मुख्य न्यायाधीश के लिए एक खुला खत

मुख्य न्यायाधीश जी, आप किसी और देश, किसी और समय, किसी और ग्रह के वासी तो नहीं हैं? लगता तो कुछ ऐसा ही है। फिर मुझे अभी तक यह भ्रम क्यों था कि आप भारतीय हैं और हमारे इस समय में रह रहे हैं। अगर यह मेरा भ्रम हो, तो आप इसे कृपया दूर कीजिए। भारत के इस सामान्य नागरिक को — जिसे पता नहीं कि वह भारतीय नागरिक माना जाता है या नहीं — उसे माफ भी कर दीजिए!
मैं उस दिन कुछ अधिक ही भ्रम में पड़ गया था, जब आपने दिल्ली पुलिस और अन्य अर्द्धसैनिक बलों द्वारा 21 जुलाई को छात्रों पर किए गए बर्बर लाठीचार्ज के वीडियो देखने से साफ इंकार कर दिया था कि हमारे पास फालतू समय नहीं है। हमारा वक्त बर्बाद मत कीजिए।
क्षमा कीजिए माई लॉर्ड, आपका समय तो आज ही है और आज ही उसे ‘बर्बाद’ या आबाद करने की छूट आपको है। कल तो समय आपको और हमें भी छोड़कर बहुत दूर चला जाएगा।पीछे मुड़कर भी नहीं देखेगा।
आप आज जहां हैं, कल वहां नहीं होंगे। उसके बाद आपके पास समय ही समय होगा, इतना अधिक समय होगा कि खर्च करते-करते भी आप ऊब जाएंगे। जितना ज्यादा उसे खर्च करेंगे, उससे ज्यादा आपके सामने वह मुंह बाए खड़ा होगा और आपसे कोंच-कोंच कर कहेगा कि मुझे खर्च करो! आप बैठे-बैठे, खाते-खाते, सोते-सोते, टीवी देखते-देखते, देश-विदेश की यात्राएं करते-करते थक जाएंगे,
मगर वक्त खत्म नहीं होगा। यही नहीं, लोदी गार्डन में कभी आप टहलते पाये गए, तो थोड़े ही दिनों में वक्त इतना आगे बढ़ चुका होगा कि कोई पहचान कर भी आपको नहीं पहचानेगा। कोई दिमाग पर थोड़ा जोर डालेगा कि इन्हें कहीं देखा-सा लगता है, मगर उसे याद नहीं आएगा और वह आगे बढ़ जाएगा!
आपसे पहले भी बहुत आए और आपके बाद भी बहुत आएंगे और जिनके पास भी अपने वक्त के सवालों को सुनने और देखने का वक्त नहीं था और नहीं होगा, सबकी यही दशा हुई है और होगी। दर्जनों उदाहरण तो आपके सामने हैं। कुछ महीने बाद आप भी उन्हीं उदाहरणों में एक होंगे।
प्रधानमंत्री गणेशोत्सव के समय आरती करने भी उसी के यहां जाते हैं, जो उस समय चीफ जस्टिस होता है। उसके बाद कितने ही गणेशोत्सव गुजर जाए, अगर वह अब चीफ जस्टिस नहीं है, तो वह कितनी ही बार कितनी ही तरह से बुलाए, प्रधानमंत्री जवाब तक नहीं देते! उन्हें गणेश जी से नहीं, चीफ जस्टिस से मतलब है।
केवल वही नहीं, बल्कि उनका कोई मंत्री-संत्री भी बैडमिंटन खेलने के लिए किसी न्यायाधीश को नहीं बुलाता। सब होशियार हैं और अपने समय का निवेश किसी लाभदायक जगह पर करते हैं। और यह बात मी लॉर्ड, हर चीफ जस्टिस के हर आराध्य पर लागू होती है। कोई अगर नरेन्द्र मोदी की मूर्ति भी घर के देवालय में रखना शुरू कर दे, तो उस पर भी यही नियम लागू होता है।
उस समय मी लॉर्ड, आपके पास कोई न्याय मांगने नहीं आएगा। तब आपके पास किसी को अन्याय देने की शक्ति भी नहीं होगी। तब कोई किसी विडियो देखने के लिए आपसे आग्रह नहीं करेगा। आप स्वयं तब एक्स या इंस्टाग्राम या फेसबुक पर रील देखते पाए जाएंगे।
हो सकता है, तब आपकी श्रीमती जी आप पर ताना कसें कि पहले तो आप अकड़ कर कहते थे कि मेरे पास वीडियो देखने का समय नहीं है, अब दिन-रात रील में ही घुसे रहते हैं। कुछ ख़याल भी है कि दोनों बेटियां, दामाद और उनके बच्चे हमारे यहां आए हैं और आपको रील देखने से फुर्सत नहीं है!
तब आपका हालचाल लेने भी शायद ही कोई आए। कोई घंटी बजाए और आप भागकर दरवाजा खोलने जाएं, तो पता चले कि अखबारवाला महीने भर के बिल का पैसा लेने आया है। धोबी प्रेस किये हुए कपड़े देने आया है। मैडम की महिला दोस्त, उनके साथ चाय पीने आई है और आप मन ही मन कुढ़ रहे हैं और अकेले बैठे अपने कमरे में चाय सुड़क रहे हैं!
तब कई ऐसे भी होंगे जो आपका फोन नहीं उठाएंगे। तब कोई कराह, कोई चीख आपका इंतज़ार नहीं करेगी। किसी युवा की टांग या हाथ तोड़ा जाएगा, किसी को पैलेट गन से घायल किया जाएगा, किसी को बेंत से करंट लगाया जाएगा या कील लगे डंडे से चोटिल किया जाएगा या किसी लड़की की गुदा में कोई पुलिस वाला डंडा घुसेड़ेगा या कपड़े फाड़ेगा, तब आप ये विडियो देखेंगे?
मी लॉर्ड, आप ये विडियो देखते तो निश्चित रूप से आपके अंदर कोई हलचल नहीं होती, मगर उन्हें दिक्कत हो जाती, जिनकी खुशी के लिए आपने ये फैसला लिया होगा। आपने उनको होने वाली तकलीफों का खयाल रखा होगा।
उनके प्रति ‘संवेदनशीलता’ दिखाई होगी, ताकि वे खुश रहें और आपकी खुशी बरकरार रहे। वक्त आने पर हो सकता है, वे आपके प्रति भी ‘संवेदनशीलता’ दिखाएं। हर भूतपूर्व को रिटायरमेंट के बाद सरकारी ‘संवेदनशीलता’ की उम्मीद रहती है।
इस ‘संवेदनशीलता’ के कई उम्मीदवार इस दुनिया से कूच कर गए और कुछ कूच करने के इंतजार में बैठे हैं और आपस में दुखड़ा रोते हैं कि हाय मेरी ‘संवेदनशीलता’ की सरकार ने कद्र तक नहीं की!
आप तो स्वयं विद्वान हैं, जैसा कि भरी अदालत में हर न्यायाधीश को कहा जाता है, अतः आपको इस तरह की बात कहने की हिम्मत उसे नहीं होनी चाहिए, जो विद्वान की पूंछ भी नहीं है।
माई लॉर्ड आपको किसी फिल्म का, किसी डाक्यूमेंट्री का वीडियो दिखाया नहीं जा रहा था। 21 जुलाई को आपके-हमारे बच्चों के बच्चे, दिल्ली पुलिस, अर्धसैनिक बलों तथा कुछ अज्ञात गुंडों के हाथों पिटे थे। उनका खून सड़क पर बहा था। उनकी हड्डियां टूटी थीं।
एक विडियो में एक सिपाही एक लड़की को नीचे गिराकर उसके कपड़े फाड़ता दिख रहा था। एक ऐसा भी वीडियो है महोदय कि एक नौजवान कह रहा है कि मैं कुछ दिनों से अनशन पर हूं और मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि आपकी मार से बचने के लिए भाग सकूं, फिर भी उसे मारा गया।
एक युवा मार खाता गया और कहता गया और मारो, मैं रोऊंगा और चीखूंगा नहीं। एक मां अपने दो बच्चों को लेकर आई और बेरहम पुलिस वालों से रो-रोकर कहने लगी, आओ और मेरे इन बच्चों को भी मार डालो जुल्मियों!
ऐसे दृश्यों के विडियो देखकर 75-80 साल की बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों के दिल भी हिल गए हैं और वे जंतर-मंतर की भीड़ में युवाओं के साथ खड़े होने आ गईं कि अब तो जब हमारे इन बच्चों को न्याय मिलेगा, तभी घर जाएंगे।
और मी लार्ड, यह सब और इससे भी कई गुना ज्यादा आपकी अदालत से करीब दो किलोमीटर दूर हो रहा था। और आप सरकार के प्रति इतने ‘संवेदनशील’ हो गए, इतने दयालु और कृपालु हो गए कि आपने कहा कि हमारे पास समय नहीं है। क्या सचमुच अपने बंगले में जाकर आपने उस दिन का कोई विडियो नहीं देखा? नहीं देखा हो, तो भी आप मी लॉर्ड हैं, कोई और ऐसा कहता, तो मैं उसे लानतें भेजता। आपसे तो कुछ कह भी नहीं सकता!
मी लॉर्ड, ये विडियो देखकर वे लोग भी अंदर से हिल गए थे, जिन्होंने 2024 में नरेंद्र मोदी की भाजपा को केवल वोट ही नहीं दिया था, उसका प्रचार भी किया था। मोदी जी को वोट देने के लिए रिश्तेदारों और मित्रों से जो लड़े थे। आप अभी देश के जजों में सर्वोच्च हैं, आप अपनी आंखें, अपना दिल कहीं रखकर भूल तो नहीं आए? चलो कहीं भूल आए हों, तो भी भारत के संविधान और कानून की किताबें पढ़कर आप यहां पहुंचे हैं, उनमें लिखी बातें भी क्या भूल गए?
ऐसा क्यों होता है मी लार्ड कि हर बार आपको अपनी पिछली बात का स्पष्टीकरण देना पड़ता है? इस बार भी आलोचनाओं के दबाव में आकर आपको अपनी बात में थोड़ा-सा संशोधन करना पड़ा है। मगर जो धब्बा लगा, वह जल्दी मिटेगा नहीं! और हां, काकरोच जनता पार्टी वाले कॉकरोच कहने के लिए आपको बार- बार धन्यवाद दे रहे हैं, वह तो पहुंच ही गया होगा।
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

