3.50 करोड़ का अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल आज जंग खा रहा: कोरोना काल में मिला था तोहफा, अब रखरखाव और देखरेख के अभाव में हो रहा है बदहाल
कैथल /22 जुलाई 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
कोरोना काल में मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होने वाले करोड़ों रुपये के पोर्टेबल अस्पताल की सुध लेने वाला कोई नहीं है। जिला नागरिक अस्पताल परिसर में बना यह 100 बेड का अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल आज देखरेख के आभाव में जंग खा रहा है। प्रबंधन की लापरवाही के चलते इसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया है और अब यह सिर्फ अस्पताल की जगह की कमी को पूरा करने का जरिया बनकर रह गया है।
2021 में मिली थी सौगात, आईआईटी मद्रास ने किया था तैयार
कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान जब अस्पतालों में बेड्स की भारी किल्लत थी, तब जुलाई 2021 में कैथल को यह बड़ी सौगात मिली थी। अमेरिकन इंडियन फाउंडेशन के करीब ढाई से तीन करोड़ रुपये से अधिक के सीएसआर फंड और आईआईटी मद्रास की तकनीकी मदद से इसे सिर्फ तीन हफ्ते में तैयार किया गया था। उस समय जिला प्रशासन और तत्कालीन डीसी प्रदीप दहिया ने चेन्नई से आए इस पोर्टेबल अस्पताल का जायजा लिया था और इसे हरियाणा का पहला अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल बताया था।
1682 गज जमीन में पार्किंग स्टैंड पर बने इस अस्पताल में 10 वेंटिलेटर युक्त आईसीयू बेड और 90 सामान्य ऑक्सीजन बेड सहित बच्चों के लिए निक्कू (NICU) वार्ड तक बनाया गया था। इसकी अनुमानित उम्र करीब 15 साल आंकी गई थी, लेकिन महज 5 साल के भीतर ही यह बदहाली के आंसू रो रहा है।
अब कमरों से हटाए गए बेड, कहीं बन गया ड्रेसिंग रूम तो कहीं डंपिंग एरिया
देखरेख और मरम्मत के अभाव में इस पोर्टेबल अस्पताल की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। इसके दरवाजों के लॉक और डोर क्लोजर खराब हो चुके हैं। पेंट उखड़ने के कारण लोहे के पाइपों और ढांचे में जंग लगने लगा है। जंग और पानी की सीलन से छत भी उखड़ने लगी है, कई कमरों के एसी खराब पड़े हैं और फर्श भी टूट चुका है।
हालात यह हैं कि अस्पताल प्रबंधन ने इसके ज्यादातर कमरों से बेड ही हटा दिए हैं। अब इस बड़े ढांचे का इस्तेमाल सिर्फ जगह की कमी दूर करने के लिए किया जा रहा है। कहीं पर ऑक्सीजन सिलेंडर डंप कर दिए गए हैं, तो कहीं ब्लड सैंपल कलेक्शन सेंटर, ड्रेसिंग रूम, एनसीडी रूम, टीबी लैब, आइसोलेशन वार्ड और डेंगू वार्ड बना दिए गए हैं। इसके अलावा मंगलवार और वीरवार को काला पीलिया (हेपेटाइटिस) की ओपीडी भी यहीं चलाई जा रही है। कुछ कमरों का नियमित इस्तेमाल हो रहा है, जबकि बाकी ताले में बंद रहते हैं।
ऑक्सीजन पाइपलाइन का अधूरा काम और कागजी दावे
शुरुआती योजना के तहत इस पोर्टेबल अस्पताल को इसके पास ही लगे पीएसए (प्रेशर स्विंग एड्सॉर्प्शन) ऑक्सीजन प्लांट से अंडरग्राउंड पाइपलाइन के जरिए जोड़ना था, जो एक हजार लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन बनाने की क्षमता रखता है। लेकिन साल 2022 बीत जाने के बाद भी यह पाइपलाइन पूरी नहीं हो पाई। जुलाई 2022 में जब कोरोना के कुछ नए मामले सामने आए थे, तब भी यह बात सामने आई थी कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी पोर्टेबल अस्पताल तक सीधे ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाई है और काम अधूरा पड़ा है। हालांकि, अधिकारी सिर्फ सिलिंडर के सहारे काम चलाने की बात कहकर पल्ला झाड़ते रहे।
अधिकारियों का पक्ष
इस पूरे मामले पर कैथल की सिविल सर्जन डॉ. रेणु चावला का कहना है कि पोर्टेबल अस्पताल का इस्तेमाल पूरी क्षमता से किया जा रहा है, क्योंकि जिला अस्पताल में जगह की कमी है। उन्होंने माना कि ब्लड सैंपल कलेक्शन, ड्रेसिंग रूम, काला पीलिया ओपीडी और टीबी लैब जैसे काम यहीं चलाए जा रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि वे खुद कई बार निरीक्षण कर चुकी हैं और साफ-सफाई तथा मरम्मत के निर्देश दिए हैं ताकि लंबे समय तक इसका उपयोग किया जा सके।
करोड़ों रुपये की लागत से बना यह पोर्टेबल अस्पताल आज प्रशासनिक उदासीनता और फाइलों के फेर में फंसकर अपनी उपयोगिता खोता जा रहा है, जबकि जरूरत इस बात की थी कि आपदा प्रबंधन के इस बड़े संसाधन को हमेशा दुरुस्त रखा जाता।

