CACP, NFSA और ECA: असली तीन काले कानून, जिन्होंने पंजाब-हरियाणा के अन्न भंडार को कर्ज के गड्ढे में बदल दियाक्या “लीगल MSP गारंटी” किसानों के लिए खतरनाक भ्रम है?
लेखक: गुरपर्ताप सिंह मान /29 अप्रैल 2026
अन्न का कटोरा अब कर्ज का कटोरा बन गया है।
जब तीन कृषि कानूनों को वापस लिया गया, तो उन्हें “काले कानून” कहकर खूब हंगामा हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या असली काले कानून वे तीन रद्द हुए कानून थे, या फिर वे हमारे कृषि नीति तंत्र में गहरे छिपे हुए हैं — जिन्हें दशकों से नजरअंदाज किया जा रहा है?

फरवरी 2026 में संसद में पेश आंकड़ों ने सच्चाई उजागर कर दी। पंजाब में एक औसत किसान परिवार पर कर्ज ₹2.03 लाख पहुंच चुका है, जबकि हरियाणा में यह ₹1.83 लाख है। देश के बाकी राज्यों में औसत कर्ज मात्र ₹74,000 के आसपास है। पंजाब में लगभग 89% किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं और दोनों राज्यों में कुल संस्थागत कर्ज ₹2 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच गया है।दशकों से पंजाब और हरियाणा में गेहूं-धान की लगभग 100% खरीद MSP पर होती रही है। ये राज्य देश के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को अनाज मुहैया कराते हैं और सरकारी गोदाम भरते हैं। फिर भी किसान हर साल और गहरे कर्ज में डूबते जा रहे हैं।
यह बाजार की नाकामी नहीं, बल्कि हमारी नीतियों का सीधा नतीजा है।ये नीतियां तीन प्रमुख संस्थाओं —CACP, NFSA 2013 और ECA 1955 — पर टिकी हुई हैं, जो किसानों को धीरे-धीरे निचोड़ रही हैं।

भारत का सबसे बड़ा रोजगार क्षेत्र, लेकिन राष्ट्रीय नीति का अंधेरा
भारत आज भी मूलतः कृषि प्रधान देश है। देश की करीब 46% आबादी (लगभग 65 करोड़ लोग) सीधे खेती पर निर्भर है, जबकि 80 करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई है। लेकिन जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र 15-16% रह गया है।
दुख की बात है कि आजादी के 80 साल बाद भी भारत के पास एक स्पष्ट, व्यापक और किसान-हितैषी राष्ट्रीय कृषि नीति नहीं है। हमारी सारी नीतियां मुख्य रूप से सस्ता अनाज और कम मुद्रास्फीति सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहीं, न कि किसानों की स्थायी और सम्मानजनक आय पर।
1. CACP: संतुलन का नाम, लेकिन किसान को कमजोर करने वाला ढांचा
CACP (कृषि लागत एवं मूल्य आयोग) की स्थापना 1965 में हुई थी। इसका आखिरी संशोधन 2009 में हुआ, जब भी प्राथमिकता खाद्यान्न की कमी और मुद्रास्फीति नियंत्रण थी।
CACP को MSP तय करते समय साफ निर्देश दिए गए हैं — “उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के हितों का समुचित ध्यान रखते हुए संतुलित मूल्य संरचना विकसित करना”।
यह “संतुलन” शब्द ही सबसे बड़ी समस्या है। MSP तय करते समय सिर्फ खेती की लागत नहीं, बल्कि मुद्रास्फीति, मजदूरी और समग्र आर्थिक स्थिति को भी देखा जाता है। नतीजतन, MSP किसान की आय का हथियार बनने की बजाय मैक्रोइकोनॉमिक मैनेजमेंट का औजार बन गया है।
सबसे बड़ी कमी यह है कि MSP अभी भी A2+FL लागत पर आधारित है, न कि पूरी लागत (C2) पर, जिसमें जमीन का किराया और पूंजी लागत भी शामिल होती है। OECD के अनुसार, भारत की कृषि नीतियां किसानों को -14% से -15% तक का नकारात्मक मूल्य समर्थन (implicit tax) दे रही हैं।
शरद जोशी जी ने ठीक कहा था — “भारत, भारत को सब्सिडी दे रहा है”। गांव का किसान शहर के उपभोक्ता को सस्ता अनाज देकर अपनी आय गंवा रहा है।

2. NFSA 2013: MSP पर ऊपरी सीमा लगा देने वाला कानून
जब CACP MSP को नीचे दबाता है, तो NFSA 2013 उसे ऊपर से कैप लगा देता है।
यह कानून देश की 67% आबादी को सस्ता अनाज देने का कानूनी अधिकार देता है। इसके लिए सरकार को हर साल 60-70 मिलियन टन अनाज खरीदना पड़ता है, जो मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा से आता है।
अनाज की असली आर्थिक लागत ₹2,200-2,500 प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच चुकी है, लेकिन PDS में इसे ₹1-3 प्रति किलो पर दिया जाता है। इस सब्सिडी का बोझ अब ₹2 लाख करोड़ सालाना से ज्यादा हो गया है।
चूंकि NFSA कानूनी अधिकार है, इसलिए MSP में जितनी भी बढ़ोतरी हो, वह सरकार के वित्तीय बोझ के अंदर ही रहनी चाहिए। नतीजा? MSP अब किसान की जरूरत पर नहीं, बल्कि सरकार की बजट क्षमता पर निर्भर हो गई है।
3. ECA 1955: बाजार को कभी पूरी तरह काम न करने देने वाला कानून
आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) इस पूरे सिस्टम को पूरा करता है। स्टॉक लिमिट, निर्यात प्रतिबंध और बार-बार बाजार में हस्तक्षेप के जरिए यह कानून निजी क्षेत्र में अनिश्चितता पैदा करता रहता है।
नतीजा? स्टोरेज, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन में निजी निवेश नहीं हो पाता। जब भी कीमतें बढ़ती हैं, सरकार तुरंत दखल देकर उन्हें दबा देती है। किसान अच्छे बाजार का पूरा फायदा कभी नहीं उठा पाते।
इसीलिए गैर-MSP क्षेत्र जैसे डेयरी और बागवानी 5-8% की रफ्तार से बढ़ रहे हैं, जबकि MSP वाले गेहूं-धान क्षेत्र मात्र 2-3% की गति से आगे बढ़ पा रहे हैं।
लीगल MSP गारंटी” — एक खतरनाक भ्रम?
अगर MSP तय करने की पद्धति ही गलत है और असली लागत (C2) को जानबूझकर कम करके आंका जाता है, तो लीगल MSP देकर आखिर क्या गारंटी दी जा रही है?
A2+FL पर आधारित लीगल MSP देना दबाई गई कीमत को सिर्फ कानूनी जामा पहनाने जैसा होगा। CACP, NFSA और ECA की सारी विकृतियां बरकरार रहेंगी।
आशोक गुलाटी और डॉ. एस.एस. जोहल जैसे विशेषज्ञ बार-बार चेताते रहे हैं कि पूरे देश में यूनिवर्सल MSP खरीद संभव नहीं है और इससे बाजार बिगड़ सकता है।
पंजाब का सबक
चार दशकों से MSP पर लगभग पूरी खरीद के बावजूद पंजाब में किसानों की समृद्धि नहीं आई। उल्टा कर्ज बढ़ा, पर्यावरण बिगड़ा और गेहूं-धान का चक्र और संकीर्ण होता गया। राष्ट्र को खाद्य सुरक्षा मिली, लेकिन किसानों की आर्थिक सुरक्षा पूरी तरह चली गई।
शरद जोशी, डॉ. एस.एस. जोहल, भूपिंदर सिंह मान और आशोक गुलाटी जैसे विशेषज्ञ दशकों से चेताते आ रहे हैं कि भारत की कृषि नीति किसानों की कीमत पर शहरों को सस्ता अनाज मुहैया करा रही है। यह एक व्यवस्थागत आय हस्तांतरण है — कृषि से बाकी अर्थव्यवस्था की ओर।
अब समय आ गया है कि हम नारों से ऊपर उठकर संरचनात्मक बदलाव करें। जब तक कृषि को सिर्फ सस्ता अनाज और कम महंगाई का औजार माना जाएगा, तब तक किसान संकट बना रहेगा।
आजादी के 80 साल बाद भी सवाल वही है:
क्या भारत की खाद्य सुरक्षा अपने किसानों की आर्थिक असुरक्षा पर टिकी रह सकती है
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