ये कैसा लॉजिक है भाई: खेल की दीवानगी, सियासत का चश्मा और हमारी दिमागी कसरत
लेखक: राजकुमार अग्रवाल
जब दुनिया पर फुटबॉल का बुखार चढ़ता है, तो सिर्फ मैदान पर पसीना नहीं बहता, बल्कि मैदान के बाहर सोशल मीडिया के कीबोर्ड और चाय की थड़ियों पर तर्कों, कुतर्कों और अजीबो-गरीब साजिशों का ऐसा रेला बहता है कि अच्छे-भले इंसानों का सिर चकरा जाए। फुटबॉल फीवर के बीच तरह-तरह की दिलचस्प बातें और कमाल के बहाने ‘तर्कों’ का वेश धरकर हमारे सामने आए हैं।
इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिन पर हँसा भी नहीं जा सकता। कोई कहता है कि रेफरी बिका हुआ था, कोई कहता है कि वीएआर (VAR – Video Assistant Referee) टेक्नोलॉजी को सिर्फ एक खास टीम को जिताने के लिए मैनिपुलेट किया गया, तो कोई सीधे फीफा (FIFA) के कर्ता-धर्ताओं को ‘धनपिशाच’ घोषित कर देता है। उनका कहना होता है कि इन धन पिशाचों का अर्जेंटीना और लियोनेल मेसी से कुछ ऐसा गुप्त प्यार है कि वे पूरी दुनिया को उनके कदमों में झुकाना चाहते हैं। सच कहूँ तो ये सारी बातें इतनी बचकानी हैं कि ये जवाब देने के लायक भी नहीं हैं। इन्हें सुनकर बस मुस्कुराया जा सकता है और आगे बढ़ा जा सकता है।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। हमारे समाज के कुछ बहुत ही प्रबुद्ध और ज्ञानी लोग, जिन्हें हम प्यार से ‘सुधीजन’ कह सकते हैं, एक बिल्कुल नया और बेहद ‘पवित्र’ किस्म का लॉजिक ढूंढकर लाए हैं। उनका यह लॉजिक इतना मारक और खतरनाक है कि इसे पढ़कर आपकी खेल भावना और सामान्य समझ दोनों ही सन्न रह जाएंगी।
उनका सबसे मारक और ‘पवित्र’ लॉजिक यह है:
“चूंकि अर्जेंटीना की मौजूदा हुकूमत अमेरिका और इजरायल परस्त है, इसलिए फुटबॉल के मैदान पर उसकी टीम का हारना बेहद जरूरी है।”
सुनने में यह बात आपको हँसी वाली लग सकती है, लेकिन यकीन मानिए, सोशल मीडिया और बौद्धिक विमर्श के गलियारों में इस खतरनाक तर्क को ऐसा ‘होली काऊ’ (Holy Cow) यानी परम पूज्य बनाकर रखा जा रहा है कि जैसे इसके खिलाफ आपने एक शब्द भी बोला, तो आपका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा। आपको तुरंत ही जनविरोधी, क्रांति द्रोही या किसी खास खेमे का दलाल घोषित कर दिया जाएगा।
अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, यह कैसा लॉजिक है भाई? अगर इस तर्क को मान लिया जाए, तो फिर तो खेल की दुनिया ही नहीं, बल्कि हमारी पूरी जिंदगी की सामान्य समझ को उलट-पुलट कर फेंकना पड़ेगा। चलिए, आज इसी लॉजिक की खाल उधेड़ते हैं और देखते हैं कि अगर हम इस कुतर्क की उंगली पकड़कर चले, तो दुनिया कितनी अजीब और डनावनी हो जाएगी।
यदि इस ‘कुतर्क’ को मान लिया गया, तो क्या-क्या उलटना-पलटना पड़ेगा?
चलिए, मान लेते हैं कि हमारे इन सुधीजनों की बात एकदम सोलह आने सच है। खेल को देश की मौजूदा सरकार की विदेश नीति और राजनीतिक गठजोड़ के तराजू पर ही तोला जाना चाहिए। अगर हम इस नियम को लागू कर दें, तो इसकी शुरुआत हम खेल से और अपने खुद के घर (भारत) से ही करते हैं। देखते हैं कि फिर हमारी खेल विरासत और नायकों का क्या हश्र होगा:
क्या अर्जेंटीना का हारना जरूरी है? खेल और राजनीति के घालमेल पर एक तीखा विश्लेषण
1. महिला कुश्ती और बेटियों का संघर्ष: क्या इसे रद्द कर दें?
देश ने हाल के वर्षों में हमारी महिला पहलवानों का एक बेहद गरिमामय और बहादुरी से भरा संघर्ष देखा है। जंतर-मंतर की सड़कों पर अपनी गरिमा के लिए लड़ती उन बेटियों को देखकर पूरे देश की आँखें नम थीं। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बाकी लड़कियों ने जब भी देश के लिए मेडल जीता, हमने अपनी छाती गर्व से चौड़ी कर ली।
लेकिन हमारे सुधीजनों के लॉजिक के हिसाब से:
इन लड़कियों ने जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीते और देश का नाम रोशन किया, तब देश में ‘नव-फासिस्ट’ मोदी की सरकार सत्ता में थी।
इसलिए, इस लॉजिक के रेट्रोस्पेक्टिव (भूतलक्षी) प्रभाव से इन लड़कियों के खेल की सराहना करना और उनकी इस ऐतिहासिक लड़ाई का साथ देना, दोनों ही कामों को तुरंत रद्द कर देना चाहिए!
क्यों? क्योंकि वे जिस देश का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, वहाँ की सरकार की नीतियाँ हमारे इन बौद्धिकों को पसंद नहीं थीं।
सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि खेल की जिस जीत ने देश को एकजुट किया, उसे सिर्फ सत्ता के विरोध की सनक में खारिज कर दिया जाए!
2. टीम इंडिया की हार की दुआ माँगना: एक नया ‘देशभक्ति’ कर्तव्य?
इस लॉजिक को अगर हम क्रिकेट या किसी भी अन्य टीम गेम पर लागू करें, तो स्थिति और भी मजेदार और हास्यास्पद हो जाएगी।
अब से जब भी भारत की क्रिकेट टीम, हॉकी टीम या कोई भी एथलीट दुनिया के किसी भी कोने में तिरंगा लेकर खेलने उतरेगा, तो हर उस भारतीय का—जो वर्तमान सरकार की नीतियों से असहमत है—यह ‘परम और पवित्र कर्तव्य’ होगा कि वह सीधे मैदान में जाए या टीवी के सामने बैठकर अपनी ही टीम की हार के नारे लगाए!
क्यों? क्योंकि वे उस देश की ओर से खेलने गए हैं जिसमें मोदी सरकार है।
अगर टीम इंडिया जीत गई, तो इसका मतलब होगा कि मोदी सरकार की नीतियां जीत गईं! इसलिए, अपनी ही टीम की हार की दुआ मांगो ताकि सरकार को नीचा दिखाया जा सके।
क्या कोई भी सामान्य दिमाग का इंसान इस तरह की सोच को जायज ठहरा सकता है? लेकिन इस कुतर्क की अंतिम परिणति यही है।
इतिहास के पन्नों से कुछ ‘डबल पनिशमेंट’ के किस्से
अगर आपको लगता है कि यह लॉजिक सिर्फ आज के दौर के लिए है, तो जरा पीछे चलते हैं। इतिहास के कुछ ऐसे महान नायकों और घटनाओं को याद करते हैं जिनके बिना खेल का इतिहास ही अधूरा है। अगर हम इस राजनीतिक चश्मे को इतिहास पर लगाएं, तो देखिए क्या तमाशा खड़ा होता है:
मेजर ध्यानचंद और हिटलर का बर्लिन ओलंपिक
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का नाम सुनते ही हर भारतीय का सिर आदर से झुक जाता है। साल 1936 का बर्लिन ओलंपिक याद कीजिए।
अब हमारे इन सुधीजनों के हिसाब से:
जब ध्यानचंद और उनकी टीम खेलने गई थी, तब भारत पर बर्बर ब्रिटिश हुकूमत का राज था। यानी हमारी टीम एक औपनिवेशिक, अत्याचारी सत्ता का प्रतिनिधित्व कर रही थी।
दूसरी तरफ, जर्मनी के बर्लिन में दर्शक दीर्घा में साक्षात मानवता का सबसे बड़ा हत्यारा एडोल्फ हिटलर बैठा हुआ था।
इस हिसाब से तो उस समय की भारतीय हॉकी टीम ‘डबल पनिशमेंट’ (दोहरी सजा) की हकदार है!
एक तो वे अंग्रेजों के गुलाम भारत की तरफ से खेल रहे थे, ऊपर से उन्होंने हिटलर के सामने खेलकर खेल का ‘अपमान’ किया! तो क्या ध्यानचंद को दिए गए सारे मान-सम्मान वापस ले लिए जाएं? क्या उनके उस जादुई खेल को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाए?
फुटबॉल के सम्राट पेले और ब्राजील की बर्बर तानाशाही
फुटबॉल की दुनिया के सबसे चमकीले सितारों में से एक, एडसन अरांटिस डो नासिमेंटो… जिन्हें पूरी दुनिया ‘पेले’ के नाम से जानती है। पेले ने ब्राजील को तीन विश्व कप दिलाए और फुटबॉल को एक कला का रूप दिया।

लेकिन जरा उस दौर के ब्राजील के इतिहास पर नज़र डालिए:
साल 1964 से 1971 तक का दौर पेले के करियर का सबसे सुनहरा दौर (Prime) था।
इसी दौरान ब्राजील में एक बेहद क्रूर और बर्बर सैन्य तानाशाह (Military Dictatorship) का शासन था, जो अपने ही नागरिकों पर जुल्म ढा रहा था।
उधर सरकार लोगों के खून से अपने हाथ लाल कर रही थी, और इधर पेले थे कि मैदान पर गोल पर गोल दागे जा रहे थे और ब्राजील के लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला रहे थे।
तो क्या इस लॉजिक के आधार पर पेले को भी दंडित किया जाना चाहिए? क्या हमें पेले के खेल का बहिष्कार कर देना चाहिए था क्योंकि उनकी सरकार तानाशाह थी? क्या पेले उस फौजी हुकूमत के जूतों के तले दबे ब्राजील के गुनाहों के साझीदार थे?
अगर आपका जवाब ‘हाँ’ है, तो फिर आपको खेल देखने का कोई हक नहीं है। और अगर आपका जवाब ‘ना’ है, तो फिर अर्जेंटीना के साथ यह दोहरा मापदंड क्यों?
खेल, खिलाड़ी और सत्ता: यह कैसा अजीब घालमेल है?
एक बुनियादी सच जो हमें कभी नहीं भूलना चाहिए:
“खिलाड़ी अपने पसीने, मेहनत और प्रतिभा से मैदान पर उतरता है। वह किसी सरकार का पीआर (PR) एजेंट नहीं होता।”
हे तात! खेल को खेल ही रहने दीजिए न। खिलाड़ियों के कंधों पर उनके देशों की राजनीति की अच्छाई या बुराई का जिम्मा मत डालिए।
क्या विराट कोहली, विनेश फोगाट या साक्षी मलिक ने मौजूदा सरकार की नीतियों को खुद तैयार किया है? नहीं।
क्या लियोनेल मेसी या उनकी टीम ने अर्जेंटीना के उस दक्षिणपंथी राष्ट्रपति को चुना है जो अमेरिका या इजरायल का पिट्ठू बना हुआ है? बिल्कुल नहीं।
खिलाड़ी देश की मिट्टी से पैदा होते हैं, अक्सर बेहद गरीबी और तंगहाली से जूझते हुए अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया के मंच पर पहुंचते हैं। उनका मकसद अपने खेल की कला को प्रदर्शित करना और अपने देश का मान बढ़ाना होता है, न कि अपनी सरकार की विदेश नीति का ढिंढोरा पीटना।
इतिहास के आईने में ‘दूध के धुले’ देश: कौन है जो गंगा नहाया हुआ है?
जब हम फाइनल मुकाबले में दो टीमों को आमने-सामने देखते हैं, मान लीजिए स्पेन और अर्जेंटीना, तो हमारा समर्थन तय करने का आधार क्या होना चाहिए? जाहिर तौर पर खेल की सुंदरता, खिलाड़ियों का कौशल और उनकी खेल भावना। लेकिन अगर हम सरकारों की राजनीति और इतिहास को आधार बनाने लगे, तो यकीन मानिए, आपको पूरी दुनिया में किसी भी टीम का समर्थन करने के लिए एक भी ‘पवित्र’ देश नहीं मिलेगा।
जरा इन देशों के इतिहास और वर्तमान पर एक नजर डालते हैं:
| देश | ऐतिहासिक / वर्तमान दाग |
| स्पेन | लैटिन अमेरिका में सदियों तक कत्लेआम मचाने वाला क्रूर औपनिवेशिक इतिहास। |
| इंग्लैंड | आधी से ज्यादा दुनिया को अपनी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ने और तबाही मचाने का इतिहास। |
| फ्रांस | अफ्रीका के दर्जनों देशों का खून चूसने और आज भी वहां आर्थिक उपनिवेशवाद बनाए रखने का आरोप। |
| नीदरलैंड | इंडोनेशिया और अन्य एशियाई देशों में बर्बर औपनिवेशिक शासन। |
| बेल्जियम | कांगो में राजा लियोपोल्ड द्वितीय द्वारा किया गया वो नरसंहार जिसके घाव आज भी हरे हैं। |
तो बताइए, इनमें से कौन सा देश दूध से धुला हुआ है? कौन सा देश गंगा नहाया हुआ है?
अगर हम इन देशों के इतिहास और इनकी सरकारों की दुष्टता को देखकर इनकी खेल टीमों से नफरत करने लगें, तो हमें यूरोपीय कप और विश्व कप का पूरी तरह से बहिष्कार कर देना चाहिए। लेकिन हम ऐसा नहीं करते। क्यों? क्योंकि हम जानते हैं कि मैदान पर दौड़ने वाला फ्रांस का अश्वेत खिलाड़ी या बेल्जियम का मिडफील्डर अपनी सरकार के अतीत या वर्तमान के गुनाहों का प्रतिनिधि नहीं है। वह बस एक कलाकार है जो फुटबॉल के कैनवास पर अपनी कला के रंग बिखेर रहा है।
डिएगो माराडोना, चे ग्वेरा और फिदेल कास्त्रो: जब खेल ने क्रांति को गले लगाया
लैटिन अमेरिकी फुटबॉल की बात हो और महान डिएगो माराडोना का जिक्र न आए, यह नामुमकिन है। माराडोना सिर्फ एक महान फुटबॉलर नहीं थे, वे एक बेहद राजनीतिक इंसान भी थे।
माराडोना महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा को अपना आदर्श मानते थे। उनकी दाहिनी बाजू पर चे ग्वेरा का टैटू हमेशा चमकता रहता था।
वे क्यूबा के महान कम्युनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो को अपना गहरा दोस्त और पिता समान मानते थे। उन्होंने अपने बाएं पैर पर कास्त्रो का टैटू भी गुदवाया हुआ था।

माराडोना ने हमेशा साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और इसकी भारी कीमत भी चुकाई। उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन वे कभी झुके नहीं।
लेकिन यहाँ समझने वाली बात क्या है?
माराडोना के इस वामपंथी झुकाव और फिदेल कास्त्रो से उनकी दोस्ती की वजह से क्या अर्जेंटीना की सरकार वामपंथी या अवाम परस्त बन गई थी? नहीं! अर्जेंटीना में उस समय भी और उसके बाद भी दक्षिणपंथी और अमेरिका-परस्त सरकारें आती-जाती रहीं।
तो जब माराडोना के वामपंथी होने से अर्जेंटीना की सरकार वामपंथी नहीं हो गई, तो आज अर्जेंटीना के किसी दक्षिणपंथी शासक के सत्ता में होने से मेसी की टीम ‘जियोनिस्ट’ या साम्राज्यवादी कैसे हो गई? यह दोहरा मापदंड आखिर क्यों?
खेल के रोमांच का लुत्फ लीजिए, चिल रहिए!
प्यारे खेल प्रेमियों और खास तौर पर हमारे ज्ञानवर्धक सुधीजनों! जिंदगी पहले ही बहुत जटिल है। चारों तरफ नफरत, राजनीति, युद्ध और कूटनीति का जाल बुना हुआ है। इन सबके बीच खेल ही एक ऐसा कोना बचता है जहां इंसान अपनी पहचान, जाति, धर्म और देश की सीमाओं से ऊपर उठकर शुद्ध मानवीय क्षमता और सौंदर्य का उत्सव मना सकता है।
जब लियोनेल मेसी मैदान पर तीन डिफेंडरों को छकाते हुए जादुई पास देते हैं, तो वह किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार नहीं कर रहे होते।
जब कोई गोलकीपर अपनी जान की बाजी लगाकर गोल बचाता है, तो वह किसी देश की विदेश नीति का बचाव नहीं कर रहा होता।
इसलिए, इस फालतू के दिमागी कसरत और कुतर्कों को डस्टबिन में डालिए। अपनी पसंदीदा टीम चुनिए, चाहे वह स्पेन हो, अर्जेंटीना हो या कोई और। उनके खेल को देखिए, उनकी कला की सराहना कीजिए, हार-जीत के उस रोमांचक दर्द और खुशी को महसूस कीजिए।
राजनीति करने के लिए पूरी दुनिया और चौबीस घंटे पड़े हैं, खेल के इन चंद मिनटों को तो बख्श दीजिए।

