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वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने उन्हें भेजी गई विस्तृत सवालों की सूची पर कोई जवाब नहीं दिया.

केंद्र सरकार ने रिज़र्व बैंक को मुद्रास्फीति क़ानून को दरकिनार करने में मदद की
अप्रैल और मई के आंकड़ों को किनारे करने के बाद आरबीआई के पास उदार रुख अपनाने का मौका था


BY सोमेश झा

नई दिल्ली: सूचना का अधिकार अधिनियम के जरिये द रिपोर्टर्स कलेक्टिव (टीआरसी) को मिले दस्तावेज़ दिखाते हैं कि जब देश के केंद्रीय बैंक ने साल 2020 के मुद्रास्फीति लक्ष्य का उल्लंघन किया, तब केंद्र सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की.गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) जनवरी और सितंबर 2020 के बीच लगातार तीन तिमाहियों के लिए मुद्रास्फीति को 6 प्रतिशत की कानूनी रूप से अनिवार्य सीमा के भीतर रखने में असमर्थ रहा था.
भारतीय कानून के तहत, यदि आरबीआई मुद्रास्फीति लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहता है, तो उसे एक महीने के भीतर सरकार को इसका कारण स्पष्ट करना होता है और कीमतों को वापस नियंत्रण में लाने के लिए एक योजना तैयार करनी होती है. इस पारदर्शिता की जरूरत इसलिए है ताकि कारोबार और नागरिक आरबीआई और सरकार की मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने की क्षमता में विश्वास न खो दें.

हालांकि, दस्तावेज दिखाते हैं कि वित्त मंत्रालय ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की मंजूरी के साथ केंद्रीय बैंक को इस नियम से छूट दी.

मंत्रालय ने आरबीआई को सूचित किया कि आधिकारिक मुद्रास्फीति के आंकड़ों का अनुमान एक विशिष्ट अवधि के लिए महामारी के चलते लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन को ध्यान में रखते हुए लगाया गया था और इसलिए वे ब्याज दर निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय नहीं थे.

लेकिन, रिकॉर्ड दिखाते हैं कि इन आंकड़ों का सरकार और उसकी सांख्यिकीय एजेंसियों द्वारा सभी स्तरों पर समर्थन किया गया और सरकार द्वारा अन्य सभी तरह के आर्थिक आकलनों के लिए इन्हें इस्तेमाल में भी लाया गया था.

जैसा कि आंतरिक दस्तावेजों से पता चलता है, वित्त मंत्रालय इस बात से चिंतित था कि केंद्रीय बैंक उस समय कीमतों में वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी शुरू कर देगा, जबकि प्रशासन अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए कम उधारी लागत का समर्थन करता रहा था.

इस संबंध में वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने उन्हें भेजी गई विस्तृत सवालों की सूची पर कोई जवाब नहीं दिया.

उल्लेखनीय है कि मार्च 2020 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए देश में दुनिया का सबसे सख्त राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाया था, उस समय आपूर्ति को लगे झटके के कारण मुद्रास्फीति बढ़ गई थी. इसी दौरान केंद्रीय बैंक अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य से चूक गया.

2016 में आरबीआई गवर्नर के अधीन एक स्वतंत्र मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की स्थापना के बाद ऐसा पहली बार हुआ था. एमपीसी को मुद्रास्फीति के स्तर को नियंत्रित रखने का काम सौंपा गया था, जिसके लिए उसे उन ब्याज दरों को निर्धारित करना होता है, जिस पर वह बैंकों को पैसा उधार देता है.

प्रक्रिया
कानूनन, आरबीआई के लिए उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति (consumer price inflation) को 4 प्रतिशत पर बनाए रखना आवश्यक है- लेकिन इसमें 6 प्रतिशत और 2 प्रतिशत की क्रमशः ऊपरी और निचली सीमा की कुछ गुंजाइश दी जाती है. यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों के लिए इस सीमा को तोड़ती है, तो इसे कानूनी रूप से आरबीआई की ‘विफलता’ माना जाता है. कम ब्याज दरों से अर्थव्यवस्था में अधिक पैसा आता है, जिससे मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ता है. केंद्रीय बैंक ब्याज दर को एडजस्ट करते हुए महंगाई को नियंत्रित करता है.

टीआरसी को प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, 2016 में मौद्रिक नीति ढांचे के लिए नियम तैयार करते समय आरबीआई के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास, जो उस समय आर्थिक मामलों के सचिव थे, को आरबीआई से एक महीने की डेडलाइन मिली थी. साल 2016 में आरबीआई और वित्त मंत्रालय के बीच हुए पत्राचार के अनुसार, आरबीआई भी जवाबदेही रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के पक्ष में भी था.
दास ने 27 जून, 2016 को तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को एक पत्र में लिखा, ‘आरबीआई ने मुद्रास्फीति लक्ष्य को पूरा करने में विफलता के एक महीने के भीतर केंद्र सरकार को इस तरह की [जवाबदेही] रिपोर्ट जमा करने और इस रिपोर्ट को सार्वजनिक- करने के लिए मंजूरी दे दी है. इसलिए, इस प्रावधान को नियमों से निर्धारित नहीं किया गया है और इससे प्रशासनिक रूप से निपटा जा सकता है.’

दुनिया के कुछ अन्य देश जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस, ब्राजील, यूनाइटेड किंगडम, न्यूजीलैंड, नॉर्वे और तुर्की के केंद्रीय बैंक जवाबदेही तंत्र के अंतर्गत सरकार को संबोधित करने के लिए इसी तरह एक खुला पत्र लिखने की रीत का पालन करते हैं.
कोविड-19 के बाद की मौद्रिक नीति
मार्च 2020 के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से पहले ही भारत की मुद्रास्फीति आरबीआई के तय लक्ष्य से ऊपर जाने लगी थी. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) अक्टूबर-दिसंबर 2019 के 5.8 प्रतिशत से बढ़कर जनवरी-मार्च 2020 में औसतन 6.7 प्रतिशत हो गया था.

देशव्यापी लॉकडाउन के कुछ दिनों के भीतर आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने मार्च में अपने वैश्विक साथियों के नक्शेकदम पर चलते हुए रेपो दर- जिस दर पर बैंक आरबीआई से उधार लेते हैं, में 75 आधार अंकों से 4.4 प्रतिशत तक बड़ी कटौती की. मई में एक और कटौती की गई, जिससे यह दर 4 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई.

लगभग उसी समय, ब्राजील, मेक्सिको और दक्षिण अफ्रीका सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों ने वृद्धि वापस लाने के लिए दरों में दो सौ से अधिक आधार अंकों की कटौती की थी. साल 2020 में उनकी मुद्रास्फीति की औसत दर अधिकतर महामारी के पहले के स्तर पर और अधिक महत्वपूर्ण रूप से, उनके संबंधित केंद्रीय बैंकों के लक्ष्यों के भीतर ही रही.

लेकिन भारत में अप्रैल-जून 2020 की मुद्रास्फीति 6.6 प्रतिशत के उच्च स्तर पर बनी रही, जो जुलाई-सितंबर में और अधिक बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो गई. जनवरी-मार्च तिमाही के 6.7 प्रतिशत के साथ मिलाकर देखें, तो मुद्रास्फीति के लगातार तीन तिमाहियों के लिए 6 प्रतिशत के भीतर रहने के कानूनी आदेश का उल्लंघन हुआ था.

जब अगस्त में एमपीसी की बैठक हुई तो उसे यह जानकारी थी कि वह अपने कानूनी आदेश का उल्लंघन करने की कगार पर है. बैठक में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा ने स्वीकार किया था कि मुद्रास्फीति स्वीकृत ‘ऊपरी सीमा के पार’ गई है.

लेकिन एमपीसी ने यह तर्क देते हुए कि सांख्यिकी मंत्रालय ने उन आंकड़ों का अनुमान ‘इम्प्यूटेशन’ नाम की एक अलग पद्धति से लगाया था, अप्रैल से जून तक के आंकड़ों को नजरअंदाज करने का फैसला किया.

मामला कैसे आगे बढ़ा
इसके बाद सितंबर में वित्त मंत्रालय ने ‘मौद्रिक नीति ढांचे के तहत मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने में विफलता के परिणामों पर नोट’ नाम के एक आंतरिक नोट में आरबीआई के कदम का बचाव किया और कहा कि इम्प्यूटेशन प्रक्रिया के कारण मुद्रास्फीति अनुमान ‘कृत्रिम रूप से’ अधिक और ‘अवास्तविक’ थे.
सरकार को डर था कि रिज़र्व बैंक मुद्रास्फीति को काबू करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी शुरू कर देगा, जिससे कारोबारों के लिए उच्च उधारी लागत आएगी जबकि अर्थव्यवस्था पहले से ही मंदी में चल रही थी. अप्रैल और मई के आंकड़ों को किनारे करने के बाद आरबीआई के पास उदार रुख अपनाने का मौका था, जिसने इसे ब्याज दरों में कटौती का अवसर दिया.

उसी नोट में वित्त मंत्रालय ने कहा कि मौद्रिक नीति निर्धारित करने के लिए ‘अप्रामाणिक’ इम्प्यूटेड सीपीआई डेटा के इस्तेमाल से ‘बचा जाना चाहिए’ क्योंकि ऐसा करने से ‘आरबीआई की ओर से मौद्रिक सख्ती के असामान्य और प्रतिकूल’ तरीके अपनाए जा सकते हैं, वो भी तब जब व्यापक आर्थिक स्थिति कमजोर है और इसके परिणाम विकृत और अराजक होंगे.’

इसके साथ-साथ ही वित्त मंत्रालय ने मुद्रास्फीति के आंकड़ों को खारिज करने के अपने फैसले पर सांख्यिकी मंत्रालय के विचार मांगे. मंत्रालय अपने अनुमानों पर कायम रहा और वित्त मंत्रालय को याद दिलाया कि उसने मुद्रास्फीति के आंकड़े उनकी मंजूरी के बाद ही जारी किए थे. दो महीनों के मुद्रास्फीति के अनुमानों को सरकार के विशेषज्ञ सांख्यिकीय निकाय- टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी ऑन स्टैटिस्टिक्स ऑफ प्राइसेस एंड कॉस्ट ऑफ लाइफ (कीमतों और जीवन यापन लागत की सांख्यिकी संबंधी तकनीकी सलाहकार समिति) की भी मंजूरी मिली हुई थी.

अन्य एजेंसियां ​​भी नागरिकों की मुश्किल बढ़ाने वाली ऊंची कीमतों की ओर इशारा कर रही थीं.

जुलाई 2020 की अपनी शोध रिपोर्ट में देश के सबसे बड़े बैंक- भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अपने अनुमानों में पाया कि अप्रैल-जून तिमाही में भारत में खुदरा मुद्रास्फीति आधिकारिक अनुमानों की तुलना में बहुत अधिक थी. इसकी गणना में अप्रैल में 7.22 प्रतिशत के आधिकारिक आंकड़े की बजाय सीपीआई मुद्रास्फीति 9.68 प्रतिशत और मई के 6.27 प्रतिशत के आधिकारिक अनुमान के बजाय 7.82 प्रतिशत दिखाई गई.

लेकिन वित्त मंत्रालय और आरबीआई दोनों ने ब्याज दरों को निर्धारित करने के उद्देश्य से अप्रैल-जून तिमाही मुद्रास्फीति के आंकड़ों को खारिज करने का फैसला किया.

सितंबर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की मंजूरी के साथ तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव तरुण बजाज, जो अब राजस्व सचिव हैं, ने आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास को पत्र लिखकर कहा कि मौद्रिक नीति के निर्माण और संचालन के दृष्टिकोण से अप्रैल-जून, 2020 के लिए मुद्रास्फीति के आंकड़े अर्थव्यवस्था में प्रचलित मूल्य स्थिति की असल हालत नहीं दर्शाते हैं.’

बजाज ने यह भी कहा कि इसलिए अब मुद्रास्फीति लक्ष्य के लिए ‘जवाबदेही जुलाई 2020 से शुरू होने वाली तिमाही से लागू होगी.आरबीआई को छूट दी गई और जवाबदेही के तंत्र को कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया

पारदर्शिता की कमी
अक्टूबर 2020 में जब आरबीआई ने अपने नियमित पारदर्शिता प्रयासों के तहत अपनी अर्द्धवार्षिक मौद्रिक नीति रिपोर्ट जारी की, तो उसने सरकार से मिली इस छूट का जिक्र नहीं किया.

फरवरी 2021 में आरबीआई ने मौद्रिक नीति ढांचे की समीक्षा शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की. जवाबदेही पर एक अध्याय में इसने कहा: ‘अक्टूबर 2016 और मार्च 2020 के बीच एफआईटी (फ्लेक्सिबल मुद्रास्फीति लक्ष्य) को अपनाने के बाद से इस परिभाषा के अनुसार एमपीसी द्वारा किसी विफलता का सामना नहीं किया गया.’ रिपोर्ट में साल 2020 की विवादास्पद अप्रैल तिमाही के लिए एमपीसी के ट्रैक रिकॉर्ड को सुविधाजनक रूप से छोड़ दिया गया.

आरबीआई ने यह उल्लेख भी नहीं किया कि सरकार ने इसे मुद्रास्फीति लक्ष्य से पिछड़ने के कारणों का स्पष्टीकरण और इसमें सुधार के लिए उठाए जाने वाले क़दमों की जानकारी लिखित में देने से छूट दी थी.
इसी तरह के डेटा मुद्दों का सामना करने के बावजूद अन्य केंद्रीय बैंकों ने अपनी जवाबदेही प्रक्रिया का पालन करना चुना. मई 2020 में यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बैंक ऑफ इंग्लैंड के अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य से चूकने के बाद इसने यूके सरकार को इसकी वजह- जिसमें डेटा इकट्ठा करने से जुड़ी समस्याएं बताते हुए एक खुला पत्र लिखा था.

भारतीय सांख्यिकी संस्थान के प्रोफेसर चेतन घाटे, जो 2016 से 2020 तक एमपीसी के सदस्य रहे हैं, ने अगस्त 2021 में इन्फॉर्मिस्ट समाचार एजेंसी के साथ एक साक्षात्कार में कहा था कि एमपीसी अगर यह स्वीकार कर लेती कि वह मुद्रास्फीति संभालने में विफल रही है, तो इसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती.

घाटे ने कहा, ‘तो महामारी के साल में- जो शायद किसी एक सदी में एक बार होने वाली घटना है, के बीच अगर समिति अपने लक्ष्य को पूरा नहीं करती है क्योंकि उसे लगता है कि विकास संबंधी चिंताओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है, मैं समझता हूं कि अगर एमपीसी ने यह कहा होता कि विकास पर अधिक ध्यान देने की जरूरत के चलते वह अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य को पूरा करने में सक्षम नहीं रही, तब शायद एमपीसी को अधिक विश्वसनीयता मिलती.’

कोलंबिया विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय और सार्वजनिक मामलों के सहायक प्रोफेसर और बैंक ऑफ इंग्लैंड की मौद्रिक नीति समिति के पूर्व बाहरी सदस्य विलियम बुइटर, जिन्हें पहले आरबीआई द्वारा व्याख्यान देने के लिए भी आमंत्रित किया गया है, का कहना है कि भारत के केंद्रीय बैंक को साल 2020 में अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य से ‘छोटे से अंतर से’ चूकने को लेकर ‘इतना शर्मिंदा’ नहीं होना चाहिए.

टीआरसी को एक ईमेल में उन्होंने कहा, ‘आरबीआई को सरकार को विफलता के कारणों, सुधारात्मक उपायों और उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति के 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर वापस आने की समयसीमा के बारे में स्पष्टीकरण देता हुआ खुला पत्र लिखने वाले नियम से छूट नहीं मिलनी चाहिए.

उन्होंने जोड़ा, ‘उन्हें पत्र लिखना चाहिए था, उसमें मार्च 2020 में पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों की ओर इशारा करते हुए यह तर्क देते कि यह तकनीकी ‘विफलता’ असल में एक मामूली सफलता थी.’

वहीं, इस बार आरबीआई नियमों में बदलाव के जरिये और अधिक छूट पाने की सोच रहा है. इसकी फरवरी 2021 की रिपोर्ट में मुद्रास्फीति लक्ष्य को पूरा करने में ‘विफलता’ की परिभाषा को आसान बनाने का आग्रह किया गया है, साथ ही यह भी कहा कि सरकार को मुद्रास्फीति के स्तर को 2 से 6 प्रतिशत के बीच बनाए रखने की अवधि को मौजूदा तीन के बजाय लगातार चार तिमाहियों तक बढ़ाना चाहिए.(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में अल जज़ीरा पर प्रकाशित हुई है.)

(सोमेश झा द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के सदस्य हैं.)

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