भाजपा नेता नशे के खिलाफ सबसे पहले शपथ ले : पर्ल चौधरी
भाजपा का ‘एक युद्ध नशे के विरुद्ध’ जैसा अभियान केवल नारेबाजी बना
जमीनी स्तर पर नशे की चुनौती आज भी गंभीर चुनौती बनी हुई
“नशा मुक्त हरियाणा अभियान” और “नशा मुक्त हरियाणा साइक्लोथॉन” जैसे कार्यक्रम बेनतीजा
शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो
गुरुग्राम /07 जुलाई 2026 / अटल हिन्द /फतह सिंह उजाला
हरियाणा प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती पर्ल चौधरी ने भाजपा सरकार के “एक युद्ध नशे के विरुद्ध” जैसे अभियान पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पिछले कई वर्षों में सरकार ने “एक युद्ध नशे के विरुद्ध”, “नशा मुक्त हरियाणा अभियान” और “नशा मुक्त हरियाणा साइक्लोथॉन” जैसे अनेक कार्यक्रम चलाए। करोड़ों रुपये पोस्टरों, विज्ञापनों और प्रचार अभियानों पर खर्च किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर नशे की चुनौती आज भी गंभीर बनी हुई है। यदि सरकार वास्तव में नशे के खिलाफ गंभीर होती, तो केवल प्रचार अभियान नहीं चलाती बल्कि ऐसी नीतियां बनातीं जिनसे नशे की उपलब्धता और तस्करी पर प्रभावी रोक लगती।
पर्ल चौधरी ने कहा कि गुरुग्राम में शराब की दुकानें सबसे अधिक जगमगाती दिखाई देती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दुकानों को सुबह 4 बजे तक संचालन की अनुमति दिए जाने से सरकार का नशा मुक्ति का संदेश कमजोर पड़ता है। एक ओर सरकार नशा मुक्ति के विज्ञापन देती है और दूसरी ओर शराब की आसान उपलब्धता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 17 वर्षों में गुरुग्राम के आसपास विकसित हुए नए शहरी क्षेत्रों में नशे की समस्या को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। विशेषकर बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र के कई इलाकों को लेकर स्थानीय लोग समय-समय पर नशे के कारोबार और उसकी उपलब्धता पर सवाल उठाते रहे हैं। सरकार को इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
नशे का सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बेटियों पर
पर्ल चौधरी ने कहा कि नशे का सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बेटियों पर पड़ता है। घरेलू हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, सड़क अपराध और अनेक सामाजिक अपराधों में नशा एक गंभीर कारक बनकर सामने आता है। इसलिए नशा मुक्ति महिलाओं की सुरक्षा का भी मुद्दा है। उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ सबसे बड़ी जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है। “जो नेता समाज को नशा छोड़ने की सलाह देते हैं, उन्हें सबसे पहले स्वयं सार्वजनिक रूप से यह शपथ लेनी चाहिए कि वे जीवनभर किसी भी प्रकार का नशा नहीं करेंगे, न नशा तस्करों को संरक्षण देंगे और न चुनावों में शराब या अन्य नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करेंगे।”
उन्होंने सुझाव दिया कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक प्रत्येक उम्मीदवार से नामांकन के समय नशामुक्त जीवन का सार्वजनिक शपथपत्र और हलफनामा लिया जाए। उन्होंने कहा कि जब तक राजनीति स्वयं नशे से दूरी नहीं बनाएगी, तब तक नशे के खिलाफ कोई भी सरकारी अभियान सफल नहीं हो सकता।
राजनेता स्वयं नशामुक्त जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करें
पर्ल चौधरी ने कहा कि तथागत बुद्ध ने लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही समाज को नशे के दुष्परिणामों से सावधान करते हुए पंचशील में कहा था—
“सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।” अर्थात “मैं ऐसे सभी मादक पदार्थों से दूर रहने का संकल्प लेता हूँ जो मनुष्य के विवेक और चेतना को नष्ट करते हैं। “उन्होंने कहा कि जब तथागत बुद्ध ने सदियों पहले नशे से दूर रहने का संदेश दिया था, तो आज लोकतांत्रिक भारत के नेताओं का नैतिक दायित्व उससे भी अधिक है कि वे स्वयं नशामुक्त जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करें। अंत में पर्ल चौधरी ने कहा, “हरियाणा की माताएं और बहनें पोस्टरबाजी नहीं, बल्कि नशामुक्त समाज चाहती हैं। यदि राजनीतिक नेतृत्व स्वयं उदाहरण नहीं बनेगा, तो ‘एक युद्ध नशे के विरुद्ध’ जैसे अभियान केवल सरकारी विज्ञापन बनकर रह जाएंगे।”
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