नीट धांधली के खिलाफ अनशन: सोनम वांगचुक को पुलिस ने जबरन अस्पताल में भर्ती कराया, विपक्षी नेताओं ने कहा- ‘तानाशाही की हद’
नई दिल्ली/18 जुलाई 2026 /अटल हिन्द ब्यूरो
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र और सामाजिक आंदोलन शनिवार तड़के एक बड़े सियासी और प्रशासनिक टकराव में बदल गया। नीट (NEET) परीक्षा में हुई कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ पिछले 21 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे देश के जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने तड़के सुबह जबरन धरनास्थल से उठा लिया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। इस अचानक हुई कार्रवाई के बाद जंतर-मंतर पर छात्रों और पुलिस के बीच तीखी बहस हुई, वहीं दूसरी ओर देश के तमाम बड़े विपक्षी नेताओं ने इस कदम को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार को घेरा है।
तड़के सुबह जंतर-मंतर पर क्या हुआ? (चश्मदीदों की जुबानी)
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में यह आंदोलन पिछले 30 दिनों से लगातार जारी है। सोनम वांगचुक 28 जून को छात्रों के समर्थन में इस अनशन पर बैठे थे।

धरनास्थल पर मौजूद एक आंदोलनकारी ने समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) को सुबह की पूरी कहानी बताते हुए कहा:
“सुबह-सुबह इन लोगों ने ‘डॉक्टरों की टीम’ बोलकर करीब 10 पुलिसवालों को अंदर भेजा। हम तुरंत समझ गए थे कि ये पुलिसवाले हैं, क्योंकि वे दूर-दूर से भी डॉक्टर जैसे नहीं दिख रहे थे। उन्होंने आते ही सारे वॉलंटियर्स को कहा कि आप लोग इस जगह से तुरंत हट जाइए। इस पर वॉलंटियर्स ने पुलिस से कहा कि पौने नौ बजे सोनम जी का नियमित मेडिकल चेकअप होता है, आप लोग उसी समय डॉक्टर की असली टीम के साथ आइए। लेकिन उन्होंने अचानक चिल्लाना शुरू कर दिया कि हमारे पास हाई कोर्ट का ऑर्डर है और हमें सोनम जी को अभी ले जाना होगा।”
चश्मदीद ने आगे आरोप लगाया:
“अभिजीत दीपके उस समय टॉयलेट की तरफ गए हुए थे, पुलिस ने उन्हें भी वहीं रोक कर हिरासत में ले लिया। इस वजह से न तो वह यहाँ आ पा रहे हैं और न ही उनका फोन लग पा रहा है। पुलिसवालों ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ मारपीट भी की। वे लोग सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में थे और लगातार कह रहे थे कि आप लोग हट जाइए। इस धक्का-मुक्की और मारपीट में हमारे कुछ साथियों को चोटें भी आई हैं।”
सोनम वांगचुक को ले जाने के बाद वहां मौजूद छात्रों में भारी गुस्सा और डर देखा गया। अनशन पर बैठे तीन अन्य छात्रों—नेहा, आमेन और मनीष—को भी हटाए जाने की आशंका थी, इसलिए बाकी बचे छात्रों ने उनके चारों तरफ एक ‘मानव श्रृंखला’ (Human Chain) बना ली और डटे रहे।
पुलिस और प्रशासन का पक्ष: ‘हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया’
इस पूरे मामले पर मचे हंगामे के बाद नई दिल्ली के डीसीपी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट ‘एक्स’ (X) पर पुलिस का पक्ष रखते हुए लिखा:
“दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, सोनम वांगचुक की लगातार बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें जरूरी मेडिकल देखभाल के लिए हॉस्पिटल ले जाया गया है। हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की, जिससे वहां हल्की अफ़रातफ़री की स्थिति बनी।”
पुलिस प्रशासन ने आगे कहा:
“इसके बावजूद पुलिस ने अधिकतम संयम बरता और पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित ढंग से पूरा किया। हम जंतर-मंतर पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों से भी अनुरोध करते हैं कि वे जल्द से जल्द इस जगह को शांतिपूर्वक तरीक़े से ख़ाली कर दें।”
दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया था कि डॉक्टरों की राय के आधार पर वांगचुक की सेहत की निगरानी की जाए और स्थिति बिगड़ने पर जरूरी कदम उठाए जाएं। अदालत का यह आदेश 20 जुलाई को होने वाले ‘संसद चलो’ मार्च से ठीक पहले आया था।
अस्पताल में वांगचुक का अनशन जारी: पत्नी ने लगाए गंभीर आरोप
सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद डॉ. चारु बंबा और अस्पताल प्रशासन ने उनका हेल्थ अपडेट जारी करते हुए कहा:
“सोनम वांगचुक शनिवार सुबह करीब 7:40 बजे अस्पताल पहुंचे। लंबे समय से उपवास करने की वजह से उन्हें थोड़ी कमजोरी है और शरीर में पानी की हल्की कमी (डिहाइड्रेशन) देखी गई है। उनके सभी वाइटल पैरामीटर (ब्लड प्रेशर, पल्स और ऑक्सीजन) फिलहाल स्थिर हैं। शरीर में पानी की कमी के कारण उनके इलेक्ट्रोलाइट स्तर पर थोड़ा असर पड़ा है, जिसके लिए उन्हें कुछ समय तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा।”
लेकिन, सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो ने अस्पताल की इस रिपोर्ट और पारदर्शिता पर बहुत गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट कर कहा:
“सफ़दरजंग अस्पताल की रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि सोनम वांगचुक का पोटैशियम लेवल अचानक 2.9 पर आ गया है, जबकि कल ही यह 4.3 था। अस्पताल प्रशासन न तो हमें किसी दूसरी लैब में ले जाकर दूसरी राय (सेकंड ओपिनियन) लेने की इजाज़त दे रहा है, और न ही हमारी मौजूदगी में उनका ब्लड सैंपल दे रहा है, जिसे हम खुद कहीं बाहर जांच करवा सकें।”
गीतांजलि ने आगे कहा:
“मैं पिछले तीन घंटे से डॉक्टरों के जवाब का इंतज़ार कर रही हूं, लेकिन उन्होंने अभी तक हमारी बात नहीं मानी है। पारदर्शिता की इस कमी से हमें गहरा शक हो रहा है। हमने अस्पताल से उन्हें तुरंत डिस्चार्ज करने के लिए कहा है, ताकि हम उन्हें किसी ऐसे अस्पताल ले जा सकें जहां हमें बेहतर भरोसा हो।”
इससे पहले गीतांजलि ने मीडिया और डॉक्टरों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा था:
“मैं दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हूँ। कृपया सोनम वांगचुक को मुँह के ज़रिए या नसों (ड्रिप) के माध्यम से कोई भी दवा या तरल पदार्थ तब तक न दिया जाए, जब तक मुझसे, उनके परिवार से और पिछले 20 दिनों से उनकी सेहत पर नज़र रख रहे निजी डॉक्टरों से लिखित सहमति न ले ली जाए। उनकी सहमति के बिना कुछ भी देना उनकी मर्जी के खिलाफ होगा।”
अस्पताल के सूत्रों के मुताबिक, सोनम वांगचुक ने भी डॉक्टरों द्वारा दी जा रही ड्रिप या मुंह से कोई भी लिक्विड लेने से साफ मना कर दिया है और अस्पताल के भीतर भी उनका अनशन जारी है।
गिरफ्तारी से पहले वांगचुक का आखिरी संदेश: ‘क्या बच्चों का भविष्य प्याज से भी सस्ता है?’
शुक्रवार रात को, यानी अस्पताल ले जाए जाने से कुछ घंटे पहले, सोनम वांगचुक ने अनशन के 20 दिन पूरे होने पर एक भावुक और विचारोत्तेजक वीडियो जारी किया था। उन्होंने हंसते हुए अपने समर्थकों से कहा था:
“हाँ, मैं अभी भी ज़िंदा हूँ। मेरे शरीर का 20 प्रतिशत हिस्सा ख़त्म हो चुका है। भूख हड़ताल में पहले चर्बी ख़त्म होती है, फिर मांसपेशियां गलती हैं। उसके बाद अंदरूनी अंग प्रभावित होते हैं और आख़िर में दिमाग़। लेकिन अभी वह समय नहीं आया है। मैं यह साबित करना चाहता हूँ कि मेरा दिमाग़ अभी भी पूरी तरह ठीक काम कर रहा है।”
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और जन आंदोलनों के असर पर बात करते हुए उन्होंने देश की जनता से एक तीखा सवाल किया था:
“मैं आपसे पूछता हूँ, भारत के लोग अपने बच्चों की ज़िंदगी और शिक्षा से ज़्यादा प्यार करते हैं या प्याज से? भारत के इतिहास में तीन बार सिर्फ प्याज की बढ़ती कीमतों के कारण पैदा हुए जन आक्रोश से सरकारें गिर गईं—1980 में केंद्र सरकार गिरी, 1998 में दिल्ली और राजस्थान की सरकारें गिर गईं। अगर देश की जनता प्याज की कीमतों पर सरकारें बदल सकती है, तो आज लाखों बच्चों के भविष्य, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर जनता खामोश क्यों है? इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत आम लोग हैं, इसलिए 20 जुलाई के मार्च को हमें हर हाल में कामयाब बनाना है।”
आंदोलन की अगली रणनीति: ‘संसद चलो’ मार्च होकर रहेगा
सोनम वांगचुक को हटाए जाने के बाद आंदोलनकारियों ने अपने कदम पीछे खींचने से मना कर दिया है।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने पुलिस की मारपीट का आरोप लगाते हुए एक वीडियो जारी किया और कहा:
“सुबह आपने देखा कि कैसे सोनम सर को उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ घसीटते हुए यहाँ से ले जाया गया। पुलिस ने मेरे साथ भी मारपीट की है। मैं विदेश से अपनी पढ़ाई और काम छोड़कर अपने देश लौटा हूँ, तो क्या मैं कोई अपराधी हूँ? लेकिन हमारा प्रदर्शन रुकेगा नहीं। सर से मेरी सुबह बात हुई थी और उन्होंने कहा है कि 20 जुलाई का मार्च हमें हर हाल में कामयाब बनाना है।”
अभिजीत ने आगे समर्थकों से अपील की:
“सभी समर्थकों से मैं निवेदन करता हूं कि 20 जुलाई को ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में जंतर-मंतर आइये। हम शांतिपूर्ण तरीक़े से संसद की तरफ चलेंगे। जितना संभव हो, लोग आज रात ही यहाँ पहुँचना शुरू कर दें, क्योंकि पुलिस आज रात हमें भी यहाँ से हटा सकती है। अगर आप सभी लोग यहाँ आ गए, तो पुलिस की हिम्मत हमें छूने की नहीं होगी।”
वहीं, सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो ने साफ कर दिया है:
“अगर सोनम इस मार्च में शामिल नहीं हो पाते हैं, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी। उनकी जगह इस ‘संसद चलो’ मार्च का नेतृत्व मैं खुद आगे बढ़कर करूंगी। यह मार्च सोमवार को पहले से तय योजना के मुताबिक़ ही होगा। सिर्फ़ इसलिए कि सोनम को ज़बरदस्ती अस्पताल में बंद कर दिया गया है, इसका मतलब यह नहीं कि छात्रों के इस आंदोलन को दबाया या रोका जा सकता है।”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: विपक्ष ने सरकार को घेरा
इस घटनाक्रम के बाद देश के तमाम विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया और मीडिया बयानों के जरिए मोदी सरकार पर तीखे हमले किए हैं।
अरविंद केजरीवाल (पूर्व मुख्यमंत्री, दिल्ली):
“मोदी सरकार पूरी तरह अहंकार में डूबी हुई है। सोनम वांगचुक जी पिछले 21 दिनों से छात्रों के हक के लिए शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे हैं। एक लोकतांत्रिक सरकार का काम उनसे बातचीत करना होना चाहिए था, लेकिन बात करने के बजाय उन्हें जबरन उठा लिया गया। इतना अहंकार ठीक नहीं है, जनता सब देख रही है।”
अखिलेश यादव (अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी):
“सोनम वांगचुक जी को बल-प्रयोग करके, ज़बरदस्ती आमरण अनशन स्थल से उठाकर ले जाना अत्यंत निंदनीय और शर्मनाक समाचार है। बीजेपी सरकार अब पूरी तरह से तानाशाही पर उतर आई है।”
डिंपल यादव (सांसद, समाजवादी पार्टी):
“सोनम वांगचुक जी को जबरन धरनास्थल से हटाना सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारे लोकतंत्र और संविधान को कुचलना है। बीजेपी सरकार को अब देश में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है। यह पूरी तरह तानाशाही का रूप है।”
संजय राउत (सांसद, शिवसेना UBT):
“सोनम वांगचुक ने 20 दिनों से ज़्यादा समय तक भूख हड़ताल की क्योंकि देश भर के लाखों छात्रों का भविष्य अंधकार में डूब गया है और इस तनाव में 20 युवाओं ने आत्महत्या कर ली। सरकार 20 दिन तक कुंभकर्णी नींद सोई रही। जब उनके ऑर्गन फेल होने की कगार पर आ गए, तब पुलिस भेज दी। अगर सरकार को उनकी जान की इतनी ही चिंता थी, तो प्रधानमंत्री या शिक्षा मंत्री उनसे बात करने क्यों नहीं आए? यह कार्रवाई तानाशाही के अंत की शुरुआत है।”
संजय सिंह (सांसद, आम आदमी पार्टी):
“ये क्या गुंडागर्दी चल रही है? मोदी जी, ये सत्ता का अहंकार लंबे समय तक नहीं चलता। जिस युवा और आंदोलनकारी पर आप लट्ठ चला रहे हो, यही एक दिन आपका तख़्त उखाड़ेगा। सोनम वांगचुक की मांगें सुनने के बजाय उन्हें जबरन गिरफ़्तार करके हॉस्पिटल में डाल दिया गया, इसकी जितनी निंदा की जाए कम है।”
चंद्रशेखर आजाद (प्रमुख, भीम आर्मी/आजाद समाज पार्टी):
“सोनम वांगचुक जी के साथ जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसने लोकतंत्र को एक बार फिर शर्मसार कर दिया है। शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाना इस देश में अपराध बना दिया गया है।”
पवन खेड़ा (कांग्रेस नेता):
“यह देश के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है। जब कोई नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ बैठता है, तो यह सरकार संवाद करने के बजाय पुलिस का इस्तेमाल करती है।”
जंतर-मंतर पर तनाव अभी भी बरकरार है और सभी की नजरें अब 20 जुलाई को होने वाले ‘संसद चलो’ मार्च पर टिकी हैं।

