एआई सममिट बनी राजनीति का अखाड़ा?
सौरभ वार्ष्णेय
देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर नीतिगत चर्चा और वैश्विक सहयोग के उद्देश्य से आयोजित (एआई सममिट ) 2026 में कांग्रेस के हंगामे ने पूरे आयोजन का फोकस बदल दिया। जिस मंच पर तकनीक, नवाचार और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर गंभीर विमर्श होना चाहिए था, वहां राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हावी हो गए। सवाल यह है कि क्या यह विरोध लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक था या फिर तकनीक जैसे महत्वपूर्ण विषय को भी राजनीतिक रंग दे दिया गया?
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ्रढ्ढ नीति के नाम पर बड़े कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचा रही है और डेटा सुरक्षा, रोजगार तथा पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर स्पष्टता नहीं दे रही। विपक्ष का यह दायित्व है कि वह सरकार से जवाब मांगे। लोकतंत्र में सवाल उठाना आवश्यक भी है। लेकिन विरोध का तरीका ऐसा हो, जिससे मूल विषय हाशिए पर न चला जाए।दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि एआई भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और प्रशासन में ढूंढ के उपयोग से क्षमता बढ़ेगी। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच पर आयोजित सम्मेलन में व्यवधान भारत की छवि को भी प्रभावित कर सकता है।
असल चिंता यह है कि एआई केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम है। रोजगार के अवसरों में बदलाव, डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और डिजिटल असमानता जैसे प्रश्नों पर व्यापक सहमति बनाना जरूरी है। यदि विपक्ष के पास ठोस सुझाव हैं, तो उन्हें रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
राजनीति और तकनीक के इस टकराव में सबसे अधिक नुकसान उस बहस का होता है, जो देश के भविष्य से जुड़ी है।एआई पर राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता है—जहां सरकार पारदर्शिता दिखाए और विपक्ष सकारात्मक भूमिका निभाए। हंगामे से सुर्खियां मिल सकती हैं, लेकिन समाधान संवाद से ही निकलेगा।
एआई समिट 2026 का उद्देश्य था—भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता की वैश्विक दौड़ में अग्रणी बनाना। लेकिन सम्मेलन के दौरान कांग्रेस के हंगामे ने बहस को तकनीकी मुद्दों से हटाकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर दिया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस मंच पर डेटा सुरक्षा, स्टार्टअप इकोसिस्टम, रोजगार सृजन और नवाचार पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए थी, वहां राजनीतिक शोर अधिक सुनाई दिया।
कांग्रेस का तर्क है कि एआई नीति में पारदर्शिता की कमी है और इससे छोटे उद्यमों व आम युवाओं की बजाय चुनिंदा कंपनियों को लाभ मिल सकता है। यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती। नई तकनीकों के साथ नियमन, जवाबदेही और सामाजिक प्रभाव का सवाल स्वाभाविक रूप से जुड़ा होता है।
परंतु सवाल यह भी है कि क्या विरोध का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि प्रभावित हो? भारत जब वैश्विक निवेश और तकनीकी साझेदारी की ओर बढ़ रहा है, तब आंतरिक राजनीतिक मतभेदों को संवाद और संसदीय बहस के जरिए सुलझाना अधिक उचित होता।
एआई आने वाले समय में प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग के ढांचे को बदल देगा। इससे रोजगार के नए अवसर बनेंगे, लेकिन पारंपरिक नौकरियों पर असर भी पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार स्पष्ट रोडमैप पेश करें और विपक्ष रचनात्मक सुझाव दे।
तकनीक के इस युग में प्रतिस्पर्धा केवल देशों के बीच नहीं, बल्कि विचारों के स्तर पर भी है। यदि राजनीति तकनीक पर हावी हो गई, तो देश की प्रगति की गति धीमी पड़ सकती है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, पर समाधान के लिए संवाद उससे भी अधिक जरूरी है। लेखक आईडब्ल्युएनए में दिल्ली में मुख्य संवाददाता है।


