प. बंगाल : आधी रात को बुलडोज़र और बेदख़ली के खिलाफ जन प्रतिरोध
आलेख : संपृक्ता बोस, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते
जून 2026 के पहले हफ़्ते में, दक्षिण कोलकाता में जादवपुर विश्वविद्यालय के पास स्थित जादवपुर रेलवे स्टेशन सिर्फ़ एक व्यस्त ट्रांसपोर्ट हब नहीं रह गया।
जैसा कि पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में देखा गया है, यह जगह भी राज्य की जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ लोगों की आजीविका और शहर पर अधिकार को लेकर हुए तनावपूर्ण टकराव का केंद्र बन गया है।
जिसे राज्य ने एक आम “अतिक्रमण-विरोधी” अभियान बताते हुए औचित्यपूर्ण ठहराया है, उसके खिलाफ तेज़ी से अलग-अलग तबकों के लोगों ने मिलकर एक बड़ा विरोध आंदोलन खड़ा कर दिया।
इस अभियान ने असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों, सड़क किनारे सामान बेचने वालों, सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले वामपंथी कार्यकर्ताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और बंगाल के सांस्कृतिक जगत के लोगों को एक साथ ला दिया।
जादवपुर की लड़ाई ने भाजपा राज में उभरते हुए ‘बुलडोज़र राज’ के तहत शहरी विकास की क्रूर सच्चाइयों को उजागर कर दिया है। वामपंथी नेताओं — जिनमें पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती, एसएफआई के महासचिव सृजन भट्टाचार्य और मशहूर रंगमंच कलाकार जॉयराज भट्टाचार्य शामिल थे — ने अनगिनत कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और केंद्रीय बलों की लाठियों का डटकर सामना किया।
दक्षिण कोलकाता की खून से सनी ज़मीन से वामपंथियों ने साफ़-साफ चेतावनी दी है कि बंगाल में बुलडोज़र की राजनीति का कोई राज नहीं चलेगा।
मानवीय लागत
इस संघर्ष के केंद्र में सैकड़ों फेरी वाले और छोटे व्यापारी हैं, जिनका जीवन स्टेशन परिसर के आसपास घूमता है।
चाय बेचने वाले, फल बेचने वाले, खाने की दुकान के मालिक, दर्जी और मोची ने पीढ़ियों के निरंतर श्रम से अपनी मामूली आजीविका बनाई है।
टिन की चादरों, बांस के खंभों और तिरपाल से बने उनके स्टॉल, कामकाजी लोगों के घरों की नाजुक आर्थिक नींव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ये अनौपचारिक उद्यम स्कूल की फीस, जीवन रक्षक दवाओं, किराया और दैनिक भोजन के लिए भुगतान करते हैं, जिसका अर्थ है कि पूरा परिवार जीवित रहने के लिए उन पर निर्भर है।
मंगलवार, 2 जून को प्रशासन ने अपना पहला खुला कदम उठाया और घोषणा की कि वे इस इलाके में बुलडोज़र भेज रहे हैं, जबकि इसके लिए औपचारिक नोटिस उसी दोपहर दिया गया था।
इसके बाद, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले कई संगठनों ने पूरे इलाके में घर-घर जाकर लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया।
सृजन भट्टाचार्य और जाने-माने वकील समीम अहमद के नेतृत्व में ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। किसी युद्ध क्षेत्र जैसी स्थिति बनाते हुए, प्रशासन ने सैकड़ों पुलिस और सीआरपीएफ जवानों की सुरक्षा में इलाके में बुलडोज़र भेजे।
जादवपुर का यह मामला सिर्फ़ फेरी वालों का मामला नहीं है — यह लोगों के रहने की जगह से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है।
हाई कोर्ट के आदेश का सामना करने के बाद, रेलवे अधिकारियों और पुलिस प्रशासन ने नरमी बरती और वादा किया कि 8 जून को हाई कोर्ट खुलने के बाद वे इस फ़ैसले पर विचार करेंगे और उस तारीख़ से 21 दिन का समय देंगे।
धरना-प्रदर्शन और विरोध देर शाम तक जारी रहा। आख़िरकार, तर्क और कानूनी मिसाल के आगे झुकते हुए, बुलडोज़रों को उस दिन के लिए पीछे हटना पड़ा।
इस अस्थायी राहत से चिंताएँ कम नहीं हुईं ; बल्कि इससे यह संकेत मिला कि सरकार की ओर से और भी सख़्त कार्रवाई होने वाली है। जादवपुर में रात भर पूरी तरह से चौकसी का माहौल बन गया।
इस बेदखली अभियान की गुस्ताखी को समझने के लिए, पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक माहौल को देखना ज़रूरी है।
हाल ही में बनी भाजपा सरकार ने शहरी योजना के मामले में आम जनता से कटकर एक तरह का बेपरवाह रवैया अपनाया है।
वे खुले आम सवाल उठाते हैं कि सड़क किनारे सामान बेचने वालों को अपनी चीज़ें बेचने की इजाज़त क्यों दी जानी चाहिए ; वे उन्हें बिना सोचे-समझे गैर-कानूनी कब्ज़ा करने वाला मानकर शहरी इलाकों से हटाने की बात करते हैं।
इसी अहंकारी सोच का फ़ायदा उठाते हुए, रेलवे प्रशासन ने विकास का एक ऐसा मॉडल अपनाया है, जो कॉर्पोरेट घरानों पर केंद्रित है।
बिना कहे भी यह साफ़ है कि रेलवे की ज़मीन से कॉर्पोरेट कंपनियों को फ़ायदा होगा, न कि मेहनत-मज़दूरी करने वाले गरीब लोगों को।
जवाबदेही की कमी और राजनीतिक बढ़त की उम्मीद के कारण, केंद्र सरकार ने तय किया है कि बुलडोज़र चलाकर स्टेशन के पास बनी झुग्गियों को हटाने और गरीबों की रोज़ी-रोटी छीनकर अपनी ‘डबल-इंजन’ वाली ताक़त दिखाने का यही सही समय है।
आधी रात को हमला
पहले किए गए सभी वादों को दरकिनार करते हुए, कल दोपहर (7 जून) से ही पूरी रेलवे साइडिंग वाली जगह को ऊँची रेलिंग लगाकर घेर लिया गया। खबर फैल गई कि बुलडोज़र वापस आ रहे हैं।
रात करीब 9 बजे, भारी तैनाती के साथ पुलिस, सीआरपीएफ और आरएएफ के जवानों ने कई मुख्य सड़कों पर गश्त शुरू कर दी।
रात 9 बजे के बाद से, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले दूसरे संगठनों के नेताओं ने माइक पर बार-बार अपील की कि वे किसी रेलवे अधिकारी से मिलना चाहते हैं।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि लोगों को ज़बरदस्ती हटाने की यह अनैतिक कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पुलिस ने साफ़ तौर पर पीछे हटने से इंकार कर दिया और कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें डीसी साउथ से सख़्त आदेश मिले हैं कि यह कार्रवाई उसी रात पूरी करनी है।
आधी रात के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए। तब तक पूरा इलाका मानो जंग का मैदान बन चुका था, जहाँ पुलिस और सरकारी तंत्र की भारी-भरकम सुरक्षा-व्यवस्था तैनात थी।
रेलवे साइडिंग के ठीक सामने, सीपीआई(एम) और वामपंथी व लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं ने एक मानव-श्रृंखला बनाई और बुलडोज़रों को अंदर आने से रोकने के लिए डटकर खड़े हो गए।
उनके साथ स्थानीय निवासियों और प्रभावित फेरीवालों का एक समूह भी शामिल हुआ — ये सभी पूरी तरह निहत्थे थे और उनकी बस एक ही मांग थी कि बातचीत की जाए।
रात करीब 12:45 बजे, पुलिस ने बुलडोज़र के इंजन चालू करने का आदेश दिया, जिससे तनाव चरम पर पहुँच गया।
पुलिस ने पास आ रही भीड़ को बैरिकेड लगाकर रोक दिया। तुरंत ही, बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू हो गया। पुलिस ने बिना किसी भेदभाव के लाठियाँ बरसाईं, जिसमें न तो पुरुषों को बख्शा गया और न ही महिलाओं को। लगभग चालीस मिनट तक बेकाबू और हिंसक लाठीचार्ज चलता रहा।
पुलिस ने मुख्य प्रदर्शनकारियों को काबू में कर लिया। तब तक, बुलडोज़र ज़बरदस्ती अंदर घुस चुके थे।
एक के बाद एक, दुकानें और घर भयानक आवाज़ के साथ ढहने लगे। इस बीच, सड़कों पर पुलिस का आतंक जारी रहा ; वे बेगुनाह और निहत्थे नागरिकों पर लाठियाँ और बंदूकें तानकर डराते-धमकाते रहे।
सांस्कृतिक और लैंगिक संघर्ष
आधी रात को हुई हिंसा ने आंदोलन को कुचलने के बजाय, पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर जवाबी लामबंदी को भड़का दिया। 8 जून को आधी रात को 2:30 बजे से, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, कोलकाता के नेतृत्व में सैकड़ों छात्रों ने हिरासत में लिए गए लोगों की तुरंत रिहाई और अवैध तोड़-फोड़ को रोकने की मांग करते हुए लगातार घेराबंदी जारी रखी।
इस प्रतिरोध को बंगाल के सांस्कृतिक समुदाय से तुरंत और मज़बूत समर्थन मिला। ऐसे इलाके में जहाँ कला लंबे समय से असहमति की भाषा रही है, वहाँ उनके गीतों और मौजूदगी ने विरोध प्रदर्शन के कैंप को नैतिक प्रतिरोध के गढ़ में बदल दिया।
इसी दौरान, कामकाजी वर्ग की महिलाएं भी आगे आईं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता में बड़े पैमाने पर विरोध रैलियां आयोजित कीं। उन्होंने ‘बुलडोज़र राज’ की लिंग-आधारित क्रूरता को उजागर करते हुए तर्क दिया कि किसी स्टॉल को तोड़ने से न केवल एक व्यवसाय खत्म होता है,
बल्कि परिवार की नाजुक आंतरिक अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाती है, जिससे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर सीधा खतरा पैदा होता है।
कानूनी मोर्चे पर, वकील समीम अहमद ने इस कार्रवाई के कानूनी आधार को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी। उन्होंने कहा कि रेलवे कोई भी ऐसा औपचारिक नियम पेश करने में विफल रहा है,
जिससे ऐसी बेदखली को वह सही ठहरा सके। उन्होंने तर्क दिया कि अनधिकृत कब्जे के मामलों में भी, उचित प्रक्रिया, सही नोटिस और कानूनी प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना अनिवार्य है।
वरिष्ठ नेताओं ने वैचारिक आलोचना को और तीखा किया। सीपीआई(एम) की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि प्रशासनिक सुविधा या कॉर्पोरेट मुनाफ़े के लिए अनौपचारिक कामगारों को शहरी जीवन से बस यूं ही मिटाया नहीं जा सकता।
लगातार वापसी
सोमवार, 8 जून को कोर्ट ने सृजन भट्टाचार्य और हिरासत में लिए गए चार अन्य कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत मुचलके पर ज़मानत दे दी। हिरासत से बाहर आते ही, वामपंथियों ने बिना समय गंवाए विकास के सरकारी मॉडल की ज़ोरदार आलोचना की।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तरक्की सिर्फ़ अमीर और ताकतवर लोगों के लिए है, जबकि छोटे-मोटे कारोबार से गुज़ारा करने वालों को नागरिकों के तौर पर उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।
इसके बाद, जाधवपुर की सड़कों पर प्रभावित इलाकों से गुज़रता हुआ एक ज़बरदस्त और जोश भरा मार्च निकला, जिसमें ‘बेदखली से पहले पुनर्वास’ के मुख्य नारे के साथ लोगों की भीड़ दोगुनी हो गई।
रेल हॉकर्स और रेलवे बस्तियों के अस्तित्व के पीछे गहरा सामाजिक-ऐतिहासिक और आर्थिक संदर्भ है — वामपंथ का यह रुख़ स्पष्ट और ऐतिहासिक रूप से ठोस रहा है।
कोई भी व्यक्ति शौक या मर्जी से प्लेटफॉर्म के किनारे अनिश्चित और बेहद मुश्किल ज़िंदगी नहीं चुनता। कई मामलों में, खासकर जाधवपुर इलाके में, इन कामों के पीछे दशकों से चले आ रहे शहरी जीवन-संघर्ष, शरणार्थियों के पुनर्वास और संरचनात्मक पिछड़ेपन जैसे ठोस और कानूनी रूप से मान्य आधार हैं।
अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और शहरी इलाकों को आधुनिक बनाने के लिए अतिक्रमण-विरोधी ये कदम ज़रूरी हैं।
लेकिन जाधवपुर में मलबे के ढेर एक बुनियादी सवाल खड़ा करते हैं, जो संवैधानिक लोकतंत्र की जड़ तक जाता है : शहर पर कब्ज़ा करने का अधिकार किसका है और किसकी कानूनी दावेदारी को मान्यता दी जानी चाहिए?
जाधवपुर, श्यामनगर और पूरे राज्य में वामपंथियों के नेतृत्व में हुए ज़बरदस्त और डटकर किए गए विरोध ने एक स्पष्ट लकीर खींच दी है।
इससे नई सरकार को यह संदेश गया है कि राज्य के दमन की ‘डबल-इंजन’ ताक़त के बावजूद, बंगाल में बुलडोज़र का मनमाना राज नहीं चलेगा, उसे हर तरफ से चुनौती मिलेगी, जरूर मिलेगी।
*(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*


