हार्मुज की लहरों में खोए भारतीय नाविक: क्या समुद्री सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बनेगी?
शहीद कहलाने लायक भी नहीं माने गए… सिर्फ नाविक थे न
राष्ट्र के लिए जान देने वाले, राष्ट्र की नजर में अनजान क्यों?
हार्मुज-ओमान क्षेत्र की लहरें अब तेल नहीं, भारतीय खून बहा रही हैं

शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)
कुछ मौतें केवल परिवारों को नहीं रुलातीं, वे राष्ट्र के विवेक को भी कठघरे में खड़ा कर देती हैं। जून 2026 में दुनिया फीफा विश्व कप की चमक-दमक और जीत-हार के रोमांच में डूबी है, लेकिन इसी बीच हार्मुज के निकट ओमान की खाड़ी ने तीन भारतीय नाविकों की अंतिम पुकार अपने भीतर समेट ली। पलाउ-ध्वजांकित टैंकर पर अमेरिकी मिसाइल हमले में विशाखापट्टनम के मुख्य अभियंता पटनाला सुरेश, डेक कैडेट आदित्य शर्मा और फिटर शिवानंद चौरसिया की मृत्यु केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस कठोर सच्चाई का प्रतीक है जिसे वैश्विक राजनीति अक्सर आंकड़ों और बयानों के नीचे दबा देती है। जिनके श्रम से दुनिया के कारखाने चलते हैं और जिनकी मेहनत से ऊर्जा के स्रोत देशों तक पहुँचते हैं, वही संकट की घड़ी में सबसे अधिक अकेले छोड़ दिए जाते हैं।
दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन अक्सर उन समुद्री मार्गों से गुजरती है, जिनके नाम अधिकांश लोग नहीं जानते। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज ऐसा ही एक संकरा जलमार्ग है, जो केवल रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की जीवनरेखा है। दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल और गैस इसी से गुजरते हैं। भारत, जो तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, उसकी विकास यात्रा भी इसकी स्थिरता पर निर्भर है। इसलिए जब हार्मुज में तनाव बढ़ता है, तो केवल तेल के दाम नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की नब्ज अस्थिर हो जाती है। उद्योग, परिवहन, बाजार और घरेलू बजट—सब इसकी आंच झेलते हैं। लेकिन इन चर्चाओं के बीच एक सच अक्सर छूट जाता है— इन समुद्री मार्गों के असली आधार नाविक ही सबसे असुरक्षित और उपेक्षित कड़ी हैं।
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सभ्यताओं को आगे बढ़ाने वाले लोग अक्सर इतिहास के पन्नों से बाहर रह जाते हैं। भारतीय नाविक भी इसी पीड़ा के हिस्सेदार हैं। वे सीमा पर तैनात सैनिक नहीं, न ही उनके कंधों पर सितारे हैं, फिर भी उनका योगदान किसी राष्ट्रीय सेवा से कम नहीं। महीनों समुद्र में रहना, परिवार से दूरी, अनिश्चित मौसम और जोखिमों के बीच भी वैश्विक व्यापार को गति देना उनका असाधारण समर्पण है। सैनिक के शहीद होने पर राष्ट्र खड़ा हो जाता है, लेकिन नाविक की मृत्यु अक्सर खबरों में खो जाती है। इसलिए सवाल और गहरा हो जाता है—क्या इन्हें केवल कर्मचारी मानना उचित है, या राष्ट्रीय हितों के वास्तविक संरक्षक के रूप में स्वीकार करना चाहिए?
समाचार चैनलों की बहसें अक्सर घटनाओं को शक्ति-संघर्ष की भाषा में बाँध देती हैं, जबकि केंद्र में इंसानी जीवन होता है। हार्मुज की यह त्रासदी भी इसी प्रवृत्ति का शिकार है—कहीं इसे अमेरिका-ईरान तनाव, तो कहीं भारत-अमेरिका संबंधों की कसौटी के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इन विश्लेषणों में वह भारतीय युवक खो जाता है, जिसने रोजगार, सपनों और परिवार की उम्मीद में समुद्र का रास्ता चुना। भारत सरकार ने अमेरिकी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराया है, पर क्या केवल विरोध पर्याप्त है? क्या नाविकों की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा नहीं बनना चाहिए? जब तक उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, ऊर्जा, आर्थिक और समुद्री सुरक्षा अधूरी रहेंगी।
एक सशक्त राष्ट्र की पहचान केवल उसकी सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी से होती है। भारत को हर नाविक के लिए वास्तविक समय सुरक्षा नेटवर्क, संकट क्षेत्रों में निगरानी, मजबूत राजनयिक सहायता, बीमा और त्वरित बचाव व्यवस्था विकसित करनी होगी। नौसेना की भूमिका केवल डकैती रोकने तक सीमित नहीं, बल्कि जरूरत पर नागरिक सुरक्षा के लिए एस्कॉर्ट मिशन और सुरक्षित समुद्री गलियारों तक भी बढ़नी चाहिए। वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत को “सॉफ्ट पावर” के साथ “प्रोटेक्टिव पावर” भी विकसित करनी होगी, जो अपने नागरिकों को कहीं भी असुरक्षित न छोड़े।
यह समय विकास और मानवीय संवेदना के बीच गहरे विरोधाभास को समझने का अवसर देता है। एक ओर फीफा वर्ल्ड कप में जश्न है, दूसरी ओर भारत के कुछ परिवार शोक में डूबे हैं। स्टेडियमों में तालियाँ गूंज रही हैं, लेकिन समुद्र में खोए जीवनों की प्रतिध्वनि सुनने वाला कोई नहीं। एक ओर एआई, अंतरिक्ष अभियानों और खरबों की संपत्ति की चर्चा है, दूसरी ओर वे नाविक हैं जिनकी मृत्यु पर दुनिया औपचारिक संवेदना देकर आगे बढ़ जाती है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। यदि आधुनिक सभ्यता अपने श्रमजीवियों को सम्मान नहीं दे पाती, तो उसकी उपलब्धियाँ अधूरी और खोखली हैं।
भारत आज ऐसे दौर में है जहाँ भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से अधिक रणनीतिक परिपक्वता आवश्यक है। वह न अमेरिका का अंधानुकरण कर सकता है, न ईरान या चीन से पूरी तरह जुड़ सकता है। उसकी वास्तविक शक्ति स्वतंत्र विदेश नीति, मजबूत अर्थव्यवस्था, युवा जनसंख्या और बहुआयामी वैश्विक संबंधों में निहित है। रूस से सस्ता तेल हो या पश्चिम से साझेदारी, भारत ने दिखाया है कि वह अपने हित में निर्णय लेने में सक्षम है। लेकिन अब इस स्वतंत्रता को समुद्री और ऊर्जा सुरक्षा की ठोस नीतियों में बदलना होगा। “प्रोजेक्ट कुशा” जैसी स्वदेशी रक्षा पहलों के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा को राष्ट्रीय रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना जरूरी है।
समुद्र की यह त्रासदी मन को झकझोर देने वाला संदेश छोड़ जाती है, जिसे अनदेखा करना भविष्य के प्रति लापरवाही होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और “आत्मनिर्भर भारत” के संकल्प को अब समुद्री क्षेत्र में भी सशक्त रूप देना होगा। अधिक भारतीय ध्वज वाले जहाज, बेहतर प्रशिक्षण, नाविकों के अधिकारों की वैश्विक वकालत और सुरक्षित समुद्री ढांचा अब अनिवार्य हैं। हार्मुज की लहरों में खोया भारतीय जीवन केवल शोक नहीं, चेतावनी है। यह स्पष्ट करता है कि 21वीं सदी के संघर्ष सीमाओं से नहीं, ऊर्जा मार्गों और समुद्री रास्तों से तय हो रहे हैं। अब निर्णय हमारे हाथ में है—क्या हम इन नायकों को भूलेंगे, या उनकी शहादत को ऐसी नीति में बदलेंगे जो भारत को सुरक्षा, संतुलन और जिम्मेदारी की नई पहचान दे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com


