आलेख : निशिथ चौधरी, अनुवाद : संजय पराते
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में गंभीर रुकावटें आई हैं, जिसके परिणामस्वरूप उर्वरक उत्पादन में कटौती, आयात में गिरावट, कीमतों में बढ़ोतरी और बड़े पैमाने पर अनिश्चितता का माहौल बन गया है ; यह स्थिति सीधे तौर पर कृषि की स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर रही है। बहरहाल, इस संकट की जड़ें पूरी तरह से बाहरी नहीं हैं ; बल्कि ये उस नव-उदारवादी नीति में भी निहित हैं, जो घरेलू संसाधनों के उपयोग और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बजाय आयात पर निर्भरता को प्राथमिकता देती है।
अमोनिया और यूरिया का उत्पादन प्राकृतिक गैस पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है ; यूरिया उत्पादन की कुल लागत में प्राकृतिक गैस का हिस्सा लगभग 70–80 प्रतिशत होता है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की ज़रूरत का केवल आधा हिस्सा ही घरेलू स्रोतों से पूरा कर पाता है, जबकि बाकी ज़रूरत द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के रूप में आयात करके पूरी की जाती है। देश में आपूर्ति होने वाली कुल प्राकृतिक गैस का लगभग 30–35 प्रतिशत हिस्सा अकेले उर्वरक क्षेत्र ही इस्तेमाल करता है। इस आयत का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है, जिसकी वजह से यह क्षेत्र भू-राजनीतिक उथल-पुथल के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है।
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की आक्रामकता ने द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर दिया है। उर्वरक का उत्पादन और आयात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई संयंत्रों को कम क्षमता पर काम करने या अस्थायी रूप से बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिससे बाहरी झटकों के सामने उत्पादन प्रणाली की खामी उजागर होती है। अनुमानित मासिक उत्पादन क्षति लगभग 800,000 टन यूरिया का है, और उर्वरक उत्पादन में कुल मिलाकर 10–15 प्रतिशत की गिरावट आई है।
हरित क्रांति, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और रासायनिक उर्वरकों की भूमिका
भारत में हरित क्रांति को मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों — विशेष रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम — के सघन उपयोग से बल मिला ; इसके साथ ही सिंचाई, अधिक उपज देने वाली किस्मों के बीज और मशीनीकरण का भी योगदान रहा। उर्वरकों ने उत्पादकता बढ़ाने वाले एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक के रूप में कार्य किया, जिससे फसलें अपनी उपज की पूरी क्षमता हासिल कर सकीं। हरित क्रांति के शुरुआती दौर में, यह अनुमान लगाया गया था कि एक किलोग्राम उर्वरक पोषक तत्वों से 10–15 किलोग्राम अतिरिक्त खाद्यान्न का उत्पादन होता था।
ज़ाहिर है, 1960 के दशक के मध्य के बाद उर्वरक की खपत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। 1950–51 में सिर्फ़ 70000 टन से बढ़कर यह 1965–66 तक 7.8 लाख टन हो गई, 1980–81 में 55 लाख टन और 1990–91 में 125 लाख टन तक पहुँच गई। यह बढ़ता रुझान 2000–01 में 181 लाख टन और 2022–23 तक लगभग 320–330 लाख टन तक जारी रहा — जो आजादी के बाद से 450 गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी है। नतीजन, खाद्यान्न उत्पादन 1950–51 में 510 लाख टन से बढ़कर 1965–66 में 720 लाख टन हो गया, और 1980–81 तक तेज़ी से बढ़कर 1300 लाख टन और 1990–91 में 1760 लाख टन तक पहुँच गया। यह 2000–01 में और बढ़कर 1970 लाख टन और 2022–23 में लगभग 3300 लाख टन तक पहुँच गया— जो शुरुआती स्तर से छह गुना से भी ज्यादा है। उर्वरकों की वजह से उत्पादकता में भी काफी बढ़ोतरी हुई। 1960 के दशक में गेहूँ की पैदावार लगभग 850 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 3,500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई, जबकि चावल की पैदावार लगभग 1,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 2,700 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई —जो तीन से चार गुना बढ़ोतरी और सघन कृषि की ओर बदलाव को दिखाता है।
सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका
आजादी के बाद, और विशेष रूप से हरित क्रांति की शुरुआत के तौर पर, देश ने सार्वजनिक क्षेत्र के उर्वरक संयंत्रों में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी, जो पूरे देश में फैले हुए थे। भारत में खाद्य उत्पादन को तेजी से बढ़ाने में सार्वजनिक क्षेत्र के उर्वरक उद्योग ने एक अहम भूमिका निभाई। सार्वजनिक क्षेत्र की फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हिंदुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड, नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड जैसी प्रमुख इकाइयों ने इसमें सबसे ज्यादा योगदान दिया। भारत में हरित क्रांति में सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों के योगदान को, भारत में कृषि के विकास के इतिहास के पन्नों से कभी मिटाया नहीं जा सकता।
सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक इकाईयों को बंद करने के गंभीर दुष्परिणाम
1991 से लागू नई-उदारवादी नीतियों के तहत निजीकरण के हमले का सबसे ज्यादा शिकार सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक इकाइयां बनी हैं। सरकार ने एक ऐसी नीतिगत बदलाव की घोषणा की, जो पूरी तरह से आयात पर अत्यधिक निर्भरता की ओर झुकी होने के कारण आत्मघाती थी। ठीक इसी दौर में, अलग-अलग बहानों से सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक इकाइयों को बंद कर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की इन उर्वरक इकाइयों के बंद होने से उर्वरक आयात पर भारत की निर्भरता तेज़ी से बढ़ गई। उम्मीदों के विपरीत, वैश्विक कीमतें आसमान छूने लगीं, जिससे सब्सिडी का बोझ और विदेशी मुद्रा का बहिर्प्रवाह काफ़ी बढ़ गया। आयात पर निर्भरता एक ढांचागत समस्या बन गई, जबकि निजी निवेश के जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हो पाए। इनपुट लागत में बढ़ोतरी और उर्वरकों की अनिश्चित उपलब्धता ने किसानों की हालत और भी बदतर कर दी है। घटते मुनाफे और बढ़ती आर्थिक तंगी के चलते, कृषि क्षेत्र एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। इसलिए, घरेलू स्तर पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

बढ़ती मांग और आयात पर बढ़ती निर्भरता
भारत में उर्वरकों की खपत बढ़कर सालाना 600–650 लाख टन हो गई है, जो देश की खाद्य सुरक्षा की ज़रूरतों को दिखाता है। हालांकि, घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़कर लगभग 306 लाख टन हो गया है, जिससे 350–360 लाख टन की कुल मांग का ज्यादातर हिस्सा पूरा हो जाता है, फिर भी आयात पर निर्भरता 15–25 प्रतिशत बनी हुई है। फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों के मामले में यह असंतुलन और भी ज़्यादा है। डीएपी का उत्पादन 45–50 लाख टन है, जो 100–120 लाख टन की कुल मांग का आधे से भी कम है, जिससे 50–60 प्रतिशत निर्भरता आयात पर बनी हुई है ; एमओपी की 40–50 लाख टन की मांग पूरी तरह से आयात पर ही निर्भर है। कुल मिलाकर, भारत 600–650 लाख टन की खपत के मुकाबले 500–550 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन करता है, और बाकी 20–25 प्रतिशत की आपूर्ति आयात से होती है। यह स्थिति भारत के उर्वरक क्षेत्र में एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाती है। भू-राजनीतिक अस्थिरता के समय ऐसी निर्भरता और भी ज़्यादा जोखिम भरी हो जाती है, क्योंकि इससे आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं और उपलब्धता तथा कीमतों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
कोयला गैसीकरण की आवश्यकता
घरेलू उत्पादन और खपत के बीच बढ़ता असंतुलन, और साथ ही आयातित उर्वरकों तथा कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भरता ने इस क्षेत्र को वैश्विक बाज़ार की अस्थिरता और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के प्रति संवेदनशील बना दिया है। यह संवेदनशीलता तब और भी बढ़ जाती है, जब यूरिया उत्पादन के लिए मुख्य कच्चे माल के तौर पर प्राकृतिक गैस पर अत्यधिक निर्भरता होती है ; क्योंकि इसकी उपलब्धता और कीमतें काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं।
एक विविध और आत्मनिर्भर कच्चे माल के स्टॉक की रणनीति आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। भारत के विशाल कोयला भंडारों का लाभ उठाते हुए, कोयले का गैसीकरण किया जा सकता है, जो अमोनिया और यूरिया के लिए ज़रूरी सिंथेसिस गैस के उत्पादन का एक व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही, कोल बेड मीथेन और अन्य स्वदेशी गैस संसाधनों का तेजी से विकास आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है। घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार करना, विदेशों में कच्चे माल के संसाधनों को सुरक्षित करना और वैकल्पिक तकनीकी रास्तों को विकसित करना — इन सभी को रणनीतिक प्राथमिकताओं के रूप में देखा जाना चाहिए।
बहरहाल, इस ज़रूरत को नीतिगत स्तर पर हुई एक गंभीर गलती के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कोयले के गैसीकरण के क्षेत्र में भारत की शुरुआती पहल — खास तौर पर 1970 के दशक के मध्य में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के रामागुंडम और तालचेर उर्वरक संयंत्रों में — उर्वरक उत्पादन के लिए घरेलू कोयले का इस्तेमाल करने की एक दूरदर्शी कोशिश को दर्शाती थी। हालांकि इन संयंत्रों को परिचालन और प्रबंधन से जुड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन ऐसा मानने का कोई खास आधार नहीं है कि गैसीकरण तकनीक में ही कोई बुनियादी खामी थी।
1991 के बाद के नीतिगत ढांचे ने सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व वाले तकनीकी विकास को और भी कम प्राथमिकता दी। रामागुंडम और तालचेर स्थित कोयला-आधारित उर्वरक संयंत्रों का बंद होना, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एक स्वदेशी तकनीकी मार्ग के लिए एक बड़ा झटका था। एक अधिक संतुलित दृष्टिकोण — जिसमें गैस-आधारित विस्तार के साथ-साथ कोयला-आधारित प्रौद्योगिकियों के निरंतर विकास को भी शामिल किया जाता — भारत के संसाधन-भंडार और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकताओं के साथ कहीं अधिक बेहतर तालमेल बिठा पाता।
कोयले से अमोनिया और मेथनॉल निर्माण में चीन सबसे आगे
देर से शुरुआत करने के बावजूद, लगातार सरकारी मदद, शोध और विकास में लगातार निवेश और गैसीफिकेशन तकनीक के बड़े पैमाने पर मानकीकरण की वजह से, कोयले से अमोनिया और मेथनॉल बनाने में चीन वैश्विक नेता के रूप में सामने आया है। चीन एक ज़बरदस्त मिसाल पेश करता है ; वह अपनी जरूरत का 60–70 प्रतिशत अमोनिया और 80 प्रतिशत से ज़्यादा मेथनॉल कोयले से बनाता है। इसमें ‘कोयले से रसायन’ बनाने वाले इंटीग्रेटेड कॉम्प्लेक्स का भी बड़े पैमाने पर हाथ है, जो कच्चे माल की सुरक्षा पक्की करते हैं। इसके उलट, भारत के पास 360 अरब टन से ज्यादा कोयले का भंडार होने के बावजूद, वह खाद बनाने के लिए बड़े पैमाने पर बाहर से मंगाई गई द्रवीकृत प्राकृतिक गैस पर ही निर्भर रहता है। इससे यह साफ़ पता चलता है कि देश में मौजूद संसाधनों और औद्योगिक रणनीति के बीच कोई तालमेल नहीं है।
हालांकि भारत ने 2030 तक 1000 लाख टन कोयला गैसीकरण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की है, लेकिन इस दिशा में प्रगति धीमी और असमान है। तालचेर पहल जैसी केवल कुछ ही परियोजनाएं शुरू की गई हैं, और ये परियोजनाएं देरी, लागत में वृद्धि और कमज़ोर क्रियान्वयन जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। कोयला गैसीकरण की शुरुआती पूंजी लागत अधिक होने की चिंताओं ने इसके अपनाने की गति को और धीमा कर दिया है। बहरहाल, यह दृष्टिकोण कोयले के दीर्घकालिक लाभों को नजरअंदाज करता है, जिनमें आपूर्ति में स्थिरता और लागत की निश्चितता शामिल है — विशेष रूप से जब इसकी तुलना द्रवीकृत प्राकृतिक गैस से जुड़ी अत्यधिक मूल्य अस्थिरता से की जाती है। द्रवीकृत प्राकृतिक गैस पर आधारित उत्पादन के प्रति लगातार बना हुआ झुकाव किसी सुसंगत दीर्घकालिक रणनीति के बजाय एक अल्पकालिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। इस अंतर्विरोध को आत्मनिर्भरता पर दिए जा रहे व्यापक ज़ोर से और भी अधिक बल मिलता है ; उर्वरक क्षेत्र में स्वदेशी विकल्पों के अपर्याप्त विकास के कारण आत्मनिर्भरता का यह लक्ष्य अभी भी अधूरा बना हुआ है।
निष्कर्ष
रूस-यूक्रेन संघर्ष और अब ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध ने, नव-उदारवादी सरकारों द्वारा देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उर्वरक संयंत्रों को बंद करने की ‘हिमालयी भूल’ को बुरी तरह से उजागर कर दिया है ; साथ ही, उर्वरक के आयात पर जानलेवा निर्भरता और देश में कोयला-आधारित उर्वरक संयंत्रों के विकास की उपेक्षा को भी सामने ला दिया है।
प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में आई रुकावट ने भारत की खाद नीति की गहरी खामियों को उजागर कर दिया है। आयातित एलएनजी पर अत्यधिक निर्भरता, घरेलू संसाधनों की उपेक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता में कमी, और बाज़ार तंत्र की अधीनता — ये सभी गलत साबित हुई हैं। उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारत के पास कोयले के विशाल भंडार होने और ‘कोयला गैसीकरण’ तकनीक की वैश्विक स्तर पर सफलता साबित होने के बावजूद, इसे विकसित करने में हम असफल रहे है। जब तक आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू उत्पादन को मजबूत करने, और कोयला गैसीकरण जैसे वैकल्पिक कच्चे माल को विकसित करने के लिए निर्णायक कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह क्षेत्र बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहेगा —जिसके कृषि की निरंतरता और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
(सीटू कार्यसमिति सदस्य, केमिकल इंजीनियर, हिंदुस्तान फर्टिलाइजर कॉर्पोरेशन दुर्गापुर प्लांट में कार्यरत रहे)
(अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध, छत्तीसगढ़ किसान सभा उपाध्यक्ष)


