पैसे पहुंचे, बेटियां नहीं: सोनीपत में 74 वर्षीय शिवचरण गुप्ता की अंतिम विदाई ने रिश्तों और आधुनिक संवेदनाओं पर खड़े किए सवाल
सोनीपत / 6 अगस्त 2026 /रणवीर रोहिल्ला /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
कुछ घटनाएं सिर्फ खबर नहीं होतीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली कहानियां बन जाती हैं। हरियाणा के सोनीपत से सामने आया 74 वर्षीय शिवचरण रामरतन गुप्ता का मामला भी ऐसी ही एक घटना है, जिसने परिवार, रिश्तों और बुजुर्गों की बदलती स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी अपनी तीन बेटियों की परवरिश, शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए समर्पित कर दी, उसी पिता की अंतिम विदाई के समय बेटियां उनके पास मौजूद नहीं थीं। शिवचरण गुप्ता का अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने किया, जबकि बेटियों ने वीडियो कॉल के माध्यम से अंतिम यात्रा देखी।
कपड़ा कारोबारी से वृद्धाश्रम तक का सफर
सोनीपत के वेस्ट राम नगर स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले शिवचरण गुप्ता कभी कपड़ा कारोबार से जुड़े सफल व्यापारी थे। उन्होंने मेहनत और संघर्ष से परिवार को संभाला और अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाई।
उनके लिए बेटियां कभी बेटों से कम नहीं थीं। उन्होंने बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दिया। उनकी दो बेटियां शिक्षिका बनीं और अपने जीवन में आगे बढ़ीं।
लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव पर जब उन्हें परिवार और अपनों के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
बेटियों को दी गई थी पिता की गंभीर हालत की जानकारी
वृद्धाश्रम प्रबंधन के अनुसार, करीब 20 दिन पहले ही तीनों बेटियों को उनके पिता की खराब तबीयत की जानकारी दे दी गई थी। उन्हें बताया गया था कि शिवचरण गुप्ता गंभीर रूप से बीमार हैं और वह अपनी बेटियों से मिलना चाहते हैं।
लेकिन कोई भी बेटी उनसे मिलने सोनीपत नहीं पहुंच सकी।
शिवचरण गुप्ता अपनी पत्नी के साथ वृद्धाश्रम में रहने आए थे। पत्नी के निधन के बाद वह अकेले पड़ गए थे। बीमारी और बढ़ती उम्र के बीच बेटियों से बातचीत ही उनका भावनात्मक सहारा थी।
वृद्धाश्रम के अनुसार, शुरुआत में बेटियां फोन पर उनसे बातचीत करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह संपर्क भी कम होता गया।

अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचीं बेटियां
मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद शिवचरण गुप्ता का निधन हो गया। उनकी मौत की सूचना बेटियों को दी गई।
वृद्धाश्रम प्रबंधन ने कहा कि अगर बेटियां आना चाहती हैं तो अंतिम संस्कार कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन उनकी ओर से आने की कोई पुष्टि नहीं हुई।
इसके बाद वृद्धाश्रम कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर शिवचरण गुप्ता का अंतिम संस्कार कराया।
जानकारी के अनुसार, उनकी बड़ी बेटी अनिता नेपाल में रहती हैं और शिक्षिका हैं। दूसरी बेटी निशा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती हैं, जबकि तीसरी बेटी प्रिया मुंबई में रहती हैं।
तीनों बेटियां अपने-अपने परिवारों में व्यस्त थीं और पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सकीं।
5100 रुपये भेजे, वीडियो कॉल पर देखी अंतिम विदाई
अंतिम संस्कार के लिए बेटियों की ओर से 5100 रुपये भेजे गए और अनुरोध किया गया कि पिता का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और विधि-विधान से किया जाए।
बाद में अस्थियों को लेकर भी बेटियों ने आने में असमर्थता जताई और वृद्धाश्रम प्रबंधन से उन्हें गंगा में प्रवाहित करने का अनुरोध किया।
उन्होंने वीडियो कॉल के माध्यम से पिता की अंतिम विदाई देखी।
बदलते समाज की तस्वीर
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह बदलते सामाजिक ढांचे की एक तस्वीर है, जहां रिश्तों की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं।
एक समय था जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग घर की सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे। परिवार के फैसलों में उनकी भूमिका होती थी और उनका अनुभव सम्मान का विषय होता था।
लेकिन आज रोजगार, शहरों की दूरी और छोटी होती पारिवारिक संरचना ने बुजुर्गों के जीवन को प्रभावित किया है।
बुजुर्गों को सिर्फ पैसे नहीं, अपनापन चाहिए
बुजुर्गों की समस्या केवल आर्थिक सुरक्षा या रहने की जगह तक सीमित नहीं होती। उनकी सबसे बड़ी जरूरत होती है — परिवार का साथ, बातचीत और अपनापन।
कई बुजुर्ग आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले रह जाते हैं।
उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें महंगे इलाज से ज्यादा अपनों के कुछ पल और प्यार की जरूरत होती है।
शिवचरण गुप्ता की कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यही है कि उनकी अंतिम इच्छा सिर्फ इतनी थी कि वह अपनी बेटियों को आखिरी बार देख सकें, लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
इंसानियत ने निभाई परिवार की कमी
इस घटना का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। जब परिवार के सदस्य दूर थे, तब वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने इंसानियत दिखाई।
उन्होंने शिवचरण गुप्ता को सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी और वह जिम्मेदारी निभाई जो अक्सर परिवार के लोग निभाते हैं।
इसके अलावा शिवचरण गुप्ता की आंखें भी दान की गईं, जिससे उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संवेदनाएं किसी जरूरतमंद की जिंदगी में रोशनी बन सकती हैं।
समाज के सामने बड़ा सवाल
सोनीपत की यह घटना आज के समाज से एक बड़ा सवाल पूछती है — क्या आधुनिक जीवन की भागदौड़ में रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है?
तकनीक ने हमें दूर बैठे लोगों से जोड़ दिया है, लेकिन क्या वीडियो कॉल किसी अपने के हाथ पकड़ने और अंतिम समय में साथ बैठने की जगह ले सकती है?
किसी की अंतिम विदाई स्क्रीन पर देखना आसान हो सकता है, लेकिन अंतिम क्षणों में पास बैठकर विदा करना अलग एहसास होता है।
शिवचरण रामरतन गुप्ता की कहानी सिर्फ एक पिता की अधूरी इच्छा नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है कि रिश्ते केवल जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और समय से भी चलते हैं।
अगर आज हम अपने बुजुर्गों का हाथ छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी यही सवाल हमारे सामने खड़ा कर सकती हैं।

