सेवा का मंदिर या अपमान का मंच ?
कलायत की एसबीआई शाखा पर उठते गंभीर सवाल
वरिष्ठ नागरिक, पूर्व सैनिक और शहीद परिवार तक को नहीं मिला सम्मान क्या बैंकिंग व्यवस्था संवेदनहीनता की ओर बढ़ रही है ?
कलायत /29 अप्रैल /अटल हिन्द ब्यूरो
किसी भी राष्ट्र की बैंकिंग व्यवस्था केवल वित्तीय लेन देन का माध्यम नहीं होती। बल्कि वह नागरिकों के विश्वास, सुरक्षा और गरिमा की आधारशिला होती है। जब यही संस्थान आमजन के लिए भय, अपमान और असहजता का कारण बनने लगें तो यह केवल एक शाखा की समस्या नहीं रह जाती।यह पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी बन जाती है।
हरियाणा के कलायत स्थित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की ग्रेन मार्किट शाखा इन दिनों गंभीर आरोपों के केंद्र में है। यह आरोप किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। बल्कि वरिष्ठ नागरिकों, पूर्व सैनिकों और शहीद परिवारों के अनुभवों से निर्मित एक व्यापक और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
21 अप्रैल 2026 को एक 67 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक को स्वयं बैंक द्वारा सेटलमेंट ऑफ क्लेम प्रक्रिया हेतु शाखा में बुलाया जाता है। अपेक्षा होती है।सहयोग, संवेदनशीलता और स्पष्ट मार्गदर्शन की। परंतु जो अनुभव सामने आता है, वह इन अपेक्षाओं के ठीक विपरीत है। टालमटोल, कथित दुर्व्यवहार और सुरक्षा कर्मी को बुलाकर भय का वातावरण। क्या यह वही बैंक है जिस पर देश की करोड़ों जनता भरोसा करती है?
घटना यहीं समाप्त नहीं होती। गांव बालू की शहीद कैप्टन पूनम की स्मृति से जुड़े परिवार के साथ कथित असंवेदनशील व्यवहार का आरोप इस पूरे प्रकरण को और भी गंभीर बना देता है।
जिस परिवार को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए। जिस पर हम सबको गर्व हैं। यदि उस बेबस पिता को एसबीआई बैंक में ही उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़े तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं पूरी तरह से नैतिक विफलता है। शहीद बेटी के पिता रामेश्वर का आरोप हैं की क्या कोई बैंक एक बेटी की शहादत को इस प्रकार उपहास बना सकता है। यह कल्पना से कहीं परे हैं।
एक पूर्व सैनिक सुभाष निवासी ढूंढ़वा का कथन हैं कि “अपने ही खाते की जानकारी के लिए आधार कार्ड दिखाने के बावजूद जानकारी नहीं दी गई”
यह केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि एक गहरी समस्या की ओर संकेत करता है।
पासबुक को अनिवार्य बताकर ग्राहकों को जानकारी से वंचित करना क्या यह बैंकिंग नियम है या सुविधा के नाम पर उत्पीड़न नहीं हैं ?
गंभीर पहलू यह है कि इन घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है।
गंभीर पहलू यह है कि इन घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है।
जानकारी देने में टालमटोल। शिकायतों पर केवल मौखिक माफी। जाहिर सी बात हैं कि यदि शिकायत निवारण तंत्र ही निष्क्रिय हो जाए तो आम नागरिक कंहा जाए? कुछ समय पूर्व ओडिशा के भुवनेश्वर के क्योंझर जिले में एक ऐसी हृदय विदारक घटना सामने आई जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।
एक आदिवासी व्यक्ति जीतू मुंडा गांव जियानाली निवासी को अपनी दिवंगत बहन के बैंक खाते में जमा ₹19300 की राशि प्राप्त करने के लिए इतनी बाधाओं का सामना करना पड़ा कि वह मजबूर होकर कब्र से पत्नी का कंकाल निकालकर बैंक ले गया।
ताकि वह उसकी बहन का जीवित प्रमाण दे सके। यह घटना केवल एक समाचार नहीं हैं ! यह उस संवेदनहीनता का चरम रूप हैं। जहां नियमों की आड़ में मानवीयता का गला घोंट दिया गया। आज प्रश्न यह है की क्या कलायत एसबीआई ब्रांच की स्थिति भी उसी दिशा में बढ़ रही है ?
किसी भी शाखा प्रबंधक का दायित्व केवल माफी मांगना नहीं होता। उनकी जिम्मेदारी हैं कि शिकायतों का विधिवत पंजीकरण हो। उच्च अधिकारियों को रिपोर्टिंग। जांच सुनिश्चित करना व पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक हैं। यदि शाखा प्रमुख का मोबाइल विवाद के समय बंद मिले तो यह केवल संयोग नहीं प्रणालीगत समस्या का संकेत है।
नए आपराधिक कानूनों के तहत ऐसे मामलों को केवल सेवा में कमी मानकर टाला नहीं जा सकता। भारतीय न्याय संहिता की धारा 351 (आपराधिक धमकी) और धारा 352 (जानबूझकर अपमान) जैसे प्रावधान इस प्रकार के आचरण की गंभीरता को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया का लोकपाल तंत्र भी स्पष्ट करता है कि बैंकिंग सेवाओं में कमी पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यह चेतावनी है और अवसर भी। कलायत की यह घटना केवल एक शाखा का मामला नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न को जन्म देती है की क्या हमारी बैंकिंग व्यवस्था अभी भी जन सेवा के मूल सिद्धांत पर खड़ी है या वह धीरे-धीरे संवेदनहीनता की ओर बढ़ रही है ?
जब वरिष्ठ नागरिक अपमानित हो। जब पूर्व सैनिक उपेक्षित हो। जब शहीद परिवार असहाय महसूस करे तो यह केवल शिकायत नहीं एक सामाजिक चेतावनी है।
अब समय जांच का जवाबदेही का और सबसे महत्वपूर्ण मानवीय संवेदनशीलता को पुनः स्थापित करने का हैं ।
अब समय जांच का जवाबदेही का और सबसे महत्वपूर्ण मानवीय संवेदनशीलता को पुनः स्थापित करने का हैं ।
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