दूध-दही का खाणा, यो मेरा हरियाणा’: 1966 से 2026 तक की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक महागाथा

हरियाणा: एक समृद्ध लेकिन चुनौतियों भरा राज्य – निर्माण से 2026 तक की पूरी कहानी
हरियाणा—भारत का वह राज्य जिसने देश को अन्न दिया, सेना को जवान दिए और खेल के मैदानों में तिरंगे की शान बढ़ाई। 1 नवंबर 1966 को जब पंजाब से अलग होकर एक नए राज्य के रूप में हरियाणा का जन्म हुआ, तब कई लोगों को लगता था कि यह छोटा सा राज्य अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। लेकिन आज, वर्ष 2026 में, हरियाणा देश के सबसे समृद्ध और चर्चा में रहने वाले राज्यों में से एक है। 44,212 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले और 2011 की जनगणना के अनुसार करीब ढाई करोड़ (जो वर्तमान में और बढ़ चुकी है) की आबादी वाले इस राज्य की अपनी एक अनूठी तासीर है। यहाँ की राजनीति, यहाँ की चौधर, यहाँ के किसान, व्यापारी और यहाँ के सरकारी स्कूलों की दशा-दुर्दशा की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितनी कि यहाँ की लोकभाषा।
आइए, हरियाणा के गठन से लेकर वर्ष 2026 तक के सफर का, इसके नायकों और खलनायकों का, इसके शहरों और गाँवों का एक विस्तृत और बेबाक विश्लेषण करते हैं।
राजनीतिक सफरनामा: सत्ता के गलियारे और मुख्यमंत्रियों का इतिहास
हरियाणा की राजनीति को समझने के लिए यहाँ के ‘लाल त्रिमूर्ति’ (बंसीलाल, देवीलाल, भजनलाल) और ‘आया राम, गया राम‘ की संस्कृति को समझना जरूरी है। राज्य में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं, जबकि 10 लोकसभा और 5 राज्यसभा सीटें देश की संसद में यहाँ का प्रतिनिधित्व करती हैं।
हरियाणा के मुख्यमंत्रियों की सूची और उनका कार्यकाल:
गठन से लेकर अब तक (2026) राज्य की सत्ता की कमान संभालने वाले मुख्यमंत्रियों का ब्यौरा इस प्रकार है
| क्र.सं. | मुख्यमंत्री का नाम | कार्यकाल (कब से कब तक) | राजनीतिक दल |
| 1 | पंडित भगवत दयाल शर्मा | 1 नवंबर 1966 – 23 मार्च 1967 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 2 | राव वीरेंद्र सिंह | 24 मार्च 1967 – 2 नवंबर 1967 | विशाल हरियाणा पार्टी |
| – | राष्ट्रपति शासन | 2 नवंबर 1967 – 22 मई 1968 | – |
| 3 | चौधरी बंसीलाल | 22 मई 1968 – 30 नवंबर 1975 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 4 | बनारसी दास गुप्ता | 1 दिसंबर 1975 – 30 अप्रैल 1977 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| – | राष्ट्रपति शासन | 30 अप्रैल 1977 – 21 जून 1977 | – |
| 5 | चौधरी देवीलाल | 21 जून 1977 – 28 जून 1979 | जनता पार्टी |
| 6 | चौधरी भजनलाल | 28 जून 1979 – 5 जुलाई 1985 | जनता पार्टी / कांग्रेस |
| 7 | चौधरी बंसीलाल (दूसरी बार) | 5 जुलाई 1985 – 20 जून 1987 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 8 | चौधरी देवीलाल (दूसरी बार) | 20 जून 1987 – 2 दिसंबर 1989 | जनता दल |
| 9 | ओम प्रकाश चौटाला | 2 दिसंबर 1989 – 22 मई 1990 | जनता दल |
| 10 | बनारसी दास गुप्ता (दूसरी बार) | 22 मई 1990 – 12 जुलाई 1990 | जनता दल |
| 11 | ओम प्रकाश चौटाला (दूसरी बार) | 12 जुलाई 1990 – 17 जुलाई 1990 | जनता दल |
| 12 | चौधरी हुकम सिंह | 17 जुलाई 1990 – 22 मार्च 1991 | जनता दल |
| 13 | ओम प्रकाश चौटाला (तीसरी बार) | 22 मार्च 1991 – 6 अप्रैल 1991 | समाजवादी जनता पार्टी |
| – | राष्ट्रपति शासन | 6 अप्रैल 1991 – 23 जून 1991 | – |
| 14 | चौधरी भजनलाल (दूसरी बार) | 23 जून 1991 – 10 मई 1996 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| 15 | चौधरी बंसीलाल (तीसरी बार) | 11 मई 1996 – 24 जुलाई 1999 | हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) |
| 16 | ओम प्रकाश चौटाला (चौथी बार) | 24 जुलाई 1999 – 4 मार्च 2005 | इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) |
| 17 | भूपिंदर सिंह हुड्डा | 5 मार्च 2005 – 26 अक्टूबर 2014 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (लगातार दो कार्यकाल) |
| 18 | मनोहल लाल खट्टर | 26 अक्टूबर 2014 – 12 मार्च 2024 | भारतीय जनता पार्टी (लगातार दो कार्यकाल) |
| 19 | नायब सिंह सैनी | 12 मार्च 2024 – वर्तमान (2026) | भारतीय जनता पार्टी |
चमचमाता गुरुग्राम या नशे में डूबता युवा? 1966 से 2026 तक का वो हरियाणा, जिसे राजनेता आपसे छुपाते रहे!

संवैधानिक मुखिया: हरियाणा के राज्यपालों की सूची
हरियाणा के राजभवन की कमान संभालने वाले राज्यपालों का इतिहास भी बेहद समृद्ध रहा है। फिलहाल (वर्ष 2026 में) प्रोफेसर असीम कुमार घोष प्रदेश के 19वें राज्यपाल हैं, जिन्होंने जुलाई 2025 में पदभार संभाला था। शुरुआत से लेकर अब तक के राज्यपालों की सूची इस प्रकार है:
धर्म वीरा (1966 – 1967)
बीरेंद्र नारायण चक्रवर्ती (1967 – 1976) — इनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा।
रणजीत सिंह नरूला (1976)
जयसुख लाल हाथी (1976 – 1977)
हरचरण सिंह बरार (1977 – 1979)
सुरजीत सिंह संधावालिया (1979 – 1980)
गणपतराव देवजी तपासे (1980 – 1984)
सैय्यद मुजफ्फर हुसैन बर्नी (1984 – 1988)
हरि आनंद बरारी (1988 – 1989)
धनिक लाल मंडल (1990 – 1995)
महावीर प्रसाद (1995 – 2000)
बाबू परमानंद (2000 – 2004)
ओम प्रकाश वर्मा (2004)
एआर किदवई (2004 – 2009)
जगन्नाथ पहाड़िया (2009 – 2014)
कप्तान सिंह सोलंकी (2014 – 2018)
सत्यदेव नारायण आर्य (2018 – 2021)
बंडारू दत्तात्रेय (2021 – 2025)
प्रो. असीम कुमार घोष (2025 – वर्तमान 2026)
लोकप्रियता का पैमाना: सबसे लोकप्रिय और सबसे नापसंदीदा नेता
हरियाणा की जनता जितनी भोली है, राजनीतिक रूप से उतनी ही सजग है। यहाँ नेताओं को सिर-आंखों पर भी बिठाया जाता है और वक्त आने पर उनकी ‘चौधर’ छीन भी ली जाती है। सार्वजनिक चर्चाओं, चुनावी इतिहास और जनभावनाओं के आधार पर लोकप्रिय और नापसंदीदा नेताओं का विश्लेषण कुछ इस तरह है:
अटल हिन्द स्पेशल: हरियाणा के सबसे चहेते और सबसे नफ़रत वाले नेता कौन? जानिए 60 सालों का पूरा काला-सफेद इतिहास।
हरियाणा के सबसे लोकप्रिय नेता (जनता के चहेते)
चौधरी देवीलाल (ताऊ देवीलाल):
हरियाणा के इतिहास में अगर किसी नेता को सबसे ज्यादा सम्मान मिला है, तो वो हैं ‘ताऊ’ देवीलाल। वे सिर्फ हरियाणा के मुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि देश के उप-प्रधानमंत्री भी बने। किसानों, ग्रामीणों और बुजुर्गों के लिए ‘बुढ़ापा पेंशन’ शुरू करने वाले ताऊ को आज भी हरियाणा की संस्कृति का असली प्रतीक माना जाता है। उनकी एक आवाज पर पूरा हरियाणा उठ खड़ा होता था। उनका ‘न्याय युद्ध’ आंदोलन आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
. चौधरी बंसीलाल (आधुनिक हरियाणा के निर्माता):
बंसीलाल अपनी कड़क प्रशासनिक क्षमता के लिए जाने जाते थे। उन्हें ‘आधुनिक हरियाणा का निर्माता’ कहा जाता है। उन्होंने 1970 के दशक में हरियाणा के हर गाँव तक बिजली पहुँचाने का जो कीर्तिमान रचा, उसने राज्य की तकदीर बदल दी। सड़कों का जाल बिछाना और नहरों के जरिए पानी पहुँचाना उनकी बड़ी उपलब्धि थी।
चौधरी भजनलाल (राजनीति के चाणक्य):
गैर-जाट राजनीति के सिरमौर और ‘बिश्नोई रत्न’ चौधरी भजनलाल को हरियाणा की राजनीति का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता है। जोड़-तोड़ की राजनीति में उनका कोई सानी नहीं था। उन्होंने समाज के हर छोटे-बड़े वर्ग (विशेषकर व्यापारी और गैर-जाट जातियों) को सत्ता में हिस्सेदारी का अहसास कराया।
भूपिंदर सिंह हुड्डा (विकास पुरुष का तमगा):
कांग्रेस के भूपिंदर सिंह हुड्डा ने लगातार 10 साल (2005-2014) राज किया। उनके कार्यकाल में गुड़गांव (गुरुग्राम) और रोहतक-झज्जर बेल्ट का अभूतपूर्व औद्योगिक विकास हुआ। किसानों के कर्ज माफ करने और ‘नंबर वन हरियाणा’ का नारा बुलंद करने के कारण वे आज भी जाट लैंड और ग्रामीण इलाकों में खासे लोकप्रिय हैं।
हरियाणा के सबसे नापसंदीदा नेता (जनता की नाराजगी का शिकार)
हरियाणा की राजनीति में कोई भी नेता स्थायी रूप से नापसंदीदा नहीं होता, लेकिन कुछ नेताओं के फैसलों या उनके कार्यकाल की घटनाओं ने जनता के एक बड़े वर्ग को उनका धुर विरोधी बना दिया।
ओम प्रकाश चौटाला (इनेलो प्रमुख):
हालांकि चौटाला साहब ने ग्रामीण स्तर पर ‘सरकार आपके द्वार’ जैसे बेहतरीन कार्यक्रम चलाए, लेकिन उनके कार्यकाल में ‘पर्ची और खर्ची’ (भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद) के आरोपों ने उनकी छवि को भारी नुकसान पहुँचाया। जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाले में उन्हें और उनके बेटे अजय चौटाला को 10 साल की सजा हुई, जिससे जनता के बीच यह संदेश गया कि युवाओं के हक पर डाका डाला गया। उनके राज में ‘अफ़सरशाही और गुंडागर्दी’ के आरोपों के चलते वे शहरी और मध्यम वर्ग के सबसे नापसंदीदा नेताओं में शुमार हो गए।
मनोहर लाल खट्टर (पूर्व मुख्यमंत्री):
साल 2014 में जब भाजपा की सरकार बनी, तो मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने ‘पोर्टल की सरकार’ चलाई और बिना पर्ची-बिना खर्ची के नौकरियां देने का दावा किया। लेकिन उनके कार्यकाल में तीन बड़े हिंसक आंदोलन हुए—रामपाल विवाद (2014), जाट आरक्षण आंदोलन (2016), और डेरा सच्चा सौदा हिंसा (2017)। इन आंदोलनों में दर्जनों निर्दोष लोग मारे गए और अरबों रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई। इसके अलावा ‘फैमिली आईडी’ (पीपीपी) और ‘प्रॉपर्टी आईडी’ जैसे पोर्टलों के चक्कर में आम जनता इतनी परेशान हुई कि खट्टर साहब के प्रति भारी नाराजगी फैल गई, जिसके चलते आखिरकार 2024 में भाजपा को उनका चेहरा बदलना पड़ा।
सामाजिक और सांस्कृतिक ताना-बाना (2026 की स्थिति)
हरियाणा का समाज मूलतः कृषि प्रधान और खाप पंचायतों के प्रभाव वाला समाज रहा है। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में यहाँ का सामाजिक ढांचा तेजी से बदला है।
जातिगत समीकरण और खापें: हरियाणा की राजनीति और समाज ‘जाट बनाम गैर-जाट’ के ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। राज्य में करीब 25-27% जाट आबादी है, जो पारंपरिक रूप से खेती-किसानी से जुड़ी है और सत्ता की चाबी अपने पास रखना चाहती है। वहीं दूसरी ओर ओबीसी (सैनी, यादव, गुर्जर आदि), ब्राह्मण, बनिया, पंजाबी और अनुसूचित जाति का एक बड़ा ब्लॉक है। खाप पंचायतें आज भी ग्रामीण इलाकों में सामाजिक फैसले लेती हैं, लेकिन अब युवाओं के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण खापों के फैसलों में भी लचीलापन आया है।
लिंगानुपात में सुधार (बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ): एक दौर था जब हरियाणा को ‘बेटियों को पेट में मारने वाला प्रदेश’ कहकर बदनाम किया जाता था। साल 2011 में यहाँ का लिंगानुपात महज 879 था। लेकिन पिछले एक दशक में सरकारी कड़ाई, सामाजिक जागरूकता और हरियाणा की बेटियों (जैसे फोगट बहनें, साक्षी मलिक, मन्नू भाकर) द्वारा खेल जगत में किए गए चमत्कारों ने मानसिकता बदली है। आज 2026 में हरियाणा का लिंगानुपात सुधरकर 920 के पार पहुँच चुका है, जो एक बड़ी सामाजिक जीत है।
ग्रामीण बनाम शहरी हरियाणा: दो दुनिया का अंतर
हरियाणा में आज भी दो तरह के राज्य बसते हैं—एक ‘शहरी-चमकता हुआ हरियाणा’ और दूसरा ‘ग्रामीण-ठेठ हरियाणा’।
शहरी हरियाणा (गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकुला)
गुरुग्राम (गुड़गांव) को आज ‘मिलेनियम सिटी’ कहा जाता है। यह फॉर्च्यून 500 कंपनियों का गढ़ है। यहाँ की गगनचुंबी इमारतें, पब, साइबर हब और मेट्रो संस्कृति दुबई या न्यूयॉर्क का अहसास कराती हैं। फरीदाबाद और सोनीपत औद्योगिक हब बन चुके हैं। दिल्ली से सटे होने के कारण इन शहरों में रियल एस्टेट और आईटी सेक्टर ने छप्पर फाड़कर तरक्की की है। यहाँ की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे ऊंचे स्तरों पर है।
ग्रामीण हरियाणा (जींद, सिरसा, महेंद्रगढ़, भिवानी)
शहरों से दूर हटते ही ठेठ हरियाणा शुरू होता है, जहाँ आज भी हुक्के की गुड़गुड़ाहट, चौपालों पर ताश की बाजी और खेतों में ट्रैक्टरों की आवाज गूंजती है। ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचा (सड़कें, बिजली) तो सुधरा है, लेकिन रोजगार के साधनों की भारी कमी है। गाँवों के युवा या तो सेना में जाना चाहते हैं या फिर जमीन बेचकर ‘डंकी रूट’ (अवैध तरीके से) के जरिए अमेरिका-कनाडा भागने को मजबूर हैं, जो कि 2026 की एक कड़वी हकीकत है।
किसान और व्यापारी: अर्थव्यवस्था के दो मजबूत स्तंभ
किसानों की स्थिति: ‘अन्नदाता’ की नई चुनौतियाँ
हरियाणा का किसान देश का पेट भरता है। हरित क्रांति की सफलता की कहानी हरियाणा के खेतों से ही लिखी गई थी। गेहूं और धान (विशेषकर बासमती चावल) के उत्पादन में हरियाणा का कोई सानी नहीं है।
लेकिन 2020-21 और उसके बाद हुए किसान आंदोलनों ने हरियाणा के किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर लाकर खड़ा कर दिया। किसान आज भी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी के लिए संघर्ष कर रहा है। भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है, जिसके कारण ‘मेरा पानी, मेरी विरासत’ जैसी योजनाएं लागू की गई हैं ताकि किसान धान की जगह कम पानी वाली फसलें उगाएं। खेती की लागत बढ़ गई है और मुनाफा कम हुआ है, जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता बढ़ी है।
व्यापारियों की दशा: जीएसटी और ऑनलाइन बाजार की मार
हरियाणा का व्यापारी वर्ग (विशेषकर रोहतक की शौरी मार्केट, पानीपत का टेक्सटाइल हब, अंबाला का साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट उद्योग) हमेशा से राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है।
व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी (GST) के जटिल नियमों और इंस्पेक्टर राज ने उनका जीना मुहाल कर रखा है। इसके ऊपर से, बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों (अमेज़न, फ्लिपकार्ट) और ऑनलाइन बाजार के आने से छोटे दुकानदारों और खुदरा व्यापारियों का धंधा 40% तक मंदा हो गया है। हालांकि, सरकार व्यापारियों के लिए ‘व्यापारी कल्याण बोर्ड’ जैसी बातें करती है, लेकिन धरातल पर छोटा व्यापारी आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करता है।
शिक्षा व्यवस्था: सरकारी स्कूलों की दशा और दुर्दशा
यह हरियाणा के विकास की कहानी का सबसे स्याह और चिंताजनक पहलू है। एक तरफ जहाँ हरियाणा के निजी स्कूल और विश्वविद्यालय (जैसे सोनीपत का ओ.पी. जिंदल या अशोक यूनिवर्सिटी) विश्वस्तरीय शिक्षा दे रहे हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की हालत बेहद खस्ता है।
दुर्दशा के मुख्य कारण:
शिक्षकों की भारी कमी: राज्य के सरकारी स्कूलों में हजारों शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। कई स्कूल ‘एकल शिक्षक’ (सिंगल टीचर) के भरोसे चल रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: कई गाँवों के स्कूलों में आज भी लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, पीने के साफ पानी की व्यवस्था नहीं है, और छतों से पानी टपकता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में कई स्कूलों में कंप्यूटर लैब धूल फांक रहे हैं या वहाँ बिजली का कनेक्शन ही नहीं है।
‘चिराग योजना’ और बंद होते स्कूल: सरकार द्वारा शुरू की गई ‘चिराग योजना’ (जिसके तहत सरकारी स्कूल के बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने पर सरकार फीस देती है) की भारी आलोचना हो रही है। शिक्षाविदों का मानना है कि यह सरकारी स्कूलों को बंद करने की एक सोची-समझी साजिश है। पिछले कुछ सालों में सैकड़ों सरकारी स्कूलों को ‘मर्ज’ करने के नाम पर ताला लगा दिया गया है।
बेरोजगारी का दंश: सरकारी स्कूलों से पढ़कर निकलने वाले गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं के पास न तो अच्छी अंग्रेजी की स्किल होती है और ना ही तकनीकी ज्ञान। नतीजतन, वे बेरोजगारी की फौज में शामिल हो जाते हैं। हरियाणा वर्तमान में देश के सबसे अधिक बेरोजगारी दर वाले राज्यों में से एक बना हुआ है।
अच्छा और बुरा: हरियाणा का एक निष्पक्ष रिपोर्ट कार्ड (2026 की स्थिति)
अच्छी बातें (सकारात्मक पहलू):
खेलों का पावरहाउस: भारत अगर ओलंपिक या कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतता है, तो उसमें से आधी हिस्सेदारी अकेले हरियाणा की होती है। ‘पदक लाओ, पद पाओ’ नीति ने युवाओं को खेलों के प्रति प्रेरित किया है। नीरज चोपड़ा, विनेश फोगट और बजरंग पुनिया जैसे सितारे इसी मिट्टी की देन हैं।
बेहतरीन कनेक्टिविटी: हरियाणा से गुजरने वाले एक्सप्रेसवे (केएमपी, केजीपी, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे) ने राज्य की कनेक्टिविटी को देश में नंबर वन बना दिया है। यहाँ राष्ट्रीय राजमार्गों का बेहतरीन जाल है।
उद्योग अनुकूल माहौल: ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में हरियाणा हमेशा टॉप राज्यों में रहता है। मारुति सुजुकी का खरखौदा में नया प्लांट लगना इसका ताजा उदाहरण है।
बुरी बातें
नशे का बढ़ता जाल: पंजाब की तर्ज पर अब हरियाणा के सीमावर्ती जिलों (सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, अंबाला) में ‘चिट्टा’ और सिंथेटिक ड्रग्स का नशा पैर पसार रहा है। युवा पीढ़ी इस दलदल में धंस रही है, जो बेहद डरावना है।
अपराध और गैंगस्टर संस्कृति: हाल के वर्षों में हरियाणा में ‘गैंगस्टर कल्चर’ तेजी से बढ़ा है। लॉरेंस बिश्नोई और अन्य गैंग्स के गुर्गे व्यापारियों से फिरौती मांग रहे हैं। सरेआम हत्याएं और अपराध के ग्राफ ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
बेरोजगारी और युवाओं का पलायन: नौकरियों की कमी के कारण हरियाणा का युवा हताश है। ‘कौशल रोजगार निगम’ के जरिए ठेके पर दी जाने वाली अस्थायी नौकरियां युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ साबित हो रही हैं।
आगे की राह
2026 के इस पड़ाव पर आकर हरियाणा एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ आर्थिक समृद्धि, चमचमाते शहर और खेलों के मेडल हैं, तो दूसरी तरफ त्रस्त किसान, सुबकता छोटा व्यापारी, नशाखोरी की तरफ बढ़ता युवा और दम तोड़ती सरकारी शिक्षा व्यवस्था है।
नायब सैनी की मौजूदा भाजपा सरकार के सामने चुनौती बड़ी है। उन्हें केवल कागजी पोर्टलों और दावों से आगे बढ़कर धरातल पर काम करना होगा। हरियाणा की जनता स्वाभिमानी है, उसे खैरात नहीं, बल्कि सम्मान, रोजगार और अपनी फसलों के सही दाम चाहिए। यदि सरकार इन बुनियादी मुद्दों को हल करने में सफल रहती है, तभी ‘नंबर वन हरियाणा’ का सपना सचमुच साकार हो पाएगा।
– चंडीगढ़ से ‘अटल हिन्द’ के लिए राजकुमार अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट।

