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इंटरनेट,कंप्यूटर और मोबाइल का मकड़ जाल ।

इंटरनेट,कंप्यूटर और मोबाइल का मकड़ जाल ।

(बिगड़ता आम उपभोक्ता का बजट)


टेलीफोन, मोबाइल, इंटरनेट के अविष्कार के बाद मानवीय संचार माध्यम के अविष्कार के बाद संचार विज्ञान के इतिहास में अत्यंत समीचीन तथा भविष्य का एक तूफानी विकास है। विभिन्न संचार माध्यमों के आपस में जुड़े कंप्यूटर एवं विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का समूह कंप्यूटर नेटवर्क कहा जाता है, और इन्हीं कंप्यूटर नेटवर्क का विश्व स्तरीय अंतरजाल को अंग्रेजी में इंटरनेट कहा जाता है।

अमेरिका में एक दूसरे के सूचना माध्यमों को जोड़कर जानकारी गुप्त रूप से आदान-प्रदान करने के लिए 1969 में अमेरिका में कंप्यूटर में ‘अपारनेट’ की स्थापना की गई थी। इसी परिकल्पना के साथ कंप्यूटर नेटवर्क, आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेटवर्क इंटरनेट के रूप में परिवर्तित हो गया।

इंटरनेट का सार्थक उपयोग समाज में शिक्षा संगठन और भागीदारी की दिशा में एक महत्वपूर्ण पॉजिटिव ट्रैक होने के साथ एक चमत्कारिक परिवर्तन समाज में आया है। आज लोगों के शौक खेलना, पढ़ना ,संगीत सुनना, चित्र बनाना ,फोटोग्राफी परिवर्तित होकर 90% लोगों के इंटरनेट सर्फिंग, संगीत सुनना और चित्र बनाने जैसे शौक इंटरनेट से मोबाइल अथवा कंप्यूटर के माध्यम से पूरे किए जा रहे हैं।

विश्व में जनसंख्या के हिसाब से 4 अरब लोग इंटरनेट कंप्यूटर तथा मोबाइल के माध्यम से सुबह शाम इस्तेमाल कर रहे हैं। भारतीय परिपेक्ष में 135 करोड़ की अनुमानित जनसंख्या वाले देश में लगभग 40% लोग मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग कर एक दूसरे से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

इंटरनेट एक ऐसा सेवक है जो मोबाइल के माध्यम से आपके सभी आदेशों का पालन करने के लिए दिन रात उपलब्ध है। मोबाइल और कंप्यूटर में उपयोग होने वाला इंटरनेट एक ऐसा अंतरजाल है जिस का आविष्कार सूचनाओं को साझा करने के उद्देश्य किया गया था और अब सूचना प्रौद्योगिकी के इस वर्तमान काल में दस्तावेजों एवं धोनी माध्यम के साथ वीडियो का आदान प्रदान करना भी इंटरनेट के माध्यम से संभव हो गया है।

हवाई जहाज की, होटल की, किताबों की और व्यापार बढ़ाने की योजनाओं की बुकिंग इंटरनेट द्वारा घर बैठे कंप्यूटर या मोबाइल से किया जा सकता है। सरकार की प्रशासनिक कार्यों से लेकर व्यापार ,शिक्षा के नव अवसर भी इंटरनेट के माध्यम से पूर्ण किए जाने लगे हैं।

इंटरनेट ने पूरे विश्व को एक दूसरे के एकदम करीब लाने के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी में एक चमत्कारिक परिवर्तन लाया है।


भारत में इस इंटरनेट या अंतरजाल ने जहां पूरे भारत को एक करके रख दिया है वहीं दूसरी तरफ इंटरनेट की सेवाएं जो एयरटेल आइडिया, डोकोमो, टाटा,जिओ और बीएसएनएल जैसी कंपनियां भारतीय उपभोक्ताओं को शहर से लेकर गांव तक अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

दूसरी तरफ पूर्व में जहां गरीब उपभोक्ता ₹10 से लेकर ₹100 तक आसानी से रिचार्ज करा लिया करता था ,अब इंटरनेट की कंपनियां ₹200 से लेकर ₹1000 तक बात करने की सुविधा के साथ इंटरनेट की सुविधा भी साथ में उपलब्ध करा रहे हैं जो सीधे-सीधे आम उपभोक्ता के लिए उनकी आर्थिक स्थिति में सेंध मारने जैसा कार्य है।

हालांकि यह सेवाएं स्वैच्छिक हैं, उपभोक्ता इंटरनेट की सेवाएं लेना चाहे तो ले अन्यथा केवल बातचीत करने की सेवाएं सी ले सकता है,पर एक बार इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदत पड़ने के बाद उपभोक्ता इसका आदी होने लगता है।अब स्थिति यह है कि सीधा 28,58,89 दिनों के लिए इंटरनेट के साथ बात करने की सुविधा महंगी दरों में उपलब्ध कराई जा रही है।

जिससे गरीब उपभोक्ता की जेबों में हमला कर उनका मासिक बजट बिगाड़ने का काम हो रहा है, इस तरह से बात करने की सुविधा के साथ इंटरनेट भी दिया जाना भारत के ग्रामीण क्षेत्र में गरीब व्यक्ति को और भी गरीबी के दलदल में धकेलने जैसा ही है।

यह सभी कंपनियों का गरीब उपभोक्ता के जेबों में सीधे-सीधे पैसे निकालने का सुनियोजित षड्यंत्र की तरह कर रहीं है। भारत के हर तीसरे व्यक्ति के पास एंड्राइड या स्मार्टफोन उपलब्ध है और यह बड़ी कंपनियां हर माह इन उपभोक्ताओं को आवश्यक रूप से इंटरनेट उपलब्ध कराने के पैकेज देकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास कर रही है, इस पर प्रभावी नियंत्रण अति आवश्यक है।

इस तरह के मोबाइल रिचार्ज पर सरकार को कड़ा कानून बनाकर इस के नियमन पर नियंत्रण रखना होगा। यह एक तरह की उपभोक्ताओं की परोक्ष तथा अदृश्य भावनाओं से खेल कर उनके बजट से आर्थिक लाभ लेने की सुनियोजित योजनाएं हैं ,जिनमें तत्काल नियंत्रण की आवश्यकता होगी। भारत में इंटरनेट सेवा की शुरुआत भारत संचार निगम लिमिटेड ने वर्ष 1995 की थी अब एयरटेल, रिलायंस, टाटा इंडीकॉम, वोडाफोन, जैसी दूरसंचार कंपनियां इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराती है।

विज्ञान की प्रकृति के साथ-साथ सूचना संचार माध्यम में आशातीत वृद्धि हुई है। इंटरनेट के माध्यम से न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त की जा सकती बल्कि रोजगार प्राप्ति के लिए सहायक होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कहा जाता है कि इंटरनेट दुनिया के सबसे बड़ा पुस्तकालय है यहां सभी पुस्तकें पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं।

इंटरनेट की एक को ही देखकर हमें भारतीय संदर्भ में आम उपभोक्ताओं के आर्थिक बजट को भी ध्यान में रखकर इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों पर नजर रख बातचीत करने के लिए सेवाएं उपलब्ध कराने के साथ इंटरनेट उपलब्ध कराना एक विकल्प रखना चाहिए ।

अन्यथा सीधा-सीधा इंटरनेट कंपनियां भारतीय आम उपभोक्ताओं का बजट बिगड़ने का काम ही कर रही है।

इसके अलावा इंटरनेट से बच्चों तक अवांछित नग्न दृश्य भी इंटरनेट आसानी से उपलब्ध कराकर उनके भविष्य से खिलवाड़ भी कर रहा है। लोग इंटरनेट का दुरुपयोग कर अश्लील साइटों को देखने और सूचनाओं को चुराने में भी सकते इससे साइबर अपराधों में वृद्धि हुई है।

भया दोहन की घटनाएं भी बार-बार इंटरनेट के माध्यम से आम उपभोक्ताओं को परेशान कर रही है। अतः भारतीय उपभोक्ताओं को यह सलाह है कि इंटरनेट का ज्ञान की तरह उपयोग करें ,कूड़ेदान की तरह नहीं।

यदि इसका सही उपयोग ज्ञान के सागर में गोता लगाने के लिए किया जाए और ज्ञान उपलब्ध हो सके तो इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती। बस इसके आर्थिक पक्ष पर भी समुचित नजर रखी जानी चाहिए।

संजीव ठाकुर, संयोजनकर्ता, चिंतक, लेखक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़

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