किराए का बॉयफ्रेंड : रिश्तों का ‘ईएमआई प्लान!
एक समय था जब लोग कहते थे,”रिश्ते ऊपर वाला बनाता है।” अब लगता है ऊपर वाला सिर्फ इंटरनेट देता है, बाकी रिश्ते ऐप और वेबसाइटें बना देती हैं। पहले किराए पर मकान मिलता था, फिर कार, फिर फर्नीचर, फिर पालतू जानवर, और अब तो जनाब… बॉयफ्रेंड भी किराए पर मिलने लगे हैं।
दोस्तों की महफिल में जो लड़का वर्षों से यह डायलॉग मारता था,”भाई, बॉयफ्रेंड क्या किराए पर मिलता है?”उसे शायद पता नहीं था कि बाजार उसकी भावनाओं को इतनी गंभीरता से ले लेगा। अब तो जवाब भी तैयार है,”हाँ भाई, मिलता है… और घंटे के हिसाब से मिलता है!”
बाजार बड़ा लोकतांत्रिक है। उसे आपकी भावनाओं से नहीं, आपकी जेब से प्रेम होता है। जिस दिन उसे लगा कि अकेलापन भी बिक सकता है, उसी दिन उसने दोस्ती, साथ, मुस्कान और अपनापन सबका प्राइस टैग लगा दिया। अब प्यार की दुकान पर बोर्ड टंगा है,”ऑफर सीमित समय के लिए… दो घंटे का बॉयफ्रेंड बुक करें, तीस मिनट की मुस्कान बिल्कुल मुफ्त!”
पहले मां कहती थी,”बेटा, अच्छे संस्कार वाला लड़का ढूंढ़ना।” अब शायद कहना पड़े,”बेटी, रेटिंग पाँच स्टार वाला लड़का बुक करना।” रिश्ते अब परिवार नहीं, बल्कि “यूजर रिव्यू” से तय होंगे। अगर बॉयफ्रेंड समय पर आ गया तो पाँच स्टार, देर से आया तो तीन स्टार, और अगर शॉपिंग के दौरान थक गया तो एक स्टार।
कल्पना कीजिए, भविष्य का दृश्य कैसा होगा। शादी में बुआ पूछेंगी,”बेटी, लड़का क्या करता है?” जवाब मिलेगा,”बुआ, अभी तो शाम छह बजे तक मेरा रेंटल बॉयफ्रेंड है, उसके बाद किसी और का हो जाएगा।”
और प्रेम? वह कोने में बैठा सिर पकड़कर रो रहा होगा। उसे समझ ही नहीं आएगा कि उसकी जगह किसने ले ली। वह तो त्याग, विश्वास और समर्पण के सहारे जीता था। यहाँ तो प्रति घंटा शुल्क देकर “इमोशनल पैकेज” खरीदा जा रहा है। अब दिल टूटेगा नहीं, बल्कि “बुकिंग समाप्त” का नोटिफिकेशन आएगा।
बाजार की चतुराई देखिए। उसने अकेलेपन को बीमारी घोषित कर दिया और साथ को दवा बना दिया। फर्क सिर्फ इतना है कि दवा मेडिकल स्टोर से नहीं, ऐप स्टोर से मिल रही है। अब इंसान का अकेलापन भी “सब्सक्रिप्शन मॉडल” पर चलने लगा है। मासिक प्लान, प्रीमियम प्लान और शायद जल्द ही “अनलिमिटेड इमोशनल सपोर्ट प्लान” भी आ जाए।
मुझे डर इस बात का नहीं कि लोग किराए का बॉयफ्रेंड रखेंगे। डर इस बात का है कि कहीं कल को किराए की मां, किराए का पिता, किराए का बेटा और किराए का दोस्त भी न मिलने लगे। तब परिवार नहीं, पूरा समाज “रेंट ए रिलेशनशिप” प्राइवेट लिमिटेड बन जाएगा।
राजनेता भी पीछे क्यों रहें? चुनाव के समय घोषणा होगी,”हर बेरोजगार युवक को सरकार की ओर से एक महीने के लिए किराए का बॉयफ्रेंड बनने का अवसर मिलेगा। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और अकेलापन भी घटेगा।” विपक्ष तुरंत आरोप लगाएगा कि सरकार ने भावनाओं का निजीकरण कर दिया है।
कॉर्पोरेट कंपनियाँ भी कम नहीं हैं। वे शायद नया पैकेज निकाल दें,”कर्मचारियों का तनाव कम करने के लिए प्रत्येक कर्मचारी को महीने में दो घंटे का रेंटल कंपैनियन।” एचआर विभाग इसे कर्मचारी कल्याण योजना बताएगा और कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट में लिखेगा,”हमने इस वर्ष कर्मचारियों की मुस्कान में 27 प्रतिशत वृद्धि की।”
सोशल मीडिया पर तो अलग ही तमाशा होगा। लोग पोस्ट डालेंगे,”आज मेरे बॉयफ्रेंड ने मुझे कॉफी पिलाई।” नीचे छोटा-सा डिस्क्लेमर होगा,”यह सेवा प्रति घंटा शुल्क के आधार पर उपलब्ध कराई गई थी।”
सवाल यह नहीं कि यह सेवा सही है या गलत। सवाल यह है कि हम ऐसे दौर में पहुँच गए हैं जहाँ भावनाएँ भी बाजार की वस्तु बनती जा रही हैं। जिस अपनत्व को कभी दिल से महसूस किया जाता था, उसे अब समय और पैसों में मापा जा रहा है। रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे डिजिटल रसीदों में बदल रही है।
कहते हैं कि पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है। अब लगता है कि वह मुस्कान, साथ, बातचीत और तस्वीरों में दिखने वाला प्रेम भी खरीद सकता है। बस एक चीज़ नहीं खरीद सकता,सच्चा अपनापन। क्योंकि जो रिश्ता घड़ी की सुई के साथ शुरू होकर भुगतान के साथ खत्म हो जाए, वह साथ तो हो सकता है, लेकिन प्रेम नहीं।
इसलिए अगली बार जब कोई पूछे,”बॉयफ्रेंड क्या किराए पर मिलता है?”तो मुस्कुरा दीजिए। क्योंकि बाजार ने उस मजाक को सच तो कर दिया है, लेकिन एक सवाल भी छोड़ दिया है,क्या हम आधुनिक हो रहे हैं, या सिर्फ इतने अकेले कि अब भावनाएँ भी किराए पर लेने लगे हैं?
यही इस दौर की सबसे बड़ी विडम्बना है कि इंसान चाँद पर पहुँच गया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना ली, हर सुविधा घर तक पहुँचा दी… लेकिन अपने ही घरों, परिवारों और रिश्तों में इतना अकेला हो गया कि अब उसे इंसान भी किराए पर चाहिए!-

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