बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था: आंकड़ों का मायाजाल और इलाज के लिए तड़पता ग्रामीण भारत
SRS रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 67.8 प्रतिशत मौतें ऐसी परिस्थितियों में दर्ज हुईं, जहां मरीजों को मृत्यु से पहले प्रशिक्षित डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख उपलब्ध नहीं हो सकी। रिपोर्ट में इसे “डेथ्स विदाउट मेडिकल अटेंशन” की श्रेणी में रखा गया है।
पटना /13 जून 2026 /रिपोर्ट-अटल हिन्द टीम
बिहार के स्वास्थ्य ढांचे को लेकर हाल ही में आई ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम’ (SRS) की रिपोर्ट ने उन तमाम सरकारी दावों की पोल खोल दी है, जो पिछले कुछ वर्षों में बेहतर चिकित्सा के नाम पर किए जाते रहे हैं। जब हम बात करते हैं कि बिहार में 4.96 लाख मौतें समय पर इलाज न मिलने से होती हैं, तो यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द है जिन्होंने अपने प्रियजनों को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योंकि उनके गांव में न तो डॉक्टर थे, न दवाएं और न ही कोई सुलभ स्वास्थ्य सुविधा।

आंकड़ों की कड़वी सच्चाई (SRS और CAG रिपोर्ट)
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता का स्तर बिहार में चिंताजनक है:
मेडिकल अटेंशन का अभाव: राज्य में 67.8% मौतें ऐसी हैं, जिनमें मृत्यु के समय कोई प्रशिक्षित चिकित्सक उपलब्ध नहीं था।
ग्रामीण-शहरी खाई: ग्रामीण बिहार में 69.4% और शहरी क्षेत्रों में 58.1% लोगों को इलाज नसीब नहीं हुआ। यह फासला स्पष्ट करता है कि गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से भगवान भरोसे है।
डॉक्टरों का संकट: CAG की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में डॉक्टरों की कमी 53% तक है। इसका अर्थ है कि उपलब्ध स्वास्थ्य केंद्रों में आधे से अधिक पद या तो खाली हैं या वहां पदस्थापित डॉक्टर अपनी जिम्मेदारियों से दूर हैं।
कई घटनाओं ने उजागर की स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियां
हाल के महीनों में बिहार के विभिन्न जिलों से सामने आए कई मामलों ने स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों को उजागर किया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पूर्णिया जिले में कथित रूप से गलत इंजेक्शन लगाए जाने के बाद एक बच्चे की मौत का मामला सामने आया। वहीं भागलपुर में एक महिला की मौत के मामले में आरोप लगा कि बिना पर्याप्त चिकित्सकीय प्रशिक्षण वाले व्यक्ति ने ऑपरेशन किया था।
शिवहर जिले में सड़क दुर्घटना में घायल एक दारोगा के उपचार को लेकर भी सवाल उठे थे। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में उनके घायल पैर को अस्थायी सामग्री से बांधने का दावा किया गया, जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच शुरू की थी।
क्या है “मेडिकल अटेंशन का अभाव”?
रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए “डेथ्स विदाउट मेडिकल अटेंशन” का अर्थ उन मौतों से है, जहां व्यक्ति को मृत्यु से पहले प्रशिक्षित चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल सकी। इसमें घर, रास्ते या गैर-प्रशिक्षित व्यक्तियों की देखरेख में हुई मौतें भी शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि करने और ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से काम किए जाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोका जा सके।

सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत: क्या वे सिर्फ कागजों पर हैं?
सरकार ने बेहतर स्वास्थ्य के लिए ‘आयुष्मान भारत’, ‘जननी सुरक्षा योजना’ और ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना’ जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन योजनाओं के दावों से कोसों दूर है:
आयुष्मान भारत योजना: लाखों परिवारों को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज का वादा तो किया गया, लेकिन जब ग्रामीण मरीज अस्पताल पहुंचते हैं, तो या तो वहां बेड खाली नहीं होते या फिर निजी अस्पताल इन कार्डों को स्वीकार करने में हीला-हवाली करते हैं।
जननी सुरक्षा योजना: गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव के लिए यह योजना बनी थी, लेकिन आज भी डुमरावां जैसे गांवों की महिलाएं प्रसव के लिए घंटों का सफर तय कर शहर के सदर अस्पतालों में आती हैं क्योंकि गांव के उप-स्वास्थ्य केंद्रों में न प्रसव की सुविधा है और न एंबुलेंस।
हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर: सरकार ने गांवों में इन केंद्रों का जाल बिछाया, लेकिन मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से अधिकांश केंद्रों पर ताले लटके रहते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि ये भवन अब सिर्फ मवेशियों के आश्रय स्थल या बेकार पड़े ईंट-पत्थर के ढांचे बनकर रह गए हैं।
तुलनात्मक स्थिति: क्यों पीछे है बिहार?
यदि हम केरल या तमिलनाडु जैसे राज्यों से तुलना करें, तो वहां का ‘प्राइमरी हेल्थ केयर मॉडल’ बेहद मजबूत है। वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) केवल दवा देने की जगह नहीं, बल्कि एक सामुदायिक केंद्र है जहाँ हर वक्त एक डॉक्टर और जरूरी दवाइयां उपलब्ध रहती हैं। बिहार में समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन (Management) और जवाबदेही की कमी है।
सुधार का रास्ता क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल नई बिल्डिंग बनाने से स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं सुधरेगी। जरूरत इन तीन कदमों की है:
जवाबदेही तय करना: जो डॉक्टर या अधिकारी समय पर केंद्र नहीं खोलते या मरीजों के साथ बदसलूकी करते हैं, उन पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
झोलाछाप डॉक्टरों का कौशल विकास: मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में लोग झोलाछाप डॉक्टरों पर ही निर्भर हैं। उन्हें बुनियादी चिकित्सा प्रशिक्षण (Basic Medical Training) देकर ‘कम्युनिटी हेल्थ वर्कर’ के रूप में तैयार करना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
पीएचसी को स्वायत्तता: हर पीएचसी को एक निश्चित बजट और निर्णय लेने की शक्ति दी जाए ताकि उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए जिला मुख्यालय पर निर्भर न रहना पड़े।
डुमरावां (नालंदा) — जहाँ अस्पताल को ही इलाज की ज़रूरत है
नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित डुमरावां पंचायत की स्थिति बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली को आइना दिखाने के लिए काफी है। यह क्षेत्र केवल एक ब्लॉक नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक उदासीनता का केंद्र बन चुका है।
1. करोड़ों की लागत, बेजान इमारत
वर्ष 2009 में ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा 9 लाख की लागत से अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (APHC) की नींव रखी गई थी। 2011 में इसे स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर किया गया। 2012 में महज 6 महीने के लिए यहाँ इलाज हुआ, उसके बाद से ही इस केंद्र पर ताले लटक गए। आज, 14 साल बाद भी स्थिति जस की तस है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जिला अधिकारी (DM) से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक गुहार लगाई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
2. मवेशियों का घर बना अस्पताल
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस केंद्र की अनदेखी इतनी बढ़ गई है कि जो इमारत ग्रामीणों के बेहतर इलाज के लिए बनी थी, वह आज मवेशियों को बांधने और चारा रखने के काम आ रही है। आसपास की करीब 10 हजार की आबादी आज भी छोटी-मोटी बीमारियों के लिए शहर की ओर दौड़ने को मजबूर है।
3. लाचारी की तस्वीरें: प्रसव के लिए भटकती महिलाएं
स्थानीय ग्रामीण संपत्तिया देवी की व्यथा सुनिए—वे अपनी बहू को प्रसव पीड़ा होने पर बिहारशरीफ सदर अस्पताल लेकर आईं। उनका सवाल सरकारी व्यवस्था पर सीधा प्रहार है: “गांव में अस्पताल है, लेकिन वहां न डॉक्टर बैठते हैं, न डिलीवरी की सुविधा है। हम दिन भर भूखे-प्यासे शहर भागते हैं। सरकार ने बिल्डिंग तो बना दी, पर डॉक्टर ही नहीं हैं, तो उस बिल्डिंग का क्या करेंगे?”
4. सिस्टम की चुप्पी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जब इस मामले पर सिविल सर्जन से बात की गई, तो उन्होंने ‘नई जॉइनिंग’ का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया। अस्पताल में तैनात एएनएम और डॉक्टर भी कैमरे पर कुछ भी बोलने से बचते रहे। यह दिखाता है कि जवाबदेही का स्तर कितना नीचे गिर चुका है।
स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग को एक ‘एक्शन मोड’ की जरूरत है। अगर समय रहते प्रशासनिक लापरवाही पर लगाम नहीं कसी गई, तो यह रिपोर्ट के आंकड़े केवल कागज तक ही सीमित रहेंगे और आम आदमी की जान इसी तरह दांव पर लगी रहेगी।
क्या सरकार और प्रशासन इन आंकड़ों से सबक लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर बदलेंगे? या फिर यह दर्द एक और रिपोर्ट के आने तक ठंडा पड़ जाएगा?


