क्या गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह अब मोदी सरकार के सामने फेल हो गए हैं?

एक के बाद एक पेपर लीक मामलों से पीड़ित देश भर के बेरोजगार युवाओं व छात्रों के लिए न्याय और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर पर जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक व ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की नेहा, आमीन और मनीष के अनशन व प्रदर्शन के विरुद्ध नरेंद्र मोदी सरकार के वि-संवादी रवैये को उसकी रीति-नीति के आईने में देखें, तो उसमें कहीं कुछ भी अप्रत्याशित नजर नहीं आता।
इस सरकार का अब तक का रिकॉर्ड गवाह है कि वह किसी भी असहमति या आंदोलन से संवाद में तब तक यकीन नहीं करती, जब तक पानी सिर से ऊपर न जाने लगे। तब तक अड़ियल व अहंकारी रवैया अपनाए रखकर वह स्थितियों को और जटिल बनाती रहती है। आज (सोमवार को) भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जो बातचीत हुई है, उसे इसी रूप में देखा जा सकता है।
यह वार्ता तीन बहुप्रचारित कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलित किसानों से वार्ताओं के अनेक चक्रों की याद दिलाती है, जिनसे कोई नतीजा नहीं निकला था। ऐसा इसलिए होता है कि अपने विरोध के हिंसक या अहिंसक किसी भी संस्करण को आसानी से स्वीकार न करना इस सरकार के स्वभाव में है।
मानवाधिकारों वगैरह के लिए संघर्ष करने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ कहकर प्रताड़ित करती है, तो अपनी मांगों को लेकर आंदोलित किसानों को भी बहुविध लांछित करती है। जो भी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर आ जाए, उसका लाठियों और गोलियों से सामना करा देती है। किसानों को राजधानी में प्रवेश न करने देने के लिए तो सड़कों पर किलेबंदी जैसी बाड़बंदी करा देती है।
जैसे-जैसे उसके इस रवैये की उम्र बढ़ती जा रही है, स्वाभाविक ही, यह सवाल और बड़ा होता जा रहा है कि इसके चलते कहीं देशवासियों, खासकर युवाओं, का अहिंसक संघर्षों से मोहभंग हो गया और वे मान बैठे कि ऐसे संघर्षों की बिना पर उनकी किसी भी दुर्दशा का अंत संभव नहीं है, तो क्या होगा?
इस सरकार और उसकी पार्टी को ही नहीं, दूसरे डंडे-झंडे वाली पार्टियों व सरकारों को भी इस सवाल से जरूर डरना चाहिए। इसलिए कि इतिहास में दूसरे डंडे-झंडे वालों के नाम भी ऐसे कई कारनामे दर्ज हैं।
बात को ठीक समझने चलें, तो सबसे पहले यह समझना होगा कि महात्मा गांधी अनशन को अहिंसा के पैरोकारों के ‘शस्त्रागार’ का ‘अंतिम अस्त्र’ मानते और कहते थे कि इसका इस्तेमाल तभी किया जाना चाहिए, जब सारी इंसानी चतुराइयां नाकाम होकर रह गई हों।
इतना ही नहीं, इसका तकिया किसी पक्ष की जय या पराजय पर नहीं, आत्मशुद्धि, प्रायश्चित, संयम, त्याग और सत्य की प्रतिष्ठा पर होना चाहिए। ऐसा होगा, तभी किसी अनशनकारी के उत्सर्ग में ऐसी उजास पैदा होगी, जो दूसरे पक्ष को भी आलोकित कर उसके उद्देश्यों की पवित्रता का बोध करा सके।
काबिलेगौर है कि तब इस ‘अंतिम अस्त्र’ का महात्मा के अनुयायियों से ज्यादा असरदार प्रयोग उन क्रांतिकारियों ने किया था, जो आज़ादी के लिए उनके अहिंसा के सिद्धांत में कतई विश्वास नहीं रखते थे। मिसाल के तौर पर, क्रांतिकारी यतींद्रदास (जतिनदास) लाहौर की बोस्टन जेल में लंबे अनशन के बाद 13 सितम्बर, 1929 को शहीद हो गए थे, तो मनिंद्रनाथ बनर्जी 20 जून, 1934 को फतेहगढ़ जेल में।
इनसे भी ज्यादा विचलित करने वाली शहादत 17 मई, 1933 को अंडमान जेल में क्रांतिकारी महावीर सिंह ने पाई थी। उनका अनशन तुड़वाने के सारे प्रयास विफल हो जाने पर डाॅक्टरों ने पुलिस की मदद से दूध पिलाने के लिए उनकी नाक की मार्फत नली पेट में डालनी चाही तो वह फेफड़ों में जा घुसी. नामुराद डाॅक्टरों ने मर्मान्तक वेदना के बीच उनके फेफड़ों को भी दूध से भरने से परहेज नहीं किया।
ऐसे ही अनेक अप्रतिम बलिदानों के कारण क्रांतिकारी कांग्रेसियों पर तंज करते हुए कहते थे कि क्रांतिकारियों के अनशनों का अंत कांग्रेसी अनशनों की तरह समझौतों में नहीं हुआ करता।
क्या गांधी की अहिंसा अब मोदी सरकार के सामने बेकार हो गई है?
आजादी के बाद
आज़ादी मिल गई, तो माना जाता था कि अब ऐसे मरणांतक अनशनों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और खुद बापू को भी गुलामी के दौर के अपने अनशनों के सिलसिले को आजाद देश तक ले आना पड़ा। एक बार उन्होंने तब भी अनशन किया, जब भारत सरकार बंटवारे के वक्त हुए करार के अनुसार पाकिस्तान को देय धन की अदायगी नहीं कर रही थी। तब उनकी प्राण रक्षा के लिए सरकार ने उक्त भुगतान कर दिया था।
लेकिन बाद के दशकों में कई अनशनकारी इतने सौभाग्यशाली नहीं सिद्ध हुए और उनमें से कई अपनी जानें देकर भी न सरकारों को सही राह पर ला सके, न ही अपनी मांगें बनवा सके।
राजस्थान के जयपुर में सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा को सशक्त लोकपाल और शराबबंदी के लिए बापू की जयंती से शुरू अनशन के 31वें दिन तीन नवंबर, 2015 को अपने प्राण गंवाने पड़े थे। सरकार ने इस तथ्य के बावजूद इन 31 दिनों में उनकी प्राणरक्षा के प्रति ज्यादा गंभीरता नहीं प्रदर्शित की थी, कि एक साल पहले एक अप्रैल से 15 मई तक चले उनके अनशन के वक्त उसने वादा किया था कि एक साल के भीतर उनकी मांगें पूरी कर दी जाएंगी।
यह ऐसी आपराधिक सरकारी वादाखिलाफी थी, जिसको किसी भी मानदंड से नैतिक या उचित नहीं ठहराया जा सकता था। लेकिन किसी भी स्तर पर इसकी शर्म नहीं महसूस की गई।
मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट के खिलाफ संघर्ष में मानवाधिकार कार्यकर्ता ‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला चानू को अपने सोलह साल के यानी दुनिया के सबसे लंबे अनशन का भी कोई सिला नहीं मिला। उन्हें विफल मनोरथ होकर अपना अनशन तोड़ना पड़ा।
निष्ठुर सरकारों ने, जो उस दौरान कई बार बदलीं भी, 2000 में पांच नवंबर से शुरू उनके अनशन का कभी नोटिस लिया ही नहीं। अक्टूबर, 2016 में पीपुल्स रिसर्जेंस जस्टिस एलायंस (प्रजा) नामक पार्टी बनाकर वे राजनीति में उतरीं, तो निर्मोही समाज ने भी उन्हें कोई सिला नहीं दिया।
सत्याग्रह की मौत? मोदी सरकार के सामने टिक पाएगा अहिंसक आंदोलन?
तब तक अन्ना हजारे के बहुप्रचारित और प्रायोजित अनशन का लाभ उठाती व ‘सब कुछ बदल डालने’ का ऐलान करती नरेंद्र मोदी की सरकार को देश की सत्ता संभाले दो साल हो गए थे और लगता है कि तब तक इरोम शर्मिला ने समझ लिया था कि अनशन जैसे अहिंसक संघर्षों तक के लिए आगे के दिन और बुरे सिद्ध होने वाले हैं।
हालांकि, प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी, जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, शांतिपूर्ण ढंग से अनशन कर रहे नागरिकों से ‘बुरे’ सरकारी सलूक को लोकतंत्र की हत्या व तानाशाही करार देते थे। 2011 में चार-पांच जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशनरत योग गुरु रामदेव और उनके समर्थकों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को तो उन्होंने ‘रामलीला मैदान में रावणलीला’ तक करार दिया था। इतना ही नहीं, उसे भारतीय इतिहास का ‘सबसे काला दिन’ भी बताया था और उसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराकर उसकी कड़ी निंदा की थी। यह तब था, जब बाबा रामदेव के प्रति मनमोहन सरकार का रवैया कतई वि-संवादी नहीं था। मनमोहन ने खुद पत्र लिखकर और उनके चार मंत्रियों ने बाबा से मिलकर उन्हें समझाने की कोशिश की थी।
लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके बढ़ते प्रभुत्व के बीच न सिर्फ उनकी, बल्कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारों तक ने अनशनकारियों में ‘सगे’ और ‘सौतेले’ ढूंढकर उनको अपने हिसाब से तवज्जो देना या उनके हाल पर छोड़ देना शुरू कर दिया, तो कोढ़ में खाज की स्थिति पैदा हो गई।
कारण यह कि उनके सगे वे हैं, जो निहित स्वार्थों व अपवित्र उद्देश्यों के लिए अनशनों के दुरुपयोग के रास्ते उनकी नैतिक चमक खत्म करने में भी कुछ उठा नहीं रखते और सौतेले वे सभी, जो नैतिक आधार पर उनको घेरने के लिए बापू के लिए इस अहिंसक तरीके का इस्तेमाल करते हैं।
सोनम वांगचुक से जीडी अग्रवाल तक: सत्याग्रह क्यों फेल हो रहा है?
सगे और सौतेले
इसको यों समझ सकते हैं कि 2018 में पहली अक्टूबर को अयोध्या की तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास ने भाजपा की मोदी-योगी सरकारों को ‘वहीं’ राम मंदिर निर्माण के लिए ‘मजबूर’ करने के उद्देश्य से अपनी छावनी में तथाकथित आमरण अनशन शुरू किया और मांग करने लगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या आकर आश्वस्त करें कि उन्हें राम मंदिर निर्माण के भाजपा के पुराने वादे की फिक्र है और वे उसे पूरा करने हेतु कुछ भी उठा नहीं रखेंगे, तो चूंकि वे सौतेले नहीं थे, इसलिए मोदी-योगी सरकारों ने उनको सोनम वांगचुक नहीं बनने दिया।
उनके अनशन को दो हफ्ते भी नहीं बीते थे कि योगी सरकार ने उनकी ‘बिगड़ती हालत’ की फिक्रमंद बनकर उन्हें ‘आदरपूर्वक’ लखनऊ स्थित संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती करा दिया, जहां से स्वास्थ्य लाभ के बाद वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों अपना अनशन तुड़वाकर अयोध्या लौट आए।
लेकिन उत्तराखंड में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद सरस्वती उर्फ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने 22 जून, 2018 को गंगा का अविरल बहना सुनिश्चित करने के लिए गंगा कानून बनाने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया, तो वे केंद्र की मोदी या उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार दोनों के लिए इतने सौतेले सिद्ध हुए कि 112 दिनों तक अनशन कर अपने प्राण त्याग देने को अभिशप्त हो गए।
तब इन सरकारों ने अपने रवैये से यही सिद्ध किया कि उन्हें संतों और संतवेशधारियों में भी वही ज्यादा भाते हैं, जिन्हें समय रथ के चक्र को रोक कर बैठे रहने या उलटा घुमाने की बेहिस जिदों का अभ्यास हो, न कि वे जो भविष्य की राहें हमवार करने के लिए समय के साथ या उसके आगे-आगे चलने के हामी हों। ऐसे में प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का, जो 2011 में संन्यासी बनने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद सरस्वती के नाम से जाने जाते थे, उनके सगे कैसे होते?
उनका सबसे बड़ा ‘कुसूर’ तो यह था कि उन्होंने अपनी मांग मनवाने का ऐसा गांधीवादी तरीका चुना, ये सरकारें जिसका नैतिक दबाव तभी महसूस कर सकती थी, जब उसमें कुछ नैतिकताएं शेष होतीं। शायद प्रोफेसर अग्रवाल को लगता था कि शेष होंगी, तभी उन्होंने प्रधानमंत्री को तीन-तीन पत्र लिखे और लौ लगाए रखी कि उनमें से किसी एक का उत्तर तो आएगा ही।
यकीनन, उनके इस विश्वास का आधार 2012 का उनका वह अनशन रहा होगा, जिसके बाद केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सरकार ने अनसुनी त्यागकर उत्तरकाशी में तीन जलविद्युत परियोजनाएं बंद कर दी थीं। काश, वे समझते कि तब से उस गंगा नदी में बहुत पानी बह चुका था, जिसकी अविरलता को लेकर वे बहुत चिंतित थे। वे नहीं समझ पाये, तो महात्मा गांधी के जन्म के एक सौ पचासवें वर्ष में ही उनको अनशन करते हुए आपने प्राण त्यागने पड़े।
मोदी सरकार क्यों नहीं सुनती अहिंसक आवाजों को?
कैसी शर्म!
सोचिए जरा, जिस देश में सत्याग्रह आज़ादी की लड़ाई की बुनियाद रहा हो, उसमें इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है कि जी डी अग्रवाल जैसे वैज्ञानिक सोच वाले अनशनकारी को सत्य का आग्रह करते हुए सत्ताधीशों की आपराधिक बेरुखी झेलकर दम तोड़ देना पड़े? लेकिन इस शर्म को कभी किसी भी स्तर पर महसूस नहीं किया गया।
हालांकि, सिविल इंजीनियर रहे व पर्यावरण से जुड़े तकनीकी पहलुओं के जानकार प्रोफेसर अग्रवाल ऐसा कोई आकाश कुसुम नहीं मांग रहे थे, जिसे देना सरकार के वश में हो ही नहीं। वे तार्किक आधार पर गंगा की अविरलता को उसकी शुद्धि का आधार बता रहे थे और कह रहे थे कि अरबों रुपये खर्च करके भी गंगा की सफाई तब तक सुनिश्चित नहीं की जा सकती, जब तक उसमें जन-भागीदारी नहीं हो।
वे चाहते थे कि इस भागीदारी के लिए गंगा कानून बनाया और लागू किया जाए। ऐसा नहीं किया गया, तो उन्होंने साफ कह दिया कि मैं गंगा को मरती हुई देखने से पहले अपने प्राण त्याग देना चाहता हूं और आखिरकार उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया।
112 दिनों के अनशन के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद सरस्वती उर्फ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल प्राणोत्सर्ग करके गए ही थे कि संत गोपालदास भी उन्हीं की राह पर बढ़ चले। ऋषिकेश के जिस आयुर्विज्ञान संस्थान में स्वामी सानंद ने तिल-तिल कर मौत की ओर बढ़ते हुए अंतिम सांस ली, हालत बिगड़ने के बाद उसी में भर्ती कराये गए संत गोपालदास ने उनसे कहीं ज्यादा लंबा अनशन किया और सरकारों के सौतेलेपन के बीच दिसंबर, 2018 में दून अस्पताल से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए। गौरतलब है कि इससे पहले 2011 में संत स्वामी निगमानंद और 2013 में स्वामी गोकुलानंद भी गंगा रक्षा को समर्पित अपने अनशनों की भेंट हो चुके थे।
बड़ा सवाल
सगे और सौतेले की यह स्थिति कई बड़े और बेहद असुविधाजनक सवालों को जन्म देती है। उनमें सबसे बड़ा यह कि अहिंसा व सत्याग्रह के जिन हथियारों से, अनशन भी जिनमें शामिल है, महात्मा गांधी ने देश की दमनकारी व उपनिवेशवादी गोरी सत्ता को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया था, वे अब प्रतिकूल प्रवाहों के जोर से चुनी गई और अलोकतांत्रिक होने के बावजूद खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली सरकारों के समक्ष भोथरे होकर क्यों रह गए हैं?
जवाब में जॉर्ज ऑरवेल की वह टिप्पणी याद आती है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि गांधी की अहिंसा व सत्याग्रह की जो रणनीति ब्रिटिश शासन के खिलाफ सफल रही, वही वे हिटलर या मुसोलिनी जैसे किसी टोटलिटेरियन या तानाशाह सत्ता के खिलाफ आज़माते तो रातों रात गायब कर दिए जाते।
ब्रिटिश भारत में ऐसा नहीं हुआ, तो इसलिए कि उसमें जनमत, प्रेस, न्याय व्यवस्था और नैतिक आलोचना के लिए थोड़ी-बहुत जगह मौजूद थी। ब्रिटिश सरकार दमनकारी थी, लेकिन उसे दुनिया और अपने ही समाज के सामने अपने आचरण का उत्तर भी देना पड़ता था।
इस टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों एक प्रेक्षक ने पूछा कि अंग्रेज़ों के जाने के तुरंत बाद गांधी अपने ही देश में जिस तेज़ी से अप्रासंगिक मान लिए गए, उससे क्या पता चलता है? उससे भारत जैसे समाज की नैतिकता का कौन-सा चेहरा सामने आता है? क्या नरेंद्र मोदी सरकार का नैतिक चेहरा उस नैतिकता के चेहरे से तनिक भी अलग है? अगर नहीं, तो वह हिटलर और मुसोलिनी से क्यों कर अलग हो सकता है?
(साभार : हिंदी वायर। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

