हरियाणा में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का महाअभियान: 96% से अधिक का दावा, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता ‘सिरदर्द’ और बीएलओ ‘पसीने’ से बेहाल
चाचा का नाम है, माता-पिता का गायब!’ हरियाणा वोटर लिस्ट SIR प्रक्रिया बनी जनता के लिए बड़ा सिरदर्द, 14 जुलाई आखिरी मौका।
चंडीगढ़ / 07 जुलाई 2026 / अटल हिन्द ब्यूरो/राजकुमार अग्रवाल
हरियाणा में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का कार्य इन दिनों युद्ध स्तर पर चल रहा है। निर्वाचन आयोग और प्रशासनिक अमला इस अभियान को शत-प्रतिशत सफल बनाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के 96 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं तक गणना प्रपत्र (फॉर्म) पहुँचाए जा चुके हैं। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक लोगों के फॉर्म भरवाने और उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए फील्ड में डटे हुए हैं।
सरकारी दावों और आंकड़ों की चमक के समानांतर, जब जमीनी हकीकत और जनता को आ रही व्यावहारिक दिक्कतों पर नजर डाली जाए, तो तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। प्रदेश के लगभग सभी जिलों से ऐसी खबरें आ रही हैं जहाँ आम जनता वोटर लिस्ट में नाम न होने, रिकॉर्ड न मिलने और जटिल कागजी प्रक्रियाओं के कारण बेहद परेशान है। जब से हरियाणा में यह SIR प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से लेकर आज तक जनता और चुनावी तंत्र दोनों के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं।
1.99 करोड़ मतदाताओं तक पहुँचे फॉर्म
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से प्राप्त ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 1.99 करोड़ से अधिक मतदाताओं (कुल मतदाताओं का 96.43 प्रतिशत) को गणना प्रपत्र वितरित किए जा चुके हैं। निर्वाचन विभाग के लिए राहत और मुस्तैदी की बात यह है कि इनमें से करीब 1.22 करोड़ (59.11 प्रतिशत) भरे हुए प्रपत्र बीएलओ द्वारा प्राप्त कर ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड भी किए जा चुके हैं।
क्या है प्रक्रिया और क्यों जरूरी है ‘प्राप्ति रसीद’?
निर्वाचन आयोग के सख्त निर्देशों के तहत चलाए जा रहे इस अभियान में प्रत्येक मतदाता को गणना प्रपत्र की दो प्रतियाँ दी जा रही हैं:
पहली प्रति: मतदाताओं को अपनी सभी आवश्यक और बिल्कुल सही जानकारी भरकर, एक प्रति पर हस्ताक्षर करके संबंधित बीएलओ को सौंपनी है।
दूसरी प्रति: मतदाताओं को दूसरी प्रति पर बीएलओ से ‘प्राप्ति रसीद’ (Acknowledgment Receipt) लेकर अपने पास भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित रखनी है।
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मुख्य निर्वाचन अधिकारी की दोटूक चेतावनी: 14 जुलाई है आखिरी तारीख
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ए. श्रीनिवास ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि केवल उन्हीं मतदाताओं के नाम 21 जुलाई को प्रकाशित होने वाली मसौदा मतदाता सूची (Draft Voter List) में शामिल किए जाएंगे, जिनके हस्ताक्षरित प्रपत्र बीएलओ को प्राप्त होंगे। यदि कोई मतदाता निर्धारित समय सीमा तक अपना प्रपत्र जमा नहीं करता है, तो उसका नाम मसौदा सूची से हटा दिया जाएगा। उन्होंने सभी पात्र मतदाताओं से अपील की है कि वे 14 जुलाई 2026 तक सही जानकारी के साथ प्रपत्र भरकर हर हाल में जमा करा दें।

साल 2002 के रिकॉर्ड का ‘भूत’: क्यों आ रही है सबसे ज्यादा परेशानी?
इस महाअभियान के बीच जमीनी स्तर पर जो सबसे बड़ी और व्यावहारिक दिक्कत आ रही है, वह है साल 2002 की पुरानी वोटर लिस्ट का रिकॉर्ड। बीएलओ के सामने सबसे बड़ा सिरदर्द उन मामलों में आ रहा है, जहाँ वर्तमान मतदाताओं के नाम साल 2002 की पुरानी वोटर लिस्ट में मेल नहीं खा रहे हैं या गायब हैं।
इसके अलावा, कई परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता का निधन हो जाने की वजह से भी पुरानी सूचियों में नाम ढूंढने, वंशावली स्थापित करने और रिकॉर्ड का मिलान करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। चुनावी तंत्र इस पुनरीक्षण कार्य को समय पर पूरा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन तकनीकी और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की विसंगतियाँ राह में रोड़ा बनी हुई हैं।
फरीदाबाद से ग्राउंड रिपोर्ट: ‘चाचा का नाम है, माता-पिता का नहीं
हरियाणा के औद्योगिक शहर फरीदाबाद में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान अजीबो-गरीब और परेशान करने वाले मामले सामने आ रहे हैं। लोग वर्षों से वोट डालते आ रहे हैं, उनके पास पुराने वोटर आईडी कार्ड भी हैं, लेकिन नए रिकॉर्ड अपडेशन के दौरान जब 2002 की लिस्ट खँगाली जाती है, तो उनके या उनके पूर्वजों के नाम वहाँ से नदारद मिलते हैं।
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झाड़सेंतली कम्युनिटी सेंटर से बीएलओ सुमित्रा की आपबीती
फरीदाबाद के झाड़सेंतली कम्युनिटी सेंटर में सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक लगातार 12 घंटे ड्यूटी कर रहीं बीएलओ सुमित्रा बताती हैं:
“एक दिन में मेरे पास करीब 400 लोग पहुँच रहे हैं। कोई ऑनलाइन काम लेकर आता है तो कोई ऑफलाइन फॉर्म भरवाने आता है। पूरे दिन लोगों की भारी भीड़ लगी रहती है। सबसे ज्यादा दिक्कत 2002 की वोटर सूची को लेकर आ रही है। कई लोगों का नाम सीधे लिस्ट में नहीं मिल रहा। ऐसे मामलों में मैं ‘सर्च डिटेल’ और ‘नो लिंक’ विकल्प के जरिए रिकॉर्ड ढूंढकर फॉर्म अपडेट कर रही हूँ। इसके बाद ही लोगों का पूरा डाटा ऑनलाइन दिखाई देने लगता है। बच्चों के मामलों में ज्यादा परेशानी नहीं है, लेकिन पुराने वोटरों और बुजुर्गों के रिकॉर्ड में काफी दिक्कत आ रही है।”
सुमित्रा आगे बताती हैं कि कई ऐसे मामले भी आए हैं जिनमें एक ही परिवार के कुछ लोगों का रिकॉर्ड मिल रहा है और कुछ का नहीं। उदाहरण के लिए, एक परिवार में चाचा का नाम तो वोटर सूची में मिल गया, लेकिन माता-पिता का नाम कहीं नहीं मिला। ऐसे मामलों के निपटारे में काफी समय लग रहा है। फिलहाल फॉर्म ऑनलाइन भर दिया जाता है, लेकिन आगे सेक्टर-12 स्थित मुख्य कार्यालय में इस पर क्या फैसला होगा, यह बाद में ही साफ हो पाएगा।
बुजुर्ग हुक्कमा और बीएलओ निर्मल का संघर्ष
इसी तरह एक अन्य बूथ पर कार्यरत बीएलओ निर्मल बताती हैं कि जिन लोगों के माता-पिता का देहांत हो चुका है, उन्हें भी काफी परेशानी हो रही है। कई बार परिवार के दूसरे सदस्य पूरी जानकारी नहीं दे पाते, जिससे पुराने रिकॉर्ड तक पहुँचना टेढ़ी खीर साबित होता है।
निर्मल के पास गाँव की ही एक बुजुर्ग महिला हुक्कमा (उम्र 60 साल से अधिक) इसी परेशानी को लेकर पहुँचीं। हुक्कमा का कहना है, “मैं हमेशा से इसी बूथ पर वोट डालती आई हूँ। मेरे पति का नाम सूरजमल है। मेरे पास मेरा पुराना वोटर कार्ड भी है, लेकिन अब अधिकारियों का कहना है कि 2002 की वोटर सूची में मेरा नाम नहीं मिल रहा।” बीएलओ निर्मल ने बताया कि ऐसे मामलों में हर संभव कोशिश करके फिलहाल ऑनलाइन फॉर्म भर दिया गया है और अब आगे की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है।
अकेले और बेसहारा बुजुर्गों का दर्द
निर्मल ने एक और भावुक कर देने वाला वाकया साझा किया:
मेरे पास एक करीब 70 साल के बुजुर्ग आए जो बिल्कुल अकेले हैं। उनका न कोई बेटा है, न पत्नी और न ही परिवार का कोई सदस्य। उन्होंने कहा कि उनका नाम कहीं नहीं मिल रहा है और वह काफी परेशान हैं। बुजुर्ग ने नम आँखों से कहा—’बेटा, मेरा वोट बनवाने में मदद कर दो, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है।’ मैंने उनका ऑनलाइन फॉर्म भर दिया है, लेकिन आगे रिकॉर्ड मिलने और प्रशासनिक मंजूरी के बाद ही स्थिति साफ होगी।”
हरियाणा के अन्य जिलों, तहसीलों और गाँवों की हकीकत: हर तरफ एक सा मंजर
यह समस्या केवल फरीदाबाद या चंडीगढ़ तक सीमित नहीं है। सूत्रों और स्थानीय निवासियों से मिली जानकारी के अनुसार, हरियाणा के विभिन्न जिलों, तहसीलों और सुदूर गाँवों में भी लोग इसी तरह की प्रशासनिक पेचीदगियों से जूझ रहे हैं:
| जिला | प्रभावित क्षेत्र (तहसील / गाँव) | मुख्य समस्या |
| रोहतक | रोहतक तहसील, किलोई, लाखनमाजरा, बोहर गाँव | यहाँ ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता कम होने के कारण लोग ऑनलाइन अपडेशन को समझ नहीं पा रहे हैं। 2002 के रिकॉर्ड में नाम न होने से बुजुर्गों को अपनी नागरिकता और पहचान साबित करने के लिए पुराने कागजात ढूंढने पड़ रहे हैं। |
| जींद | नरवाना, उचाना, जुलाना, सफीदों | बांगर क्षेत्र के गाँवों में बीएलओ के बार-बार चक्कर काटने के बावजूद तकनीकी सर्वर डाउन होने की वजह से डेटा अपलोड नहीं हो पा रहा है। कई गाँवों में कृषि कार्यों में व्यस्तता के कारण लोग समय पर फॉर्म जमा नहीं कर पा रहे हैं। |
| हिसार | हांसी, बरवाला, उकलाना, आदमपुर | यहाँ की कई अनाज मंडियों और झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में रहने वाले दिहाड़ी मजदूरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब मिले हैं। 14 जुलाई की समय सीमा नजदीक आने से मजदूरों में दिहाड़ी छूटने और नाम कटने का दोहरा डर बना हुआ है। |
| गुरुग्राम | पटौदी, सोहना, बादशाहपुर, वजीराबाद | साइबर सिटी के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में ‘नो लिंक’ और ‘डेटा मिसमैच’ की गंभीर समस्या है। नए प्रवासियों और पुराने मूल निवासियों के रिकॉर्ड का मिलान 2002 की सूची से न होने के कारण भारी असमंजस की स्थिति है। |
| अंबाला | नारायणगढ़, बराड़ा, शहजादपुर | यहाँ बाढ़ और मौसमी दिक्कतों के अलावा प्रशासनिक स्तर पर पुराने रिकॉर्ड के फटे-पुराने होने या डिजिटल फॉर्मेट में उपलब्ध न होने के कारण बीएलओ और आम जनता के बीच लगातार टकराव की स्थिति बन रही है। |
जनता की उदासीनता और जागरूकता का अभाव
बीएलओ सुमित्रा और अन्य फील्ड कर्मचारियों का कहना है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो बार-बार बुलाने के बाद भी केंद्रों पर नहीं आ रहे हैं। खासकर झुग्गी-झोपड़ी और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को कई-कई बार सूचना देनी पड़ रही है। कई लोग तो उलटे बीएलओ से ही सवाल पूछते हैं कि “SIR कराने से उन्हें क्या फायदा मिलेगा?”
प्रशासन का कहना है कि लोगों को अपने वोट की कीमत और इस प्रक्रिया की अहमियत समझनी चाहिए। अगर समय रहते यानी 14 जुलाई 2026 से पहले फॉर्म जमा नहीं किया गया, तो बाद में नाम कटने पर आम जनता को जिला मुख्यालयों और सेक्टर कार्यालयों के चक्कर काटने पर मजबूर होना पड़ेगा। अभी बीएलओ खुद जनता के बीच, गाँवों और कम्युनिटी सेंटरों में बैठकर मदद कर रहे हैं, इसलिए इस सुनहरे मौके का फायदा उठाना बेहद जरूरी है।
प्रशासन को भी चाहिए कि वह 2002 के रिकॉर्ड की इस तकनीकी गांठ को सुलझाने के लिए नियमों में थोड़ी ढील दे, ताकि कोई भी वैध नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकार यानी ‘वोट’ से वंचित न रह जाए।

