
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोमवार को जो तस्वीर बनी, वह महज एक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर नहीं थी। संसद से जंतर-मंतर तक हाथों में तख्तियां लेकर बढ़ते समाजवादी पार्टी के सांसद, पुलिस कार्रवाई से परेशान युवाओं के बीच बैठी डिंपल यादव, सरकार पर सीधे सवाल उठाती इकरा हसन और आक्रामक तेवरों में नजर आतीं प्रिया सरोज इन तीन चेहरों ने उत्तर प्रदेश की 2027 की राजनीति की एक संभावित तस्वीर जरूर सामने रख दी है।
सवाल यह नहीं है कि सोमवार के प्रदर्शन में कौन शामिल हुआ। असली सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी अब अपनी राजनीति को तीन अलग-अलग महिला चेहरों के जरिए नई सामाजिक और भौगोलिक जमीन पर उतारने की तैयारी कर रही है?सोमवार को नीट परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्र और युवा जुटे थे। संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन प्रदर्शनकारियों ने सरकार से परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और युवाओं के सवालों पर संवाद की मांग की।
इसी प्रदर्शन के समर्थन में समाजवादी पार्टी के सांसद संसद परिसर से जंतर-मंतर की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। डिंपल यादव के साथ इकरा हसन और प्रिया सरोज की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया। डिंपल यादव ने छात्रों के सवालों का समर्थन किया और कहा कि युवाओं की आवाज सुनी जानी चाहिए। प्रदर्शन से जुड़ी तस्वीरों में वह आंदोलनकारियों के बीच दिखाई दीं।
यही तस्वीरें अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में पढ़ी जा रही हैं। वजह साफ है। 2027 का विधानसभा चुनाव अब दूर की बात नहीं है। चुनाव आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में तय समय पर होने हैं। राज्य में 403 विधानसभा सीटें हैं और इस चुनाव का असर सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश का चुनाव देश की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेगा।
समाजवादी पार्टी के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव एक बड़ा राजनीतिक मोड़ था। पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 37 पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी 33 सीटों पर रह गई और कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं।
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 255 सीटें जीती थीं और समाजवादी पार्टी 111 सीटों पर रही थी। यानी 2024 के लोकसभा चुनाव ने राज्य की राजनीतिक जमीन पर विपक्ष के लिए नई संभावनाएं पैदा कर दीं। अब अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोकसभा चुनाव में बने सामाजिक गठजोड़ को 403 विधानसभा सीटों तक कैसे पहुंचाया जाए।
यहीं डिंपल यादव की भूमिका सबसे पहले सामने आती है। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव अब सिर्फ यादव परिवार की राजनीतिक विरासत से जुड़ा चेहरा नहीं रह गई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मैनपुरी सीट पर 2,21,639 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। यह जीत बताती है कि उनका व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव लगातार मजबूत हुआ है।
उनका अंदाज अखिलेश यादव की आक्रामक राजनीति से अलग है। वह तीखे भाषणों की जगह संयमित भाषा, महिला मुद्दों और संवेदनशील राजनीतिक छवि के जरिए अपनी जगह बनाती हैं।
बीजेपी की राजनीति में महिला मतदाताओं का महत्व पिछले एक दशक में लगातार बढ़ा है। उज्ज्वला, आवास, शौचालय, राशन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के जरिए बीजेपी ने महिलाओं के बीच एक मजबूत राजनीतिक आधार बनाया है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह महिला मतदाताओं तक अपनी सीधी पहुंच बनाए। डिंपल यादव इस चुनौती का जवाब बन सकती हैं।
उनके पास पार्टी का पारंपरिक आधार है, लेकिन उनकी छवि उस आधार से आगे जाने की क्षमता भी रखती है।दूसरा चेहरा इकरा हसन का है। कैराना से लोकसभा पहुंचीं इकरा हसन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अलग तरह की आवाज बनकर उभरी हैं। उनका राजनीतिक अंदाज सीधे सवाल पूछने वाला है।
पश्चिमी यूपी में किसान, युवा, शिक्षा, रोजगार और अल्पसंख्यक राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। यहां कोई भी राजनीतिक चेहरा तभी मजबूत होता है, जब वह स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय बहस से जोड़ सके। इकरा हसन के सामने यही अवसर है।उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा पहचान है। उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव उस पीढ़ी के बीच लड़ा जाएगा,
जिसके लिए सरकारी नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाएं जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा हैं। नीट विवाद, पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सवालों ने युवाओं के बीच बेचैनी पैदा की है। जंतर-मंतर का प्रदर्शन इसी असंतोष को राजनीतिक आवाज देने की कोशिश था। ऐसे मुद्दों पर इकरा हसन जैसे चेहरे सीधे युवाओं से जुड़ सकते हैं।
तीसरा चेहरा प्रिया सरोज का है। मछलीशहर से सांसद प्रिया सरोज 18वीं लोकसभा की सबसे युवा सांसदों में शामिल हैं। पीआरएस इंडिया के अनुसार उनकी उम्र 27 वर्ष है और लोकसभा में उनकी उपस्थिति 97 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह आंकड़ा उनके संसदीय कामकाज को लेकर उनकी सक्रियता दिखाता है। वह सिर्फ युवा चेहरा नहीं हैं, बल्कि पूर्वांचल के उस सामाजिक और राजनीतिक भूगोल से आती हैं, जहां जातीय प्रतिनिधित्व आज भी चुनावी समीकरणों का सबसे बड़ा आधार है।
अखिलेश यादव का पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूला 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की राजनीति का केंद्रीय संदेश बना। लेकिन कोई भी राजनीतिक फॉर्मूला केवल नारों से जमीन पर मजबूत नहीं होता। उसके लिए चेहरे चाहिए। डिंपल यादव महिला और पिछड़े वर्गों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ा सकती हैं।
इकरा हसन अल्पसंख्यक और युवा राजनीति की आवाज बन सकती हैं। प्रिया सरोज वंचित और दलित-पिछड़े सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की नई पीढ़ी का चेहरा बन सकती हैं। यही इस तिकड़ी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। यह सिर्फ तीन सांसदों का साथ नहीं है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल को जोड़ने वाली संभावित राजनीतिक रेखा है।
डिंपल के पास अनुभव और स्वीकार्यता है। इकरा के पास बेबाकी और युवा ऊर्जा है। प्रिया के पास नई पीढ़ी की राजनीतिक पहचान है। अगर सपा इन तीनों चेहरों को अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार सक्रिय करती है, तो यह प्रयोग पार्टी के लिए चुनावी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
हालांकि बीजेपी के लिए चुनौती को केवल इन तीन महिला सांसदों की लोकप्रियता से जोड़ना जल्दबाजी होगी। राजनीति में वायरल तस्वीरें वोट में तभी बदलती हैं, जब उनके पीछे संगठन खड़ा हो। 2024 में समाजवादी पार्टी की सफलता के बावजूद 2027 का विधानसभा चुनाव पूरी तरह अलग होगा। लोकसभा चुनाव में मुद्दों का प्रभाव व्यापक होता है, जबकि विधानसभा चुनाव में बूथ स्तर की मशीनरी, स्थानीय उम्मीदवार और जातीय समीकरण निर्णायक होते हैं।
सपा को यह साबित करना होगा कि डिंपल, इकरा और प्रिया की लोकप्रियता सिर्फ संसद और सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है।बीजेपी के पास भी मजबूत संगठन, सत्ता का अनुभव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चेहरा है। 2022 में बीजेपी ने 403 में से 255 विधानसभा सीटें जीती थीं।
इसलिए सपा के सामने सिर्फ सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की चुनौती नहीं है। उसे सत्ता के मजबूत संगठनात्मक ढांचे को चुनौती देनी होगी। यही कारण है कि तीनों महिला सांसदों की भूमिका केवल भाषणों या प्रदर्शनों से तय नहीं होगी। उन्हें गांव, कस्बे, विश्वविद्यालय, महिला समूह और युवा संगठनों के बीच लगातार दिखाई देना होगा।
फिर भी जंतर-मंतर की तस्वीर को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि इस तस्वीर में तीन ऐसे राजनीतिक संदेश एक साथ दिखाई दिए, जिन पर 2027 का चुनाव टिक सकता है युवा असंतोष, महिला राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक प्रतिनिधित्व। अगर इन तीनों मुद्दों को सपा लगातार जमीन पर ले जाती है, तो अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला केवल जातीय समीकरण नहीं रहेगा, बल्कि नए चेहरों और नए मुद्दों के साथ एक व्यापक राजनीतिक अभियान बन सकता है।
डिंपल यादव की संवेदनशीलता, इकरा हसन की बेबाकी और प्रिया सरोज की युवा ऊर्जा फिलहाल एक राजनीतिक संभावना है। इसे चुनावी ताकत में बदलना समाजवादी पार्टी की रणनीति पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना जरूर है कि सोमवार को जंतर-मंतर पर जो तस्वीर बनी, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है क्या 2027 में बीजेपी के सामने अखिलेश यादव का सबसे बड़ा हथियार सिर्फ पीडीए नहीं, बल्कि उसके साथ खड़ी यह नई महिला राजनीतिक तिकड़ी भी होगी?
उत्तर प्रदेश के चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं। गठबंधन बदलेंगे, उम्मीदवार बदलेंगे, मुद्दे बदलेंगे और चुनावी नारों का रंग भी बदलेगा। लेकिन राजनीति में कुछ तस्वीरें समय से पहले संकेत दे देती हैं।
जंतर-मंतर की वह तस्वीर भी शायद ऐसी ही तस्वीर है। अगर समाजवादी पार्टी ने इन तीनों चेहरों को सिर्फ संसद की सीमाओं में बंद नहीं रखा और उन्हें उत्तर प्रदेश की जमीन पर लगातार उतारा, तो डिंपल यादव, इकरा हसन और प्रिया सरोज 2027 के चुनाव में बीजेपी के लिए सिर्फ विपक्षी सांसद नहीं, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक मोर्चा बन सकती हैं, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

