जंतर-मंतर आंदोलन: शांतिपूर्ण प्रदर्शन से बवाल तक, जानें पुलिस कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट
किसी ने सच ही कहा है, अगर फुंसी का सही समय पर इलाज न किया जाए तो वह बाद में नासूर बन जाती है। धीरे-धीरे जितने लोगों के मन में सरकार के प्रति खुन्नस थी अब सब इस प्रोटेस्ट की आड़ में सामने आ रहे हैं। मोदी जी, अगर समय रहते सख्त कार्रवाई की गई होती, तो शायद आज ये हालात देखने को नहीं पड़ते।

बहुत मुमकिन है कि कल यही हरकत कोई वर्दीधारक किसी दूसरी बहन बेटी के साथ भी करे… इस लिए इसके खिलाफ आवाज़ उठाएं..
नई दिल्ली /अटल हिन्द /22 जुलाई 2026 /राजकुमार अग्रवाल
लोकतंत्र की पहली शर्त होती है—संवाद। जब नागरिक, विशेषकर देश का युवा, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो एक जिम्मेदार हुकूमत का काम होता है कि वह उनकी बात सुने। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता अब अपनी ही जनता से बातचीत करने के बजाय उसे बलपूर्वक कुचलने पर आमादा है।
तमाशा-ए-जमहूरियत: टैक्स हमारा, डंडा उनका और कठघरे में इंसानियत
शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे धरना-प्रदर्शन अचानक दंगे, मारपीट और खूनी संघर्ष में कैसे बदल जाते हैं? क्या सरकार खुद या सत्ताधारी दल के अराजक तत्व भीड़ में शामिल होकर आंदोलनों को बदनाम करने का खेल खेलते हैं? अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे अनगिनत वीडियो आज पूरे तंत्र पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं।
जंतर-मंतर से उठी आग: पुलिस की बर्बरता या राजकीय दमन?
20 जुलाई और उसके बाद जंतर-मंतर, संसद मार्ग और कनेक्टिंग रास्तों पर जो दृश्य देखने को मिले, वे किसी लोकतांत्रिक देश के नहीं, बल्कि किसी पुलिस-राज्य के प्रतीत होते हैं।

ये वही है जिसने जंतर मंतर प्रोटेस्ट में छात्रा के पीछे डंडा घुसाने की शर्मनाक हरकत की जो कमरे में कैद हो गई..
सोचो इस प्रोटेस्ट में इसके घर की बहन बेटी होती तो क्या उसके साथ यह लोग ऐसा ही बर्ताव करते..
सच तो ये है.. कि ये संघी मानसिकता के लोग हैं वर्दी की आड़ में अपने कुकर्म को बेहतर तरीके से अंजाम देते हैं..
सूत्रों के मुताबिक.. इसका नाम नवीन राठी है और यह दिल्ली पुलिस का अधिकारी है..
क्या महिला आयोग और मानव अधिकार आयोग इस घटना पर संज्ञान लेकर इस नीच अधिकारी पर कार्रवाई करेंगे..?
प्रत्यक्षदर्शियों, जमीनी पत्रकारों और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के अनुसार:
निहत्थे छात्रों पर आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल: प्रदर्शनकारी छात्रों, जिनमें बड़ी संख्या में स्कूल-कॉलेज के नौजवान शामिल थे, पर बिना किसी पूर्व चेतावनी के आंसू गैस के गोले, लाठीचार्ज और शॉक-बैटन (करंट लगाने वाले डंडे) का इस्तेमाल किया गया।
पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) का प्रयोग: लेडी हार्डिंग और एम्स (AIIMS) में भर्ती घायलों (जैसे 25 वर्षीय शेख इरशाद मंसूरी) के शरीर से निकले छर्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि दिल्ली में पहली बार नागरिकों के खिलाफ पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है। हालांकि पुलिस इसे “पूरी तरह से झूठा और भ्रम फैलाने वाला” (फेक नैरेटिव) बता रही है, लेकिन डॉक्टरों की रिपोर्ट और तस्वीरों ने दावों की पोल खोल दी है।
बिना वर्दी और बिना नेम-प्लेट के घुसे उपद्रवी: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस बल के साथ-साथ बिना वर्दी, बिना नाम की पट्टी (नेम-प्लेट) वाले लोग हाथों में कील लगी लाठियां और लोहे की छड़ें लेकर भीड़ में घुसे। आरोप है कि ये सत्ताधारी पार्टी (बीजेपी/आरएसएस) के समर्थक थे, जिन्हें छात्रों के आंदोलन को हिंसक रूप देने के लिए भेजा गया था।
महिलाओं और बेटियों पर अत्याचार: आंदोलन में शामिल नई पीढ़ी (जेन-जी) की छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, कपड़े फाड़ने, शारीरिक हमला करने और थाने के भीतर ले जाकर प्रताड़ित करने की बेहद दर्दनाक घटनाएं सामने आई हैं। राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल के आईसीयू में भर्ती गंभीर रूप से घायल साक्षी जैसी बेटियां इस बर्बरता का जीता-जागता प्रमाण हैं।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक हिंसक कैसे हो जाते हैं?
इतिहास गवाह है—चाहे 2020-21 का किसान आंदोलन हो या मौजूदा छात्र आंदोलन—जब भी जनता एकजुट होकर सरकार की नीतियों (जैसे पेपर लीक, बेरोजगारी, या शिक्षा प्रणाली में खराबी) के खिलाफ खड़ी होती है, तो सत्ता की कार्यप्रणाली (ऑपरेटिंग प्रोसीजर) एक ही पैटर्न पर काम करती है:
शांतिपूर्ण आंदोलन
नेतृत्व को अलग-थलग करना / इंटरनेट बंद करना
भीड़ में अराजक तत्वों की घुसपैठ
सरकारी दमन / बल प्रयोग
गोदी मीडिया द्वारा ‘दंगाई’ साबित करना
क) इंटरनेट और संचार ठप्प करना (ब्लैकआउट)
जंतर-मंतर के 2 किलोमीटर के दायरे में अचानक इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। जब भीड़ को अपने आयोजकों से सही जानकारी नहीं मिलती, तो भ्रम और अफरा-तफरी का माहौल बनता है।
ख) लाउडस्पीकर तोड़ना और नेतृत्व छीनना
पुलिस अधिकारियों ने लाउडस्पीकर सिस्टम को नष्ट कर दिया, जिसके जरिए वालंटियर्स भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे। जब नेतृत्व को भीड़ से अलग कर दिया जाता है, तो आक्रोशित जनता दिशाहीन हो जाती है।
ग) कारें तोड़कर और पत्थरबाजी कराकर बदनाम करना
रात के अंधेरे में जंतर-मंतर पर क्षतिग्रस्त कारें लाकर खड़ी कर दी गईं ताकि सुबह ‘चारण-वंदना’ करने वाला ‘गोदी मीडिया’ (सरकारी भोंपू मीडिया) यह दिखा सके कि “उपद्रवी छात्रों ने गाड़ियां तोड़ीं।”
. ‘गोदी मीडिया’ का चरित्र और जनता का गुस्सा
जब देश का गोदी मीडिया जमीनी हकीकत दिखाने के बजाय सत्ता के पक्ष में सफाई देने में व्यस्त रहता है, तो जनता का विश्वास मीडिया और पुलिस दोनों से उठने लगता है।
उकसाने वाली रिपोर्टिंग: गोदी मीडिया के रिपोर्टर आंदोलन स्थल पर छात्रों की समस्याओं को कवर करने नहीं, बल्कि निराश और परेशान प्रदर्शनकारियों को उकसाने जाते हैं। जैसे ही कोई युवा गुस्से में प्रतिक्रिया देता है, उसे टीवी स्क्रीन पर “देशद्रोही” या “दंगाई” घोषित कर दिया जाता है।
स्वतंत्र पत्रकारों का उदय: जब मुख्यधारा का मीडिया सच छिपाता है, तब सोशल मीडिया पर स्वतंत्र रिपोर्टर और यूट्यूबर अपनी जान जोखिम में डालकर ‘आंखों में आंखें डालकर’ सच दिखाते हैं। यही कारण है कि आज देश का युवा पारंपरिक मीडिया को पूरी तरह खारिज कर चुका है।
जब दमन का जवाब ‘कर्मा’ और ‘जनाक्रोश’ से मिलता है

ये दसवीं का स्टूडेंट 16 साल का राज अपने घर से भागकर जंतर–मंतर पहुंचा है। इसके माता–पिता/परिवार से संपर्क करने का कष्ट करें।
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20 जुलाई को जिस बेदर्दी से नौजवानों और बच्चों को पीटा गया, उसके बाद 22 जुलाई की रात जंतर-मंतर पर स्थिति पूरी तरह पलट गई। जब दमन अपनी सारी हदें पार कर देता है, तो जनता के भीतर का डर खत्म हो जाता है।
पुलिस और RAF पर पलटवार: संसद मार्ग और जंतर-मंतर पर गुस्साए युवाओं और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं। कई जगहों पर पैरामिलिट्री फोर्सेज (RAF, CRPF, BSF) को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
‘कर्मा’ का चक्र: 20 तारीख को बच्चों को पीटने वाले पुलिस अधिकारी जब 22 तारीख को खुद घिर गए और रोते हुए नजर आए, तो लोगों ने कहा कि “कर्मा लौटकर जरूर आता है।” हालांकि, लोकतंत्र में हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और प्रदर्शनकारियों को भी संयम बरतने की आवश्यकता है, लेकिन यह स्थिति सत्ता के अहंकार का ही नतीजा है।
मानवीयता और सेवा भावना का अद्भुत उदाहरण
जंतर-मंतर का माहौल सिर्फ गुस्से का ही नहीं था, बल्कि वहां इंसानियत और भाईचारे की मिसालें भी देखने को मिली:
गुरुद्वारों का धर्म: जब पुलिस के लाठीचार्ज से बचने के लिए नौजवान आसपास के मंदिरों की तरफ भागे और मंदिरों के दरवाजे बंद मिले, तब गुरुद्वारे के सेवादारों ने आगे बढ़कर अपने दरवाजे खोले, पुलिस को अंदर आने से रोका, छात्रों को खाना दिया और आश्रय दिया।
सफाई और वालंटियर्स: देर रात 3 बजे जब पुलिस दमन की योजनाएं बना रही थी, तब हजारों छात्र-छात्राएं खुद झाड़ू उठाकर जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट की सफाई कर रहे थे।
हिजाब और ज़िम्मेदारी: हर धर्म और वर्ग के लोग अपनी पहचान से ऊपर उठकर एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। ‘जुनेद’ जैसे लोग पानी के टैंकर ला रहे थे, तो छात्राएं भोजन और मुफ्त जूते-चप्पल बांट रही थीं।

“जो खुद को ठीक नहीं कर सकते वह देश को क्या ठीक करेंगे…”
मोहतरमा डर गयी और अब वह पोस्ट डिलीट कर दी है।
मोहतरमा किस लोकतंत्र मे रह रही हैं जहाँ अभिव्यक्ति से डर रही हैं?
तानाशाही का अंत हमेशा जन-जागरण से होता है
यदि सरकार को लगता है कि 10 हजार पुलिस बल, शॉक बैटन, आंसू गैस और पैलेट गन के दम पर युवाओं की आवाज दबा दी जाएगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। इतिहास गवाह है कि जब देश की ‘जेन-जी’ (नई पीढ़ी), महिलाएं, मजदूर और छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो बड़ी से बड़ी अहंकारी हुकूमतों की नींव हिल जाती है।
यह आंदोलन अब सिर्फ एक परीक्षा या पेपर लीक का मुद्दा नहीं रहा; यह लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों को बचाने की लड़ाई बन चुका है। सत्ता को अहंकार छोड़कर संवाद का रास्ता चुनना होगा, वरना इतिहास जब देश की बर्बादी की कहानी लिखेगा, तो उसमें सबसे पहला नाम दमनकारी शासन और उसकी चाटुकार मीडिया का होगा।

दिल्ली में जब छात्रों का प्रदर्शन हुआ , उसमे एक लड़की मोदी जी की फोटो लेकर प्रदर्शन में आयी , जिस पर लिखा था ” उफ उफ़ गर्मी हाय हाय गर्मी ” , इस लड़की की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, लेकिन आपने सोचा है ये कौन है जो प्रदर्शन में आयी ? इस लड़की का नाम नीरजा पुनिया है , जो मॉडलिंग करती है , मॉडलिंग की दुनिया में लोग अपने साकार करने आते है , लेकिन छात्रों के अलावा आज हर इंसान सरकार की गलत नीतियों से परेशान है , छात्रों की बात नहीं सुनी जाती , महंगाई आसामन छू रही है , डीजल , पेट्रोल गैस के दाम लगातार बढ़ रहे है , लेकिन सरकार आम आदमी की बात सुनने को तैयार नहीं है, नीरजा पुनिया कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर आयी थी, उन्होंने जंतर मंतर पर दूर दराज से आये छात्रों का दर्द सुना, उनकी पीड़ा सुनी , कैसे सरकार से जुड़े लोग उन्हें देहशतगर्द बोलते है, टुकड़े टुकड़े गैंग बोलते है , ये सब सुनने के बाद नीरजा पुनिया भी छात्रों के समर्थन में आयी , नीरजा पुनिया भले ही एक मॉडल हो लेकिन उन्होंने जस बात का घमंड नहीं किया , दिल्ली में हुए प्रदर्शन में उनके पोस्टर ने तहलका मचा दिया, छात्रों के समर्थन में वही बोल रहे है जिन्होंने अपनी जिंदगी में संघर्ष झेला , वो समझते है युवाओ की पीड़ा और इसीलिए आज ऐसे लोग युवाओ और छात्रों का सपोर्ट कर रहे है,

सोशल मीडिया पर वायरल दावे —क्या कहा गया?
आपको पता है कि देश के गृहमंत्री ने आंदोलन से निपटने के लिए एक MSF नाम की फोर्स बना रखी है ?
यह फोर्स कैसे बनी,क्या करती है, इसके रंगरूट कहाँ भर्ती होते हैं, यह क्या करते हैं, जानने के लिए समझिये की यह है क्या! MSF यानि Modi-Shah Force !
यह बिना वर्दी पहने या बहुत बार बिना नाम की वर्दी पहने गुंडे युवाओं की एक फोर्स है, जो शाह जी के एक इशारे पर अपने विरोधियों को लाठी डंडों से कुचलने निकल पड़ती है ! यह हमारी आधिकारिक पुलिस के साथ खड़ी होती है मगर काम अनाधिकारिक करती है । जो काम वर्दी अपनी संवैधानिक सीमाओं के चलते नही कर सकती,
वह यह करती है, बेधड़क और पूरी बेहयाई से करती है!
आपको याद होगा कि RSS हर साल जगह जगह युवाओं को लाठियां चलाने की हिंसक ट्रेनिंग देता है । यहीं से यह रंगरूट भर्ती होते हैं । जिन्हें लाठी चलाने और दूसरी हिंसक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है । यह युवा किस दिन केलिए तैयार होते हैं, इन्ही दिनों केलिए,जब मोदी शाह घिरे,तो यह हिंसक रूप से लड़ाई झगड़ा,दंगा दमन कर सकें ?
आप एक पूरा पैटर्न देखिए,जब जब आंदोलन होते हैं । पुलिस के साथ एक पूरी टोली होती है, जिसके हाथ मे लाठियां और हिंसक सामान होता है । जो पुलिस के साथ मिलकर यह इस्तेमाल करते हैं ।
यह भीड़ पर हमला करते हैं । हिंसा करते हैं, इनके नाम और चेहरे गायब रहते हैं ।।यह बहुत बार मुँह पर रुमाल बांधकर विरोधियों पर हमला करते हैं । यह पूरी एक भूमिगत फोर्स है, जो हर उस जगह खड़ी होती है, जहां मोदी शाह की आलोचना होती है ।
यह RSS के प्रशिक्षित लठैत हैं, वरना उनकी लाठी की ट्रेनिंग लिए लड़के और क्या करने के लिए तैयार किये जा रहे हैं? युवाओं के आंदोलन पर भी इनके हिंसक हमले की तस्वीरें,वीडियो अब आम जनता देख रही है । जबकि यह शुरू से इनका ऐसा ही इस्तेमाल कर रहे हैं ।।यही लोग शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसक बनाते हैं ।
फिर आंदोलन को बदनाम करके उसका दमन करते हैं । युवाओं केकल के आंदोलन ने इनके सबके चेहरे पूरी तरह बेनकाब कर दिए हैं! RSS के लाठी प्रशिक्षित युवाओं को अमित शाह हर जगह निजी तौर पर इस्तेमाल करते हैं ।यह इनकी गोपनीय भूमिगत MSF है ? जो बेनकाब हो गई है ।
सारा देश बिना वर्दी के लाठी लिए इन गुंडों को देख रहा था, जो पुलिस के साथ मिलकर वह कर रहे थे,जो सँविधान की प्रतिज्ञा से बंधी पुलिस नही कर पा रही थी । देश को इस प्राइवेट फोर्स से भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि यह कल आपके घरों तक आ धमकेंगे । MSF आपको बोलने नही देंगे,आपके विरोध पर वह हमला करेंगे! अब इनसे सतर्क रहिये

