वही राजस्थान में 30 से अधिक सीटों पर बिश्नोई वोटर हार जीत का डिसाइडिंग फैक्टर हैं। 2018 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनाने में कुलदीप बिश्नोई का अहम योगदान रहा था।
हरियाणा और राजस्थान दोनों में कुलदीप बिश्नोई को प्रमोट करके कांग्रेस सरकार बनाने का मजबूत दवा पेश कर सकती थी लेकिन राहुल गांधी को कुलदीप बिश्नोई का महत्व समझ नहीं आया।
राहुल गांधी की अनदेखी और कमजोरी के चलते कुलदीप बिश्नोई भी कांग्रेस छोड़ चुके दूसरे बड़े नेताओं की तरह बड़ा फैसला लेने की दहलीज पर खड़े हुए हैं।
अगर कुलदीप बिश्नोई को ऐसा करना पड़ा तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी ही जिम्मेदार होंगे…

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