दहेज सामाजिक कुरीति से ‘फेमिसाइड’ तक
कानून, पितृसत्ता और बदलती सामाजिक चेतना के बीच
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कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,
हरियाणा –
दहेज कभी भारतीय समाज में बेटी को आर्थिक सुरक्षा देने की एक पारिवारिक परंपरा माना जाता था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा एक भयावह सामाजिक हिंसा में बदल गई। आज दहेज केवल लेन-देन या सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ संगठित मानसिक, आर्थिक और शारीरिक उत्पीड़न का माध्यम बन चुका है।
यही कारण है कि अनेक विद्वान और महिला अधिकार संगठन दहेज-जनित हत्याओं को ‘फेमिसाइड’ अर्थात् स्त्री होने के कारण की जाने वाली हत्या के रूप में देखने लगे हैं। भारत में हर वर्ष हजारों महिलाएँ दहेज की मांग, घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक दबाव के कारण अपनी जान गंवा देती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि औसतन प्रतिदिन कई महिलाएँ दहेज हत्या का शिकार होती हैं। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक मानसिकता का वह क्रूर चेहरा है जहाँ विवाह को आर्थिक सौदे में बदल दिया गया है।
भारतीय समाज में विवाह को आज भी परिवारों की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है। लड़के को “निवेश” और लड़की को “बोझ” मानने वाली मानसिकता दहेज प्रथा को निरंतर पोषित करती है।
शिक्षा, नौकरी और आधुनिकता के बावजूद दहेज की मांग खत्म नहीं हुई, बल्कि उसने नया रूप धारण कर लिया है। अब नकद धनराशि के साथ कार, फ्लैट, महंगे उपहार और जीवनभर आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है। यदि ये अपेक्षाएँ पूरी न हों तो महिलाओं को मानसिक यातना, घरेलू हिंसा, शारीरिक अत्याचार और कई बार मृत्यु तक का सामना करना पड़ता है।
कई मामलों में इसे आत्महत्या या दुर्घटना का रूप दे दिया जाता है, जबकि वास्तविकता में यह योजनाबद्ध हिंसा होती है। इसलिए दहेज-जनित मृत्यु को केवल पारिवारिक विवाद मानना उचित नहीं, बल्कि इसे लैंगिक हिंसा की निरंतर प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है।
भारत में दहेज रोकने के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 दहेज लेने और देने दोनों को अपराध घोषित करता है। भारतीय न्याय संहिता तथा पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी दहेज मृत्यु को विशेष अपराध मानती है, जबकि धारा 498-ए विवाहिता के साथ क्रूरता के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती रही है।
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 महिलाओं को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक हिंसा से सुरक्षा देने का प्रयास करता है। इन कानूनों ने अनेक पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और समाज में यह संदेश भी दिया है कि दहेज अपराध है, परंपरा नहीं।
फिर भी इन कानूनी प्रावधानों की प्रभावशीलता सीमित दिखाई देती है। सबसे बड़ी समस्या सामाजिक चुप्पी और पारिवारिक दबाव है। अधिकांश महिलाएँ अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए अत्याचार सहती रहती हैं। शिकायत दर्ज कराने पर उन्हें परिवार टूटने, बच्चों के भविष्य और सामाजिक बदनामी का भय सताता है।
पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति भी पीड़िताओं को निराश करती है। अनेक मामलों में सबूत जुटाना कठिन होता है क्योंकि अत्याचार घर की चारदीवारी के भीतर होता है। इसके अतिरिक्त कानूनों के कथित दुरुपयोग की बहस ने भी वास्तविक पीड़िताओं की आवाज को कमजोर किया है।
कुछ मामलों में झूठी शिकायतों के उदाहरण सामने आए, जिसके कारण न्याय व्यवस्था अधिक सतर्क हुई, परंतु इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि कई बार वास्तविक शिकायतों को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। इस प्रकार कानून होने के बावजूद सामाजिक संरचना और संस्थागत कमजोरियाँ दहेज-उन्मूलन के मार्ग में बाधा बनी हुई हैं।
दहेज को समाप्त करने के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है। सबसे पहले समाज को विवाह की अवधारणा बदलनी होगी। विवाह को आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि समानता और सम्मान के संबंध के रूप में स्थापित करना होगा।
शिक्षा व्यवस्था में लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्य और महिला सम्मान को व्यवहारिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। लड़कियों की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता दहेज प्रथा के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार है, क्योंकि आर्थिक रूप से सक्षम महिला शोषण के खिलाफ अधिक मजबूती से खड़ी हो सकती है।
इसके साथ ही पुरुषों और परिवारों की मानसिकता में परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है। जब तक बेटों को श्रेष्ठ और बेटियों को दायित्व माना जाता रहेगा, तब तक दहेज की मानसिकता समाप्त नहीं होगी।
सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं को भी आगे आकर दहेज-मुक्त विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए। पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ऐसे सामाजिक अभियान चलाए जाने चाहिए जिनमें दहेज लेने वालों का सामाजिक बहिष्कार और दहेज-मुक्त विवाह करने वालों का सार्वजनिक सम्मान हो।
सरकार को कानूनी प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और त्वरित बनाना होगा। दहेज मामलों के लिए विशेष अदालतें, महिला सहायता केंद्र, सुरक्षित आश्रय गृह और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को लैंगिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि पीड़िताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित हो सके। डिजिटल शिकायत प्रणाली और गुप्त हेल्पलाइन भी महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने में सहायता कर सकती हैं।
मीडिया और सिनेमा की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि लोकप्रिय संस्कृति दहेज को प्रतिष्ठा और वैभव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करेगी, तो समाज में इसका आकर्षण बना रहेगा। इसके विपरीत यदि फिल्मों, धारावाहिकों और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से दहेज विरोधी संदेश दिए जाएँ, तो जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
स्पष्ट है कि दहेज आज केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि महिलाओं के अस्तित्व और सम्मान पर सीधा आक्रमण है। यह हिंसा उस पितृसत्तात्मक सोच से जन्म लेती है जो स्त्री को बराबरी का मनुष्य नहीं, बल्कि आर्थिक दायित्व मानती है।
इसलिए दहेज-उन्मूलन का संघर्ष केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, लैंगिक समानता और मानवीय संवेदना की पुनर्स्थापना का संघर्ष है। जब समाज यह स्वीकार करेगा कि बेटी बोझ नहीं, समान अधिकारों वाली नागरिक है, तभी दहेज रूपी यह संगठित हिंसा वास्तव में समाप्त हो सकेगी।


