क्या AI ले पाएगा इंसानी अनुभव की जगह? जानिए असली सच

(लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं)
हाल ही में अमेरिका की प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंपनी “फोर्ड” ने AI को अपनाकर अपने कुछ कर्मचारियों को हटा दिया था। लेकिन शीघ्र ही उसे AI की सीमाओं के चलते होने वाले नुक्सान को देखते हुए उन्हें पुनः काम पर रखना पड़ा। इसी प्रकार ग्राहक सेवा क्षेत्र की एक नामी फिनटेक कंपनी “क्लार्ना” को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि केवल AI आधारित संवाद ग्राहक संतुष्टि का विकल्प नहीं बन सकता, इसलिए उसे भी अपने संस्थान में कर्मचारियों की संख्या फिर से बढ़ानी पड़ी। ऐसे ही एक अन्य प्रमुख
अमरीकी IT कम्पनी IBM ने भी AI के साथ अनुभव और विशेषज्ञता वाले कार्मिकों की आवश्यकता को दोबारा रेखांकित किया है। ये सभी कंपनियां बदलते समय के साथ ताल से ताल मिलकर अपने सिस्टम को AI आधारित बनाने की ओर बढ़ रही थीं और अपने कर्मचारियों को हटा के उनका काम AI से लेने लगीं थीं। लेकिन इनको शीघ्र ही अपने कर्मचारी वापस बुलाने पड़े। ये वे घटनाएँ हैं जो हमें AI पर हमारी बढ़ती निर्भरता पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर रही हैं।
ये घटनाएँ AI की विफलता की सूचक नहीं हैं लेकिन हाँ इस भ्रम के टूटने का संकेत अवश्य हैं कि AI मानव का स्थान ले सकती है।
हम मनुष्यों ने सदियों तक मशीनें इसलिए बनाईं कि वे हमारा शारीरिक श्रम कम कर सकें। लेकिन इतिहास में पहली बार आज मशीनें बौद्धिक श्रम भी कर रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता Artificial Intelligence) के इस दौर ने हम सभी के सामने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या मशीनें केवल हमारा काम आसान करेंगी, या एक दिन हमारे अनुभव, निर्णय और विवेक का भी स्थान ले लेंगी?
दरअसल पिछले कुछ वर्षों में AI को लेकर जितना उत्साह दिखाई दिया, उतनी ही आशंकाएँ भी पैदा हुईं। एक तरफ यह विज्ञान के चमत्कार के रूप में देखा जा रहा था तो दूसरी तरफ करोड़ों नौकरियों के अंत की शुरुआत के रूप में। किंतु परिदृश्य लगातार बदलता जा रहा है।
समय के साथ यह बात सामने आ रही है कि आखिर AI की भी सीमाएं हैं। भले ही वह कुछ ही क्षणों में करोड़ों दस्तावेज़ों का विश्लेषण कर सकता है, पैटर्न पहचान सकता है, संभावनाओं का अनुमान लगा सकता है और मनुष्य से कहीं अधिक गति से उत्तर दे सकता है। लेकिन मूलभूत तथ्य यह है कि AI सोच नहीं सकता। हाँ, वह गणना कर सकता है लेकिन उसका प्रत्येक उत्तर उसी डेटा पर आधारित होता है जिससे उसे प्रशिक्षित किया गया है। यदि डेटा अधूरा, पक्षपाती या त्रुटिपूर्ण है, तो वो परिणाम भी वैसा ही देगी।
यहीं से अनुभव एवं डाटा तथा तार्किक बुद्धि और तथ्यात्मक विश्लेषण में समन्वय का महत्व रेखांकित होता है।
एक अनुभवी इंजीनियर मशीन की हल्की-सी असामान्य आवाज़ सुनकर आने वाली बड़ी खराबी का अनुमान लगा सकता है। एक वरिष्ठ डॉक्टर जाँच रिपोर्ट सामान्य होने के बावजूद रोगी के शारीरिक लक्षणों एवं व्यवहार से छिपी हुई बीमारी को उसके शुरुआती स्टेज में ही पहचान सकता है। एक संवेदनशील शिक्षक यह समझ लेता है कि किसी छात्र की चुप्पी उसकी कमज़ोरी नहीं उसके मानसिक संघर्ष का संकेत है। एक कुशल प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या बढ़ई वर्षों के अपने अनुभव से ऐसी सूक्ष्म त्रुटियाँ पकड़ लेता है जिन्हें कोई मशीन तुरंत नहीं पहचान सकती। और यहीं AI मनुष्य से पिछड़ जाती है क्योंकि अनुभव वह संपत्ति है जिसे डाउनलोड नहीं किया जा सकता।
क्योंकि ज्ञान अपने आप में तब तक अधूरा है जब तक उसे व्यवहार में न उतरा जाए। केवल युटुब के वीडियो देखकर आप परफेक्ट आटा गूंथना या रोटी बेलना या पेंटिंग करना नहीं सीख सकते जब तक आप के पास अभ्यास का अनुभव न हो।
AI और मनुष्य के बीच सबसे बड़ा अंतर भी यही है।
AI डेटा देखता है, मनुष्य संदर्भ समझता है।
AI पैटर्न पहचानता है, मनुष्य अपवाद पहचानता है।
AI संभावना बताता है, मनुष्य जोखिम का आकलन करता है।
AI उत्तर देता है, मनुष्य निर्णय लेता है।
और सबसे महत्वपूर्ण, AI अपने निर्णय की नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेता, मनुष्य लेता है।
यही कारण है कि करुणा, सहानुभूति, अंतर्ज्ञान, नैतिक विवेक और उत्तरदायित्व आज भी किसी एल्गोरिद्म में नहीं डाले जा सके हैं। AI कभी अपराधबोध महसूस नहीं करता, वह कभी दुविधा में नहीं पड़ता और न ही किसी निर्णय के नैतिक परिणामों का बोझ उठाता है। वह वही सीखता है जो मनुष्य उसे सिखाता है। इसलिए AI की गुणवत्ता अंततः मनुष्य की गुणवत्ता पर ही निर्भर करती है।
अतः भविष्य में सबसे अधिक मूल्य उन लोगों का होगा जिनके पास गहरी विशेषज्ञता, व्यावहारिक अनुभव और निर्णय क्षमता होगी ताकि वे AI की सहायता से कार्य की गुणवत्ता को सुधार सकें।
इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति ने मनुष्य की क्षमता बढ़ाई है, उसका महत्व कम नहीं किया। भाप के इंजन ने श्रम को बदला, कंप्यूटर ने गणना को बदला, इंटरनेट ने संचार को बदला। AI भी काम करने के तरीके बदलेगा, लेकिन वह अनुभव, विवेक और मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं बन सकता।
क्योंकि जहाँ एल्गोरिद्म रुक जाता है, वहीं से अनुभव अपना रास्ता बनाना शुरू करता है।
डॉ नीलम महेंद्र
लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं।

