नरेंद्र मोदी को देश की स्त्रियों से माफ़ी मांगनी चाहिए
नई दिल्ली/20 अप्रैल/अटल हिन्द/वृंदा गोपीनाथ
सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना जरूरी है कि पिछले सप्ताह संसद में विपक्षी दलों द्वारा जिस विधेयक को खारिज किया गया, वह महिला आरक्षण विधेयक 2026 नहीं था, बल्कि संविधान (131 वां संशोधन) विधेयक, 2026 था. इस विधेयक का उद्देश्य परिसीमन (डिलिमिटेशन) के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करना था.

लेकिन मोदी सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में विफल रही और विधेयक पारित नहीं हो सका. इसमें लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी था, जिससे दक्षिणी और पूर्वी राज्यों के हित प्रभावित होते.विपक्षी दलों का विरोध इस बात को लेकर था कि सरकार ने महिला आरक्षण को चुपचाप परिसीमन से जोड़ दिया.
इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राष्ट्रीय टेलीविजन पर विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक हमला बोला, जो कि राज्य चुनावों के दौरान सरकारी माध्यमों के उपयोग के नियमों का उल्लंघन माना गया है. अपने संबोधन में उन्होंने विपक्ष पर ‘कन्या भ्रूण हत्या’ का आरोप लगाया और विशेष रूप से टीएमसी और डीएमके को निशाना बनाया, जिन राज्यों में आगामी सप्ताहों में चुनाव होने वाले हैं.
मोदी ने ‘देश की माताओं और बहनों’ से माफी भी मांगी और कहा कि ‘एक महिला सब कुछ भूल सकती है, लेकिन अपना अपमान कभी नहीं भूलती.’
हालांकि, यदि प्रधानमंत्री अपने इन शब्दों पर अमल करें, तो उन्हें उन घटनाओं के लिए भी माफी मांगनी चाहिए, जिनमें महिलाओं के साथ घोर अन्याय हुआ है. नीचे ऐसे पांच मौके दर्ज हैं जब मोदी को भारत की महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
बृजभूषण शरण सिंह
याद कीजिए जब दो बार की विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता विनेश फोगाट और ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक तथा बजरंग पूनिया को सड़कों से घसीट कर पुलिस वैन में डाल दिया गया था. वे मोदी सरकार द्वारा छह बार के भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर लगे यौन उत्पीड़न, हमला, डराने-धमकाने और पीछा करने जैसे गंभीर आरोपों पर कार्रवाई न करने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.
ये मामले सात महिला पहलवानों द्वारा दर्ज कराए गए थे, जिनमें शुरुआत में एक नाबालिक भी शामिल थी. उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता सिंह उस समय भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के अध्यक्ष थे.
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 1974 से 2007 के बीच सिंह के खिलाफ चोरी, डकैती, हत्या, हत्या के प्रयास और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों में कुल 38 मामले दर्ज हुए थे.

उनके चुनावी हलफनामे के मुताबिक, अधिकांश मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया. उन्हें बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में भी गिरफ्तार किया गया था और दाऊद इब्राहिम गिरोह के शूटरों को पनाह देने के आरोप में टाडा के तहत मामला दर्ज हुआ था, लेकिन बाद में इन मामलों में भी उन्हें बरी कर दिया गया.
अपेक्षा के अनुरूप, लगभग एक साल बाद 2024 में दिल्ली की एक अदालत ने महिला पहलवानों की शिकायतों पर उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोप तय किए. पॉक्सो कानून के तहत दर्ज एक अलग मामला बाद में वापस ले लिया गया, जिसे कई लोगों ने दबाव का परिणाम माना.
इसके बावजूद, भाजपा नेतृत्व पर निष्क्रियता को लेकर सार्वजनिक आलोचना के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने उनके बेटे करण भूषण सिंह को 2024 के आम चुनाव में कैसरगंज सीट से पार्टी टिकट दिया. इतना ही नहीं, सिंह के करीबी संजय कुमार सिंह को 2023 में डब्ल्यूएफआई का नया अध्यक्ष चुना गया, जिसके बाद विनेश फोगाट ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी.
इस तरह राजनीतिक संरक्षण जारी रहा और मोदी-शाह ने यह राजनीतिक विरासत बेटे को सौंप दी, जो अब क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं. यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ द्वारा जांच की मांग के बावजूद, बृजभूषण शरण सिंह अदालत में मामलों के लंबित रहने के बावजूद पिछले साल प्रो रेसलिंग लीग के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे, जो दिल्ली से मिल रहे राजनीतिक समर्थन को साफ तौर पर दर्शाता है.
स्वयंभू धर्मगुरुओं को जमानत और पैरोल
शोषण के आरोपों में घिरे स्वयंभू संतों और गुरुओं की सूची लंबी है. गुजरात के आसाराम को 2013 में एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में 2018 में दोषी ठहराया गया था, और 2001 से 2006 के बीच के एक अन्य बलात्कार मामले में 2023 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई.
गांधीनगर की एक अदालत ने जनवरी 2023 में उन्हें उम्रकैद दी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर कई बार अस्थायी जमानत मिलती रही. साल 2025 के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को कई बार बरकरार रखा, और नवंबर 2025 में उन्हें फिर छह महीने के लिए रिहा किया गया.
सबको चौंकाते हुए मार्च 2026 में उन्होंने अयोध्या का दौरा किया और इसके बाद वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन किए. आसाराम ने दावा किया कि उन्होंने यह यात्रा ‘नरक में जाने से बचने’ के लिए की, जबकि सोशल मीडिया पर एक दोषी यौन अपराधी के खुलेआम घूमने को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं.
इसी तरह डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी. साथ ही, आश्रम की गतिविधियों का खुलासा करने वाले एक पत्रकार की हत्या के मामले में भी वह उम्रकैद की सजा काट रहा है. इसके बावजूद, इस साल जनवरी में उन्हें 40 दिन की पैरोल दी गई, जो 2017 से अब तक उनकी 15वीं अस्थायी रिहाई है.
2017 से 2025 के बीच वह कुल 406 दिन जेल से बाहर रहे हैं. यह तथ्य कि उनको बार-बार दी गई पैरोल अक्सर हरियाणा और पंजाब में स्थानीय या राज्य चुनावों के समय के साथ मेल खाती रही है, विपक्ष के बीच सवाल खड़े करता है.
वहीं, 82 वर्षीय स्वयंभू धर्मगुरु वीरेंद्र देव दीक्षित पर दो नाबालिग लड़कियों से बलात्कार और दिल्ली के रोहिणी स्थित उनके ‘आध्यात्मिक विश्वविद्यालय’ में कई महिलाओं और लड़कियों को अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने के आरोप लगे थे. उन्हें 2018 में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में वह फरार हो गए और सीबीआई के लुकआउट नोटिस के बावजूद पकड़ में नहीं आए.
अंततः 2023 में सीबीआई ने विशेष अदालत को बताया कि उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई थी और अब मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
गुजरात के दोषियों को माला पहनाकर स्वागत
2002 के गुजरात के गोधरा दंगों के दौरान पांच महीने की गर्भवती बिलक़ीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों, जिनमें उनकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी, की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों की रिहाई पर हुए स्वागत को लेकर यह कहां था आक्रोश?
उन पर हुआ यह बर्बर हमला यहीं खत्म नहीं हुआ था. गुजरात पुलिस ने शुरुआती दौर में ही आरोपियों के खिलाफ मामला खारिज कर दिया था. बाद में निष्पक्ष सुनवाई के लिए 2004 में मामला महाराष्ट्र स्थानांतरित किया गया. जनवरी 2008 में आरोप तय हुए और 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा.
मार्च 2022 में दो भाजपा विधायकों, एक पूर्व भाजपा पार्षद और महिला मोर्चा की एक सदस्य ने दोषियों की सजा माफी की मांग की. उसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर ‘अच्छे आचरण’ के आधार पर 11 दोषियों को रिहा कर दिया गया. रिहाई के बाद उनका फूल-मालाओं और मिठाइयों के साथ स्वागत किया गया था.
गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस रिहाई के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी ली गई थी, जिसे अमित शाह के गृह मंत्रालय ने स्वीकृति दी थी. हालांकि, इसके बाद हुए वैश्विक आक्रोश के चलते सुप्रीम कोर्ट ने इस रिहाई को ‘भ्रामक तथ्यों’ पर आधारित बताते हुए रद्द कर दिया. इसके बावजूद, 11 दोषियों को दोबारा जेल भेजने में जनवरी 2024 तक का समय लग गया.
कठुआ मामले पर प्रतिक्रिया
दोषियों को राजनीतिक संरक्षण मिलना भले ही असाधारण लगे, लेकिन यौन हिंसा के दोषी अपराधियों को समर्थन मिलना कई बार देखा गया है. ऐसा ही एक मामला जम्मू-कश्मीर के कठुआ में मुस्लिम घुमंतू जनजाति की आठ वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के दोषियों की सजा के खिलाफ हुए जोरदार प्रदर्शनों में देखने को मिला.
8 वर्षीय बच्ची को अगवा किया गया, नशीला पदार्थ खिलाया गया और कई दिनों तक उसके साथ बलात्कार किया गया, और अंततः कठुआ के एक मंदिर में उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई.
बलात्कार के आरोपियों के समर्थन में भाजपा समर्थकों और नेताओं ने तिरंगा लेकर रैली निकाली, जबकि भाजपा महिला मोर्चा ने अभियोजन पक्ष के वकील के खिलाफ नारे लगाते हुए प्रदर्शन किया था.
मामले में कुल सात आरोपी थे, जिनमें मंदिर के पुजारी का एक नाबालिग बेटा भी शामिल था. आरोपियों की गिरफ्तारी के विरोध में आयोजित ‘हिंदू एकता’ रैली को संबोधित करने वाले दो भाजपा राज्य मंत्रियों को जनाक्रोश के बाद इस्तीफा देना पड़ा था.
आखिरकार, तीन साल बाद विशेष अदालत ने आठ वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
तीन पुलिस अधिकारियों को सबूत नष्ट करने का दोषी पाया गया और उन्हें पांच साल की सजा दी गई. नाबालिग आरोपी को अदालत ने बरी कर दिया.
उन्नाव का बलात्कार मामला
पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण, बलात्कार और अवैध बंधक बनाने का आरोप लगा था, और यह सब तब जब वह विधायक पद पर बने हुए थे. पीड़िता द्वारा नामजद किए जाने के बावजूद सेंगर का उत्पीड़न जारी रहा.
शुरुआत में लड़की ने महीनों तक स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की. बाद में सेंगर के गुंडों और पुलिस के दबाव तथा धमकियों से तंग आकर उसने भाजपा के मुख्यमंत्री के आवास के सामने यह कहते हुए आत्मदाह का प्रयास किया कि पुलिस उसकी शिकायत दर्ज नहीं कर रही. इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस मामले पर गया.
इसी दौरान, लड़की के पिता को ही पुलिस ने आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया. पीड़िता द्वारा आत्मदाह के प्रयास के अगले ही दिन, पुलिस हिरासत में चोटों के कारण उनकी मौत हो गई और उन्हें मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया. इसके बाद पुलिस ने सेंगर के खिलाफ मामला दर्ज किया और कहा कि पहले लड़की के बयान में ‘विसंगतियों’ के कारण मामला दर्ज नहीं किया गया था.
लड़की ने हिम्मत नहीं हारी और केस को आगे बढ़ाया, लेकिन इस दौरान एक और हादसा हुआ. जब वह अपनी दो रिश्तेदार महिलाओं और वकील के साथ स्थानीय अदालत में बयान देने जा रही थी, तभी उनकी कार को संदिग्ध परिस्थितियों में एक ट्रक ने टक्कर मार दी. इस हादसे में दोनों महिला रिश्तेदारों की मौत हो गई, जबकि लड़की और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए.
मामला दो साल से अधिक समय तक चलता रहा. अंततः सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई के लिए केस को दिल्ली स्थानांतरित किया. सीबीआई ने सेंगर के खिलाफ बलात्कार का आरोपपत्र दाखिल किया और साथ ही उसके भाई व अन्य सहयोगियों के खिलाफ पीड़िता के पिता को फंसाने और हिरासत में उनकी मौत के लिए अलग आरोपपत्र दायर किया.
अपराध के तीन साल बाद सेंगर को बलात्कार के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई. एक साल बाद, पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में भी सेंगर और अन्य आरोपियों को 10 साल की सजा दी गई.
वर्तमान में सेंगर जेल में बंद हैं, और उनकी सजा पर रोक लगाने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है.


