बांग्लादेश की प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन के विचारों और उनके जीवन संघर्ष पर एक नजर।
लेखक —अरविन्द रावल
गोपाल कॉलोनी, झाबुआ (म.प्र.) की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार,
सच बोलने का साहस अक्सर सबसे महंगा पड़ता है और बांग्लादेश की प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वर्ष 1993 में प्रकाशित उनकी बहुचर्चित पुस्तक “लज्जा” ने धार्मिक कट्टरता, सामाजिक असहिष्णुता और विशेष रूप से मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति पर गंभीर बहस छेड़ दी थी।
इसके बाद उन्हें ईशनिंदा के आरोपों, धमकियों और फतवों का सामना करना पड़ा तथा 1994 में अपना देश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। तीन दशक बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उनके प्रत्येक वक्तव्य पर आज भी तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं।
हाल ही में 19 वर्षों बाद कोलकाता पहुंचीं तसलीमा नसरीन ने प्रसिद्ध रवींद्र सदन में आयोजित एक कट्टरता विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षा के स्थान पर रोजगारोन्मुख और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उनके इस बयान का कुछ संगठनों ने कड़ा विरोध किया, जबकि अनेक बुद्धिजीवियों ने इसे विचार विमर्श का विषय बताया। लोकतंत्र में किसी विचार से असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति का उत्तर धमकी, भय या हिंसा नहीं हो सकता।
पेशे से कभी चिकित्सक रहीं तसलीमा नसरीन अपने खुले विचारों और समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध मुखर लेखन के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से इस्लाम में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव, धार्मिक कट्टरता तथा धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करने वाले मुल्ला-मौलवियों की आलोचना की है।
मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों की वकालत करने के कारण वे न केवल बांग्लादेश बल्कि पाकिस्तान सहित कई देशों के कट्टरपंथी संगठनों के निशाने पर रहीं। लेखन के प्रति अपने समर्पण के कारण उन्होंने चिकित्सकीय पेशा छोड़कर साहित्य और समाज सेवा को अपना जीवन बना लिया।
उनकी अधिकांश रचनाएँ सामाजिक यथार्थ, मानवीय पीड़ा और कुरीतियों पर आधारित हैं। तसलीमा नसरीन के पास स्वीडन की नागरिकता भी है, किंतु वे कई सालो से केंद्र भारत सरकार की विशेष अनुमति के आधार पर भारत में निवास कर रही हैं।
वर्ष 2007 में उनकी पुस्तक “द्विखंडित” को लेकर भी विवाद हुआ। पुस्तक में महिलाओं और बच्चियों के साथ होने वाले यौन शोषण तथा धार्मिक कट्टरता पर की गई टिप्पणियों के कारण कोलकाता में विरोध प्रदर्शन हुए और तत्कालीन राज्य सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया।
सुरक्षा कारणों से उन्हें लंबे समय तक नई दिल्ली में कड़ी सुरक्षा के बीच रहना पड़ा। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।
यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, किंतु किसी लेखक या विचारक के मत का उत्तर तर्क और संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि कट्टरता और उग्र विरोध से। इतिहास साक्षी है कि जब जब विचारों को दबाने का प्रयास हुआ है, तब तब समाज का बौद्धिक विकास बाधित हुआ है।
यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी धर्म, समुदाय या शिक्षा व्यवस्था की आलोचना तथ्यों, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ होनी चाहिए। यदि किसी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है तो उस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
सुधार का मार्ग संवाद से निकलता है, टकराव से नहीं। किसी भी समुदाय के अधिकांश लोग शांति, शिक्षा और प्रगति के पक्षधर होते हैं; इसलिए कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं के आधार पर पूरे समुदाय का आकलन उचित नहीं माना जा सकता।
तसलीमा नसरीन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक लेखक की कलम सत्ता, कट्टरता और सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दे सकती है। उन्होंने महिलाओं की समानता, शिक्षा और स्वतंत्रता के पक्ष में लगातार आवाज़ उठाई है।
उनके विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का अधिकार लोकतांत्रिक मूल्यों का अभिन्न अंग है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में कट्टरता के स्थान पर सहिष्णुता, संवाद और विवेक को बढ़ावा दिया जाए।
विचारों का मुकाबला विचारों से ही होना चाहिए। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी असहमति को सुनने और उसका उत्तर तर्क से देने की क्षमता से होती है।
यदि हम वास्तव में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के प्रयासों का सम्मान करना होगा। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही एक सभ्य समाज की सबसे बड़ी शक्ति भी।

