क्यों कह रहे हैं बुंदेलखंड के किसान “न्याय दो या मार दो
राज कुमार सिन्हा-विनायक फीचर्स
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन में सभी कानूनों की धज्जियां उड़ाए जाने के विरोध में मध्य भारत के ग्रामीणों ने एक बार फिर चिता आंदोलन का शंखनाद कर दिया है। बुंदेलखंड (मध्य भारत) की आदिवासी महिलाओं और किसानों का असाधारण चिता आंदोलन, कुछ समय स्थगित रहने के बाद, 3 जुलाई 2026 को फिर से शुरू हो गया है। यह आंदोलन मध्य प्रदेश के कुपी गांव के पास, केन नदी की सहायक बरना नदी के किनारे आयोजित किया जा रहा है। आंदोलन जय किसान संगठन के नेतृत्व में चल रहा है और इसका नारा है “न्याय दो या मार दो”।
यह आंदोलन प्रशासन के खिलाफ है, जिसने अप्रैल 2026 में किए गए अपने वादों से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया। उस समय पहला चिता आंदोलन इस शर्त पर स्थगित किया गया था कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों की शिकायतों का समाधान किया जाएगा, लेकिन एक भी वादा पूरा नहीं हुआ।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से जय किसान संगठन के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर कहते हैं कि “केन-बेतवा लिंक परियोजना 46 लाख पेड़ों को नष्ट कर रही है और पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र के 5,803 हेक्टेयर हिस्से को डुबो रही है। प्रशासन के भ्रष्ट और तानाशाही रवैये ने 50,000 लोगों को बेघर कर दिया है।
उन्हें उनकी ज़मीन, नदियों, जंगलों, आजीविका और संस्कृति से काट दिया गया है। गांव वालों ने हमेशा अन्याय के खिलाफ गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण विरोध किया है। अप्रैल 2026 के पहले आंदोलन में गांव वालों ने प्रतीकात्मक पंचतत्व विरोध किया था। वे चिताओं पर लेटे, उपवास रखा और अपने शरीर पर अपने गांव की मिट्टी मली।
अप्रैल 2026 का चिता आंदोलन सरकार के आश्वासनों पर स्थगित कर दिया गया था। लेकिन इसके बदले सरकार ने मंगल यादव, कमल आदिवासी जैसे आंदोलन के नेताओं और मुझ समेत कई अन्य कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे लाद दिए और हमें जेल भेज दिया। जमानत मिलने के बाद 250 से अधिक लोगों पर और झूठे मामले दर्ज किए गए हैं।
कानून की खुलेआम अवहेलना करते हुए परियोजना से प्रभावित गांवों में कभी कोई ग्राम सभा नहीं बुलाई गई। समुदायों से कोई सहमति नहीं ली गई। जनता के सामने कोई सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट नहीं रखी गई। बुंदेलखंड के लोग कोई खैरात नहीं मांग रहे। हम बस इतना चाहते हैं कि सरकार अपने ही कानूनों का पालन करे। हमारा आंदोलन संविधान में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन राज्य सरकार के इशारे पर झूठे मुकदमे दर्ज करने, गैरकानूनी तरीके से बेदखली करने, घरों की बिजली काटने तथा स्कूलों और पूजा स्थलों को ढहाने जैसे अमानवीय और गैरकानूनी कदम उठा रहा है, ताकि प्रभावित लोगों के बीच भय का वातावरण बनाया जा सके।
जल नीति शोधकर्ता एवं साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सेंड्रप) के समन्वयक हिमांशु ठक्कर का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना बुरी तरह पुराने पड़ चुके अनुमानों पर आगे बढ़ रही है और एक पारिस्थितिक रूप से अव्यावहारिक योजना के लिए केन नदी को मौसमी नाले में बदलने का खतरा पैदा कर रही है।
उन्होंने कहा कि पूरी परियोजना का जल-विज्ञान संबंधी आधार 2003-04 के पुराने आंकड़ों पर टिका है। आज केन नदी में वास्तव में कितना पानी उपलब्ध है, इसका कोई ताज़ा वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया है।
सरकार के आंतरिक पत्राचार से यह भी पता चलता है कि अधिकारियों को स्वयं दौधन बांध की वार्षिक जल-क्षमता को लेकर गंभीर संदेह थे। सरकारी अनुमान 4,490 से 6,590 एमसीएम के बीच हैं, और इसकी ऊपरी सीमा भी परियोजना के निर्धारित सिंचाई तथा पेयजल लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही है।
हिमांशु ठक्कर के अनुसार केवल जल उपलब्धता ही नहीं, बल्कि वन मंजूरी की अनिवार्य शर्तों का भी खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मई 2017 की चरण-1 वन मंजूरी की शर्त संख्या 11 के तहत पेड़ों की ताज़ा गणना अनिवार्य थी। पन्ना टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक स्वयं पुष्टि कर चुके हैं कि ऐसी कोई गणना नहीं हुई।
इसी प्रकार अक्टूबर 2023 की चरण-2 वन मंजूरी की शर्त संख्या 43 के अनुसार यदि मंजूरी की सभी शर्तें एक वर्ष के भीतर पूरी नहीं होतीं, तो मंजूरी स्वतः निरस्त हो जाती है।
परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर 78 मेगावाट का पावर प्लांट भी स्थापित करना चाहती है। उनका कहना है कि वन मंजूरी की शर्तें टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में ऐसे किसी भी निर्माण को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करती हैं। विशेषज्ञ इसे वन्यजीव संरक्षण की शर्तों का सीधा उल्लंघन मानते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इन शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो आज निर्माण कार्य किस कानूनी आधार पर जारी है?
बड़ा खतरा: लगभग 46 लाख पेड़ों की कटाई और पन्ना टाइगर रिजर्व के 5,803 हेक्टेयर कोर क्षेत्र का डूबना।
अरावली विरासत जन अभियान की सह-संस्थापक नीलम आहलूवालिया का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, वह मध्य भारत के सबसे अनमोल और अपूरणीय पारिस्थितिक गलियारों में से एक को व्यवस्थित रूप से नष्ट करना है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) ने भी इस मूल धारणा पर सवाल उठाया था कि केन नदी में वास्तव में अतिरिक्त पानी उपलब्ध है। समिति ने यह भी चेतावनी दी थी कि यह परियोजना पारिस्थितिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अव्यावहारिक सिद्ध हो सकती है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि बुंदेलखंड क्षेत्र में पहले से मौजूद 11 बड़ी और 171 छोटी सिंचाई परियोजनाओं को सुदृढ़ करने जैसे कम खर्चीले और विकेंद्रीकृत विकल्पों पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया गया है।
उनके अनुसार दौधन बांध 9,000 हेक्टेयर से अधिक घने जंगल को डुबो देगा, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र के 5,803 हेक्टेयर वन शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यह कोई बंजर भूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है, जहां बाघ, घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, गिद्ध, चिंकारा, भेड़िए और दुर्लभ महाशीर मछलियां निवास करती हैं। केन घड़ियाल अभयारण्य तथा नदी किनारे स्थित गिद्धों के महत्वपूर्ण घोंसला स्थल भी बदले हुए नदी प्रवाह और नए जलाशय से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब भारत जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल है, तब देश के कार्बन सिंक को सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है।
आंदोलन का कारण: केन-बेतवा परियोजना में पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी, पुनर्वास नीतियों का उल्लंघन और प्रभावित ग्रामीणों से बिना सहमति ज़मीन छीनने का विरोध।
आदिवासी समन्वय मंच भारत की युवा नेता कुसुम रावत, जिन्होंने हाल ही में मध्य प्रदेश के प्रभावित गांवों का दौरा किया, ने कहा कि “चिता आंदोलन का दोबारा शुरू होना भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के लगातार उल्लंघन को उजागर करता है। इस अधिनियम की धारा 38(1) स्पष्ट करती है कि राज्य तब तक भूमि पर पूर्ण कब्जा नहीं कर सकता, जब तक मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े सभी अधिकार पूरी तरह सुनिश्चित न कर दिए जाएं।
धारा 21 के तहत जिला कलेक्टर द्वारा सार्वजनिक नोटिस जारी करना अनिवार्य है। साथ ही प्रभावित लोगों को व्यक्तिगत दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 30 दिन से लेकर छह महीने तक का समय दिया जाना आवश्यक है। केन और बेतवा नदी घाटियों का भविष्य कानून के शासन से तय होना चाहिए, बुलडोज़रों से नहीं।”
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को लेकर पुनः शुरू हुआ चिता आंदोलन केवल एक पुनर्वास या मुआवज़े का संघर्ष नहीं है, बल्कि भारत के संविधान, पर्यावरणीय कानूनों, वन एवं वन्यजीव संरक्षण, ग्राम सभा की संवैधानिक भूमिका तथा भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनी अधिकारों के पालन का प्रश्न बन गया है। *(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)* *(विनायक फीचर्स)*

