कृषि मंडी में आढ़त प्रथा: किसान और ग्राहक दोनों के शोषण की पूरी कहानी

वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खेत की मिट्टी से उपज उगाने वाला किसान और रसोई घर का बजट संभालने वाला आम ग्राहक, दोनों एक ही चक्रव्यूह के दो अलग-अलग शिकार हैं। किसान दिन-रात पसीना बहाकर फसल तैयार करता है, लेकिन जब वह बाजार पहुंचता है तो उसकी जेब खाली रह जाती है।
दूसरी तरफ, जब वही ग्राहक बाजार में सब्जियां या अनाज खरीदने जाता है, तो आसमान छूती महंगाई उसकी कमर तोड़ देती है। इस पूरी व्यवस्था के बीच एक ऐसा वर्ग पनप रहा है, जो बिना किसी शारीरिक मेहनत के पूरी मंडी प्रणाली पर अपना नियंत्रण जमाए बैठा है ये हैं बिचौलिए यानी ‘आढ़ती’।
खेत से लेकर ग्राहक की थाली तक के सफर में जो मुनाफा किसान के घर पहुंचना चाहिए था और जो राहत ग्राहक को मिलनी चाहिए थी, वह सब इन आढ़तियों की तिजोरियों में बंद हो रहा है।
आज स्थिति यह बन चुकी है कि आढ़तियों के तय किए रेट पर ही किसान बेचने और ग्राहक खरीदने के लिए मजबूर हैं, और सरकार का तंत्र इस पूरे खेल में पूरी तरह मूकदर्शक बना नजर आता है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो इस शोषण की भयानक तस्वीर साफ दिखने लगती है। भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) के आंकड़े बताते हैं कि देश में एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय मात्र 10,218 रुपये के करीब है।
इस मामूली सी रकम में किसान को अपनी खाद, बीज, डीजल, मजदूरी और परिवार के भरण-पोषण का खर्च चलाना पड़ता है। इसके ठीक विपरीत, रिजर्व बैंक और विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्ट दर्शाती है कि किसान की उपज के अंतिम बाजार मूल्य (यानी जो दाम ग्राहक चुकाता है) का महज 25 से 35 प्रतिशत हिस्सा ही किसान की जेब तक पहुंच पाता है।
उदाहरण के लिए, यदि बाजार में टमाटर या प्याज 60 रुपये प्रति किलो बिक रहा है, तो खेत पर किसान को इसका मुश्किल से 12 से 15 रुपये प्रति किलो ही मिलता है। बाकी का लगभग 65 से 75 प्रतिशत हिस्सा बिचौलियों, आढ़तियों, परिवहन और मंडी के विभिन्न स्तरों पर बंट जाता है। यह आंकड़ा साबित करता है कि असली पसीना बहाने वाले को नाममात्र की मजदूरी मिल रही है, जबकि बीच की कड़ी मुनाफा कूट रही है।
आढ़तियों का यह नेटवर्क इतना मजबूत और संगठित है कि वे मंडी में प्रवेश करते ही किसान की बेबसी का फायदा उठाना शुरू कर देते हैं। कृषि उपज मंडी समितियों (एपीएमसी) का गठन मूल रूप से इसलिए किया गया था ताकि किसानों को शोषण से बचाया जा सके और उन्हें पारदर्शी तरीके से अपनी फसल का सही दाम मिले।
लेकिन समय के साथ ये मंडियां आढ़तियों के एकाधिकार का केंद्र बन गईं। आढ़ती ही यह तय करते हैं कि किसान की उपज की बोली किस दाम से शुरू होगी और किस भाव पर उसे खरीदा जाएगा।
किसान के पास न तो अपनी फसल को लंबे समय तक स्टोर करने के लिए पर्याप्त शीत गृह (कोल्ड स्टोरेज) हैं और न ही उसके पास इतना धैर्य होता है कि वह दाम बढ़ने का इंतजार करे, क्योंकि उसे अगली फसल के लिए कर्ज चुकाना होता है।
आढ़तियों को किसान की इस लाचारी का पूरा अहसास होता है। वे एकजुट होकर कृत्रिम रूप से दाम गिरा देते हैं, जिससे किसान औने-पौने दामों में अपनी उपज बेचने पर मजबूर हो जाता है।
दूसरी ओर, जब यही माल मंडी से बाहर निकलकर खुदरा बाजार की ओर बढ़ता है, तो आढ़तियों का दूसरा खेल शुरू होता है। वे बाजार में आपूर्ति को नियंत्रित करके और अपने पास माल का भंडारण करके खुदरा कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ा देते हैं।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आंकड़ों के अनुसार, खाद्य मुद्रास्फीति का सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। एक औसत भारतीय परिवार अपनी कुल आय का लगभग 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा केवल भोजन पर खर्च करता है।
जब आढ़तियों और थोक व्यापारियों के गठजोड़ के कारण सब्जियों और खाद्यान्न के दाम बढ़ते हैं, तो ग्राहक का पूरा मासिक बजट बिगड़ जाता है। ग्राहक मजबूरी में महंगे दामों पर सामान खरीदता है,
यह सोचकर कि शायद इसका फायदा किसान को मिल रहा होगा, जबकि हकीकत में किसान पहले ही अपनी फसल कौड़ियों के भाव बेचकर खाली हाथ घर लौट चुका होता है।
इस पूरी व्यवस्था में सरकार और उसके प्रशासनिक ढांचे की भूमिका सबसे ज्यादा निराशाजनक रही है। कागजों पर तो किसान हितैषी कई योजनाएं हैं, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के दावे हैं और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन धरातल पर आढ़तियों पर किसी का नियंत्रण नहीं है।
आज तक शायद ही ऐसा कोई उदाहरण देखने को मिला हो, जब किसी बड़े आढ़ती या गठजोड़ पर जमाखोरी या कीमतों में हेरफेर के लिए कोई कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की गई हो।
जब भी महंगाई बढ़ती है, तो सरकारें थोड़े समय के लिए छापेमारी का नाटक करती हैं या आयात-निर्यात नीतियों में बदलाव करके इतिश्री कर लेती हैं, लेकिन आढ़तियों के इस मजबूत ढांचे पर कोई स्थायी जांच कमेटी या सख्त दंडात्मक कार्रवाई कभी नहीं देखने को मिलती। इसका मुख्य कारण आढ़तियों का राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली होना है।
स्थानीय राजनीति से लेकर राज्य स्तर के नेताओं तक आढ़तियों का एक गहरा आर्थिक-राजनीतिक गठजोड़ काम करता है, जिसके कारण कानून के हाथ इन तक पहुंचते-पहुंचते बौने साबित हो जाते हैं।विश्व बैंक और नीति आयोग के कई अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत में कृषि विपणन में सुधार न होने का सबसे बड़ा कारण मंडी का यह बंद ढांचा है।
देश में लगभग 86 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास एक या दो हेक्टेयर से कम जमीन है। ये छोटे किसान अपनी थोड़ी सी उपज लेकर दूर के बड़े बाजारों में नहीं जा सकते, इसलिए वे अपने नजदीकी आढ़ती पर ही पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं।
आढ़ती केवल व्यापारी नहीं होते, बल्कि वे इन किसानों को खाद-बीज के लिए अनौपचारिक रूप से कर्ज भी देते हैं। इस कर्ज के जाल में फंसा किसान अपनी फसल किसी अन्य को बेचने की स्थिति में ही नहीं रहता। यह आदतों और मजबूरियों का ऐसा दुष्चक्र बन चुका है, जिससे किसान चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाता।
यदि हम वैश्विक तुलना करें तो विकसित देशों में किसान की उपज का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा सीधे किसान तक पहुंचता है, क्योंकि वहां ‘खेत से थाली तक’ का सीधा संपर्क या तो सहकारिता के माध्यम से है या फिर पारदर्शी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए।
भारत में ‘ई-नाम’ जैसी डिजिटल मंडी योजनाओं की शुरुआत जरूर की गई है, ताकि किसान देश की किसी भी मंडी में अपना माल बेच सके, लेकिन तकनीकी साक्षरता की कमी, इंटरनेट की सुस्त व्यवस्था और आढ़तियों के जमीनी दबदबे के कारण यह व्यवस्था भी अब तक आढ़तियों के तिलस्म को पूरी तरह तोड़ने में असफल रही है।
परिणामस्वरूप, किसान लगातार कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है और देश में हर साल हजारों किसान आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े आज भी कृषि क्षेत्र में बढ़ती आर्थिक विषमता और मानसिक तनाव की दर्दनाक गवाही देते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, शहर का आम ग्राहक अपनी सीमित आय में कटौती करके महंगाई का डंक सहने को विवश है। इन दोनों के आंसुओं के बीच, मंडियों के शेड के नीचे बैठा आढ़ती वर्ग बिना किसी उत्पादन जोखिम के, बिना किसी प्राकृतिक आपदा के खतरे के, हर सीजन में करोड़ों का कारोबार कर रहा है।
यह बेहद गंभीर प्रश्न है कि आखिर कब तक देश का अन्नदाता और देश का उपभोक्ता इस शोषणकारी व्यवस्था के चंगुल में फंसकर पिसते रहेंगे? जब तक आढ़तियों और बिचौलियों की इस एकाधिकारवादी व्यवस्था पर कड़ा प्रहार नहीं किया जाएगा, जब तक उनकी मनमानी कीमतों और जमाखोरी पर निष्पक्ष जांच बिठाकर कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होगा,
तब तक न तो किसान को उसकी मेहनत का वाजिब हक मिलेगा और न ही आम ग्राहक को महंगाई से राहत मिल पाएगी। सरकार को अब केवल योजनाओं के विज्ञापन बनाने से आगे बढ़कर इस बिचौलिए तंत्र पर सीधी और कठोर कार्रवाई करनी ही होगी, वरना खेत और रसोई दोनों का संतुलन पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

