पेपर लीक की आड़ में डिजिटल शिक्षा पर अंजना का ‘दो कौड़ी’ तंज
दो कौड़ी कहने वाली जुबान और करोड़ों भाग्य बदलने वाले हाथ
अंजना की टिप्पणी या शिक्षा पर चोट? यूट्यूब टीचर्स क्यों बने मुद्दा

शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)
भारतीय शिक्षा जगत में यह शायद ही पहले कभी देखने को मिला हो कि एक टीवी स्टूडियो में कही गई टिप्पणी इतनी तेज़ी से राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाए। लेकिन जब वरिष्ठ एंकर अंजना ओम कश्यप ने नीट पेपर लीक पर चर्चा के दौरान
यूट्यूब शिक्षकों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “एक्सप्लेनर बनाते हैं, जानते कुछ नहीं” और उन्हें “दो कौड़ी के यूट्यूब गुरु” तक कह दिया, तो यह सिर्फ एक टीवी बहस नहीं रही। यह बयान देखते ही देखते “ब्लैकबोर्ड पर ब्रेकिंग न्यूज़” बन गया। वास्तव में, यह डिजिटल शिक्षा की बढ़ती ताकत के सामने मुख्यधारा मीडिया की असहजता को उजागर करता है। अंजना का यह हमला तथ्यों से अधिक पूर्वाग्रह का प्रतीक प्रतीत होता है।
जब लाखों छात्रों का भरोसा किसी मंच से जुड़ जाए, तो उस पर उठी उंगली केवल व्यक्तियों पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर सवाल बन जाती है। अंजना ओम कश्यप की इस टिप्पणी को खान सर, अभिनय शर्मा जैसे लोकप्रिय यूट्यूब शिक्षकों पर भी लागू माना गया। उन्होंने कुछ डिजिटल शिक्षकों को ‘बड़ा फ्रॉड’ तक कह दिया।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब लाखों छात्र ऑनलाइन शिक्षा के सहारे अपने सपने संवार रहे हैं। इसलिए इसे केवल कुछ शिक्षकों पर नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल शिक्षा जगत की साख पर प्रहार माना गया। सवाल है, क्या यह आलोचना तथ्यों पर आधारित है या महज़ सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश? क्या कुछ अपवादों के आधार पर पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करना उचित है?
शोर और आरोपों से परे, किसी भी व्यवस्था का मूल्यांकन उसके परिणामों से होता है। पिछले एक दशक में यूट्यूब आधारित शिक्षा ने लाखों छात्रों तक ज्ञान पहुँचाया, जिनकी पहुँच महंगी कोचिंग तक नहीं थी। खान सर और अभिनय शर्मा जैसे शिक्षकों ने दूर-दराज़ क्षेत्रों के युवाओं को अवसर, मार्गदर्शन और आत्मविश्वास दिया।
इनके पक्ष में सबसे बड़ा प्रमाण लाखों सफल छात्र हैं। यदि ये “कुछ नहीं जानते”, तो यह सफलता कैसे संभव हुई? हालाँकि कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन उनसे पूरे योगदान को नकारा नहीं जा सकता। अंजना जी, यह आरोप केवल शिक्षकों पर नहीं, उनके समर्पण और मेहनत पर भी सवाल उठाता है।
जब दुनिया थम-सी गई थी और शिक्षा के पारंपरिक रास्ते बंद हो गए थे, तब डिजिटल मंचों ने सीखने की लौ बुझने नहीं दी। कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षक लाखों विद्यार्थियों के लिए सहारा बने। स्कूलों और कक्षाओं के बंद रहने पर मोबाइल और इंटरनेट के जरिए शिक्षा घर-घर पहुँची। जहाँ कई कोचिंग संस्थानों की फीस लाखों रुपये तक है, वहीं अनेक यूट्यूब शिक्षक मुफ्त या कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते रहे।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने शिक्षा को सीमित दायरों से निकालकर आम लोगों तक पहुँचाया है। ऐसे योगदान को अनदेखा कर पूरे समुदाय को फ्रॉड बताना न केवल अनुचित, बल्कि एकतरफा दृष्टिकोण भी है। हालाँकि कुछ चैनलों में क्लिकबेट, भ्रामक थंबनेल और पेड कोर्स की आक्रामक मार्केटिंग जैसी समस्याएँ भी मौजूद हैं।
विवाद के बीच शिक्षकों की प्रतिक्रिया ने अंजना के आरोपों पर नए सवाल खड़े कर दिए। अभिनय सर और खान सर जैसे शिक्षकों ने कहा कि उनका काम छात्रों का भविष्य संवारना है, न कि सनसनी फैलाना। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई उन्हें ज्ञानहीन सिद्ध कर दे, तो वे सीखने को तैयार हैं, लेकिन निराधार आरोप स्वीकार्य नहीं हैं।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर छात्रों ने भी खुलकर उनका समर्थन किया। हजारों प्रतिक्रियाओं में छात्रों ने बताया कि इन शिक्षकों ने शिक्षा को महंगे दायरों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया है। ऐसे में “दो कौड़ी” जैसी टिप्पणी केवल शिक्षकों पर नहीं, बल्कि उन लाखों छात्रों और परिवारों के विश्वास पर भी चोट करती है, जो उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हैं।
इस प्रकरण ने मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं। जब यूट्यूब शिक्षक नीट लीक, सीबीएसई विवादों और शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर आवाज उठाते हैं, तो उन्हें फ्रॉड कहकर खारिज कर दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या टीवी एंकर हर विषय के अंतिम विशेषज्ञ हैं?
यदि डिजिटल मंचों की विश्वसनीयता पर संदेह किया जाता है, तो टीआरपी-केंद्रित बहसों की निष्पक्षता भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। अंजना ओम कश्यप का बयान इसी विरोधाभास को उजागर करता है। एक ओर डिजिटल शिक्षक शिक्षा की पहुंच बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके योगदान पर संदेह जताया जा रहा है।
डिजिटल शिक्षा जगत भी कमियों से पूरी तरह अछूता नहीं है। कुछ यूट्यूब चैनलों पर क्लिकबेट और भ्रामक जानकारी की समस्या मौजूद है, जिसकी आलोचना और जवाबदेही आवश्यक है। कुछ टीचर्स पर पेपर लीक या गलत मार्गदर्शन के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन कुछ उदाहरणों के आधार पर पूरे समुदाय को “फ्रॉड” या “दो कौड़ी का” कहना उचित नहीं।
शिक्षा में गुणवत्ता जरूरी है, पर उसके नाम पर पूरे आंदोलन को अपमानित नहीं किया जा सकता। किसी भी व्यवस्था का मूल्यांकन तथ्यों और परिणामों से होना चाहिए, न कि अपमानजनक टिप्पणियों से। अंजना का बयान इसी अतिसामान्यीकरण की मिसाल प्रतीत होता है।
वस्तुतः, इस पूरे विवाद का केंद्र कोई एंकर या शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षा का बदलता परिदृश्य है। आज करोड़ों छात्र सीमित संसाधनों के बीच डिजिटल मंचों के सहारे अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। ऐसे में मुख्यधारा मीडिया और डिजिटल शिक्षा जगत, दोनों से संतुलन, जवाबदेही और संवाद की अपेक्षा है। किसी शिक्षक का मूल्यांकन आरोपों या उपहास से नहीं,
बल्कि उसके विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होना चाहिए। “दो कौड़ी के गुरु” जैसी टिप्पणी केवल शिक्षकों पर नहीं, बल्कि उन करोड़ों छात्रों के विश्वास और आकांक्षाओं पर भी आघात है; ऐसे में संबंधित टिप्पणी पर पुनर्विचार और खेद की अपेक्षा स्वाभाविक है। शिक्षा राष्ट्र की नींव है; इसलिए इस पर विमर्श पूर्वाग्रह नहीं, तथ्यों और सम्मान के आधार पर होना चाहिए।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र) ईमेल: rtirkjain@gmail.com


