सुप्रीम कोर्ट में जज ‘जनता के नौकर’ या ‘न्यायिक सेवक’? कोर्ट रूम हंगामे और कानून के छात्र की गिरफ्तारी का पूरा सच
नई दिल्ली/15 जुलाई 2026 /अटल हिन्द ब्यूरो
अदालतों में बैठे न्यायाधीशों की भूमिका और उनके दायित्वों को लेकर देश में हमेशा से बहस होती रही है। एक पक्ष का मानना है कि चूंकि न्यायपालिका जनता के टैक्स से चलती है, इसलिए जज भी तकनीकी रूप से जनता के सेवक हैं। लेकिन क्या इस तर्क की आड़ में देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर मर्यादा की सीमाएं लांघी जा सकती हैं?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक ऐसा ही मामला सामने आया, जिसने इस बहस को हवा दे दी है। लखनऊ विश्वविद्यालय के कानून के छात्र और स्वयं को वकील बताने वाले याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप सिंह को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस गिरफ्तारी और घटना के पीछे के कानूनी व नैतिक पहलुओं को समझना बेहद जरूरी है।
‘न्यायिक सेवक’ और ‘जनता का आक्रोश’: क्या था याचिकाकर्ता का तर्क?
सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप सिंह ने खुद पैरवी करते हुए जजों को सीधे ‘न्यायिक सेवक’ (Judicial Servant) कहकर संबोधित किया। उनका कहना था:
“श्रीमान न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एएसपी के खिलाफ साइबर अपराध में एक गिरोह चलाने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें।”
इस कृत्य के बाद समाज और सोशल मीडिया का एक धड़ा यह तर्क दे रहा है कि लोकतंत्र में जज भी जनता के सेवक हैं और जब वे अपना काम सही तरीके से नहीं करते, तो जनता का आक्रोश इस रूप में बाहर आता है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि असंतोष व्यक्त करने का एक संवैधानिक तरीका होता है और कोर्ट रूम के भीतर अनुशासनहीनता को किसी भी तर्क से जायज नहीं ठहराया जा सकता।
कौन है सुप्रीम कोर्ट में जजों को आइना दिखाने वाला व्यक्ति ?
सुप्रीम कोर्ट में जजों को आइना दिखाने वाले याचिकाकर्ता की पहचान प्रबल प्रताप के रूप में बताई गई है. वह पेशे से वकील बताया जा रहा है और अपने मामले में स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में अदालत के सामने पेश हुआ था. मामले की सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप ने पीठ के सामने अपनी मांग रखते हुए जजों को ‘न्यायिक सेवक’ कहकर संबोधित किया.इसके बाद उसने कथित तौर पर कहा कि श्रीमान न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एएसपी के खिलाफ साइबर अपराध में एक गिरोह चलाने के आरोप में FIR दर्ज करने का आदेश दें. याचिकाकर्ता के बोलने के तरीके और शब्दों को सुनकर अदालत में मौजूद लोग हैरान रह गए. अगर देखा जाये तो अदालत में बैठे जज जनता के टैक्स से तन्खा लेते है इस हिसाब से अदालतों में बैठे जज जनता के नौकर ही तो हुए इसमें प्रबल प्रताप सिंह ने अदालत में गलत क्या है जब जज अपना काम नहीं करेंगे तो जनता में आक्रोश तो पैदा होगा ही यही सचाई प्रबल प्रताप सिंह ने अदालत को दिखाई।
पूरा घटनाक्रम: दलीलों की जगह हंगामा
बीती 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी।
जब पीठ ने याचिकाकर्ता के “आदेश देने” वाले लहजे पर आश्चर्य जताया, तो प्रबल प्रताप सिंह ने कानूनी दलीलें देने के बजाय उग्र रुख अपना लिया।
उसने कोर्ट रूम में केस से जुड़ी फाइलें और दस्तावेज हवा में उछाल दिए।
इसके बाद उसने कथित तौर पर देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।
स्थिति बिगड़ती देख कोर्ट के सुरक्षाकर्मियों ने उसे तुरंत काबू में किया और कोर्ट रूम से बाहर ले गए।
कोर्ट की दरियादिली बनाम पुलिस का एक्शन
इस घटना के बाद अमूमन कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना (Contempt of Court) की सख्त कार्रवाई करता है। लेकिन जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मानवीय रुख अपनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता काफी परेशान और हताश दिख रहा था, इसलिए वे उसके खिलाफ कोई न्यायिक या अवमानना की कार्रवाई नहीं करना चाहते।
फिर भी गिरफ्तारी क्यों हुई?
अदालत की इस नरमी के बावजूद दिल्ली पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया। इसके पीछे का मुख्य कारण यह है:
सुरक्षाकर्मियों की शिकायत: यह एफआईआर जजों के कहने पर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा संभालने वाले सुरक्षाकर्मियों की शिकायत पर दर्ज की गई थी।
कानून का उल्लंघन: कोर्ट परिसर में हंगामा करना, सरकारी काम में बाधा डालना और सुरक्षाकर्मियों से उलझना एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) है। भले ही कोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई छोड़ दी हो, लेकिन सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस कार्रवाई के लिए स्वतंत्र थी।
क्या है वर्तमान स्थिति और आगे क्या होगा?
गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस ने मुख्य आरोपी प्रबल प्रताप सिंह और उसके साथी चंद्रभान को कोर्ट में पेश किया। दो दिन की पुलिस रिमांड पूरी होने के बाद, पटियाला हाउस कोर्ट ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में भेज दिया है।
अब दिल्ली पुलिस इस मामले की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल करेगी, जिसके बाद तय होगा कि आरोपियों पर आगे का मुकदमा किस तरह से चलाया जाएगा। यह मामला आने वाले दिनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और सुरक्षा के मानकों के बीच एक बड़ा उदाहरण बनेगा।

