मृत्यु के बाद उपयोगी बनना है – तो देहदान करें
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कुछ महीने पहले मैंने देहदान का निर्णय लिया और मुंबई के के.ई.एम. अस्पताल जाकर उसकी औपचारिक प्रक्रिया पूरी की। समाज में मृत्यु संबंधी अंधविश्वासों, रूढ़ियों और गलतफहमियों को दूर करने के लिए, मृत्यु के बाद शरीर चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए उपयोगी हो, साथ ही विज्ञाननिष्ठ, विवेकवादी और मानवतावादी विचारों का प्रसार हो और समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण बढ़े, यही इस निर्णय के पीछे का उद्देश्य था।
मृत्यु के बाद भी समाज के काम आऊँ और दूसरों को भी देहदान और अंगदान के लिए प्रेरणा मिले, इस भावना से मैंने देहदान का निर्णय लिया। मेरी तरह बहुत से लोग देहदान करते हैं, लेकिन हाल ही में घटित सेजल पवार प्रकरण ने कुछ बेचैन करने वाले प्रश्न खड़े कर दिए।
मुंबई के प्रतिष्ठित के.ई.एम. अस्पताल की एम.बी.बी.एस. छात्रा सेजल पवार ने ‘प्रणित मोरे शो‘ नामक स्टैंड-अप कॉमेडी कार्यक्रम में, शरीरदान किए गए मृत शरीरों के बारे में – विशेषकर पुरुष मृत शरीरों के जननांगों के आकार को लेकर – अत्यंत घृणित, अश्लील और असंवेदनशील चुटकुले सुनाए। उसने और उसके सहपाठियों ने अध्ययन के दौरान मृत शरीरों के निजी अंगों का मज़ाक उड़ाने और प्रक्रिया के अंत में उन अंगों को काटकर निकालने की बात हँसते-हँसते कही।
यह वीडियो सोशल मीडिया पर पलक झपकते वायरल हो गया और चिकित्सा क्षेत्र सहित संवेदनशील सामाजिक तबकों में भारी आक्रोश की लहर दौड़ गई। उससे पहले के एक वीडियो में वह के.ई.एम. अस्पताल को ‘चिंधी‘ (चिथड़ा), साथ के लोगों को ‘कुरूप‘ और शिक्षकों को ‘विषैला‘ कहती है।
इस घटना ने चिकित्सा शिक्षा और व्यवसाय की बुनियादी नैतिकता पर ही चोट की। जिस शरीर को ‘गुरु‘ माना जाता है, जिसके प्रति कैडेवरिक ओथ (Cadaveric Oath) लेकर कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, उस शरीर का इस तरह सार्वजनिक उपहास करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि मानवता की जड़ पर प्रहार था।
डॉ. आशा कदम ने सही ही कहा है कि उनके ज़माने में डिसेक्शन हॉल में फ़ॉर्मेलिन की तेज़ गंध में भी उस शरीर के प्रति करुणा उमड़ आती थी। वे कहती हैं, “विद्यार्थियों को सीखने का अवसर मिले इसलिए किसी ने देहदान किया होगा क्या, यह सवाल उठता था। उस शरीर पर अमानवीय विचार करना तो दूर, ऐसा विचार भी कभी किसी से सुना नहीं।”
यह संस्कारों का हिस्सा है। जो समाज 370 रुपये की बिरयानी कचरे से निकालकर खाने वाले की नौकरी जाने का समर्थन करता है, वही समाज एक महिला डॉक्टर द्वारा मृत शरीरों पर की गई अश्लील टिप्पणियों को शुरू में नज़रअंदाज़ कैसे करता है?
इस दोहरेपन की ओर उन्होंने इशारा किया। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी कि उस जैसी नीच मानसिकता वाले लोगों को सबक मिलना चाहिए। और जिस शो में यह सब चला, उस शो को करने वाले प्रणित मोरे पर कार्रवाई होनी चाहिए।
इस विवाद ने ‘डार्क कॉमेडी‘ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता‘ के नाम पर होने वाले अतिरेक की भी पराकाष्ठा छू ली। केरल की डेंटिस्ट डैफ़्नी क्लेयर ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में इस मुद्दे का बेहद कड़ा विश्लेषण किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मृत शरीर के निजी अंगों पर हँसना ‘डार्क कॉमेडी‘ नहीं है। ‘डार्क कॉमेडी‘ की शुरुआत पीड़ितों द्वारा अपने दुख पर हास्य करके उससे उबरने के प्रयास से हुई थी। लेकिन जो अनुभव आपने स्वयं नहीं लिया, उस दूसरे के शरीर या अंगों का मज़ाक उड़ाकर उसे ‘डार्क कॉमेडी‘ कहने का नैतिक अधिकार किसी को नहीं है।

यह मानवीय गरिमा का हनन है। डॉ. क्लेयर ने आगे एक गहरी सामाजिक विसंगति को रेखांकित किया। वे कहती हैं, “जब सेजल का वीडियो पहली बार सामने आया, तब पुरुषों ने ही उसे फ़ॉलो किया, हँसे और प्रसिद्धि दिलवाई। उन्होंने उसके फ़ॉलोअर्स बढ़ाए। लेकिन जब 370 वाले बिरयानी वाले का मामला बाहर आया – जो एक स्त्री पर यौन अत्याचार का महिमामंडन था – तब महिलाओं ने तुरंत एकजुट होकर विरोध की आवाज़ उठाई।
इसका अर्थ है, पुरुषों का अपमान होने पर स्त्रियाँ आगे आती हैं, लेकिन स्त्रियों का अपमान होने पर (या पुरुष देहदाताओं का) पुरुष हँसते हैं और ‘फ़ॉलो‘ करते हैं, ख़ासकर अगर वह स्त्री देखने में आकर्षक हो!” इस अवलोकन के कारण यह विवाद केवल एक छात्रा के गैर-ज़िम्मेदाराना बयान तक सीमित न रहकर,
समाज की सामूहिक नैतिक बुनियाद पर प्रश्न उठाने वाला बन गया। दोनों मामले निंदनीय हैं – एक मृत्यु के बाद की क्रूरता और अनादर, तो दूसरा जीवित स्त्री के ख़िलाफ़ यौन हिंसा का उत्सवीकरण। दोनों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, लेकिन दोनों मामले एक जैसे अपराध नहीं हैं।
सेजल पवार प्रकरण ने एक और बात को रेखांकित किया – केवल चिकित्सा उपाधि प्राप्त कर लेने से मानवता, संवेदनशीलता या नैतिकता अपने आप नहीं आ जाती। जहाँ करोड़ों स्त्रियों को शिक्षा का अवसर भी नहीं मिलता, वहाँ यह अवसर पाने वाली एक छात्रा इसका इस तरह दुरुपयोग करे, यह केवल एक त्रासदी है।
सौभाग्य से, के.ई.एम. प्रशासन ने जाँच कर उसे ज़बरन छुट्टी पर भेज दिया और परामर्श की सिफ़ारिश की; उसने सार्वजनिक माफ़ी भी माँगी। परंतु, इस घटना ने चिकित्सा शिक्षा में नैतिक मूल्यों, संवाद कौशल और करुणा की शिक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने की अत्यंत आवश्यकता पैदा कर दी है।
मानव जीवन की असली कीमत और न इसका सबसे गहरा अर्थ तब समझ में आता है जब शरीरदान की अवधारणा को समझ लिया जाए। मृत्यु एक निर्विवाद, अटल सत्य है। हर किसी को किसी न किसी दिन यह भौतिक शरीर छोड़ना ही पड़ता है। मिट्टी में मिल जाना, राख हो जाना या पानी में विलीन हो जाना – इन सामान्य विकल्पों से परे जाकर, हमारा शरीर भविष्य के ज्ञान का आधार स्तंभ बन सकता है, यह चेतना ही मूलतः अचंभित करने वाली है।
शरीरदान का अर्थ है किसी व्यक्ति ने अपनी मृत्यु के बाद अपना संपूर्ण शरीर चिकित्सा शिक्षा, शल्य चिकित्सा कौशल विकास और वैज्ञानिक शोध जैसे उदात्त उद्देश्यों के लिए कानूनी रूप से दान करना।
यह केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया या कानूनी बाध्यता नहीं है; यह तो मानवता के लिए दिया गया अत्यंत मूल्यवान और निःस्वार्थ योगदान है। समाज में अकसर अंगदान के बारे में चर्चा होती है,
लेकिन शरीरदान का अनन्य साधारण महत्त्व उतना रेखांकित नहीं होता। एक व्यक्ति द्वारा किया गया शरीरदान सीधे तौर पर सैकड़ों डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने और उनके माध्यम से हज़ारों रोगियों के प्राण बचाने में कारण बनता है। यह दान मानो मृत्यु के बाद भी समाज के लिए ज्ञान, सेवा और मानवता की ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रखने की अद्भुत सामर्थ्य रखता है।
शरीरदान की अवधारणा को समझते समय सबसे पहले इसे अंगदान से अलग करना आवश्यक है। अंगदान में, किसी व्यक्ति के ‘मस्तिष्क-मृत‘ (ब्रेन-स्टेम डेड) हो जाने के बाद उसके हृदय, यकृत, गुर्दे, आँखें, त्वचा जैसे जीवनदायी अंग दूसरे ज़रूरतमंद रोगियों को प्रत्यारोपण के लिए दिए जाते हैं।
इसके विपरीत, शरीरदान में संपूर्ण शरीर चिकित्सा महाविद्यालयों, सरकारी अस्पतालों या मान्यता प्राप्त शोध संस्थानों को शरीर रचना शास्त्र (एनाटॉमी) सीखने के लिए, शल्य चिकित्सकों के अभ्यास के लिए और नई चिकित्सा तकनीक के शोध के लिए उपलब्ध कराया जाता है।

यह दान केवल एक अंग तक सीमित न रहकर, संपूर्ण शरीर भविष्य के चिकित्सा विशेषज्ञों को गढ़ने वाली पहली और सबसे महत्वपूर्ण पाठ्यपुस्तक बन जाता है। भारत जैसे विशाल देश में शरीरदान ‘एनाटॉमी एक्ट‘ और संबंधित राज्यों के विशिष्ट नियमों के अनुसार नियंत्रित किया जाता है।
महाराष्ट्र में ‘महाराष्ट्र एनाटॉमी एक्ट, 1949′ के अंतर्गत शरीरदान को पूर्ण कानूनी मान्यता है। कोई भी सज्ञान और स्वस्थ व्यक्ति अपने जीवनकाल में इच्छापत्र में दर्ज करके या संबंधित संस्था के पास अधिकृत नमूने में आवेदन करके यह संकल्प कर सकता है। कानूनी रूप से मृत्यु के बाद संबंधियों को यह इच्छा पूरी करना अनिवार्य है,
लेकिन सामाजिक संवेदनशीलता और परिवार की सहमति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए, हमारा यह निर्णय परिवारजनों को विश्वास में लेकर, उनकी भावनाओं को समझाकर, उनकी पूर्ण सहमति लेकर ही किया जाना चाहिए, यह भी उतना ही आवश्यक है।
चिकित्सा शिक्षा की नींव मानव शरीर रचना की अत्यंत बारीक और गहन समझ पर टिकी होती है। हृदय के कक्ष, फेफड़ों की वायुकोष, मांसपेशियों का संकुचन-प्रसार, रक्तवाहिनियाँ और तंत्रिकाओं का अदृश्य जाल – इन सबकी जटिल संरचना को केवल किताबों की सपाट आकृतियों, डिजिटल स्क्रीन के चित्रों या वीडियो को देखकर समझना असंभव है।
इसके लिए प्रत्यक्ष मानव शरीर पर शव-परीक्षण (डिसेक्शन) करने का अनुभव ही सच्चा शिक्षक साबित होता है। शरीरदान से मिला यह शरीर, जिसे चिकित्सकीय शब्दावली में ‘कैडेवर‘ (Cadaver) कहा जाता है, विद्यार्थियों के लिए एक त्रि-आयामी, जीवंत पाठ्यपुस्तक के समान होता है।
इसी कारण से दुनियाभर के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शरीरदाताओं को ‘पहला शिक्षक‘ (First Teacher) या ‘मूक संरक्षक‘ (Silent Mentor) जैसे अत्यंत आदरपूर्ण संबोधनों से बुलाया जाता है। यह शरीर बोलता नहीं, फिर भी अपनी ख़ामोशी में विद्यार्थियों को मानव शरीर का हर राज़ खोलकर दिखाता है।
एक नवोदित डॉक्टर जब अपने करियर की शुरुआत करता है, तो मानव शरीर से उसका पहला प्रत्यक्ष संवाद इसी दान किए गए शरीर के कारण होता है। जिन हाथों ने भविष्य में असंख्य रोगियों की जटिल सर्जरी करनी होती हैं, उन हाथों को सुरक्षित अभ्यास का पहला मंच यही शरीर उपलब्ध कराता है।
इसका मतलब है कि एक शरीरदाता के शरीर पर प्रशिक्षण लेकर तैयार हुआ एक अकेला शल्य चिकित्सक अपने पूरे जीवन में हज़ारों जानें बचा सकता है। यही तो इस दान की असीम शक्ति है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में शरीरदान की दर ज़रूरत के अनुपात में बहुत कम है। आदर्श रूप से दस विद्यार्थियों पर कम-से-कम एक शरीर उपलब्ध होना चाहिए,
जबकि वास्तव में 30 से 40 या कहीं-कहीं तो 75 विद्यार्थियों को एक शरीर पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका दुष्प्रभाव चिकित्सा शिक्षा की प्रायोगिक गुणवत्ता पर पड़ता है।
विद्यार्थियों को स्टूल पर खड़े होकर दूर से देखना पड़ता है, हाथ का अभ्यास नहीं मिल पाता और पुस्तकीय ज्ञान पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस कमी की गंभीरता को देखते हुए, समाज में शरीरदान के प्रति जन-जागृति पैदा करना अत्यंत आवश्यक है।
शरीरदान का निर्णय लेते समय परिवारजनों के मन में एक स्वाभाविक, जायज़ सवाल होता है – “मृत्यु के बाद हमारे प्रियजन के शरीर की गरिमा और सम्मान बनाए रखा जाएगा न?” यह चिंता पूर्णतः मानवीय और स्वाभाविक है।
लेकिन मान्यता प्राप्त चिकित्सा संस्थानों में इस शरीर के साथ अत्यंत आदर, पवित्रता और संवेदनशीलता के साथ व्यवहार किया जाता है। यह केवल ज़ुबानी आश्वासन का हिस्सा नहीं है, बल्कि कड़े नियमों और चिकित्सकीय आचार संहिता का सार है। शरीर प्राप्त होने से लेकर अध्ययन पूरा होने तक हर चरण पर उसकी गरिमा बनाए रखी जाती है।
संस्थान में आने पर शरीर को एक पंजीकरण क्रमांक दिया जाता है, जिससे दानकर्ता की व्यक्तिगत पहचान पूरी तरह गोपनीय रहती है। विद्यार्थियों को दानकर्ता का नाम, गाँव या परिवार की कोई जानकारी नहीं दी जाती। शरीर को सुरक्षित रखने के लिए फ़ॉर्मेलिन जैसे रसायनों (एम्बाल्मिंग) का प्रयोग कर उसे अच्छी स्थिति में रखा जाता है।
अध्ययन के अतिरिक्त किसी भी कारण से शरीर का उपयोग करने पर कानूनी रूप से सख्त मनाही है। हँसी-मज़ाक, छेड़छाड़ या गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला कोई भी काम करने वाले विद्यार्थियों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई होती है।
आजकल लगभग सभी चिकित्सा महाविद्यालयों में अध्ययन शुरू करने से पहले विद्यार्थियों से ‘कैडेवरिक ओथ‘ (Cadaveric Oath) शपथ दिलवाई जाती है। इस शपथ में विद्यार्थी देहदाता को अपना गुरु मानते हैं, उनके उदात्त त्याग के लिए दिल से कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और शरीर को केवल ज्ञान प्राप्ति का पवित्र साधन मानकर सम्मानपूर्वक व्यवहार करने का वचन देते हैं।
इसके अलावा, कई संस्थाएँ हर वर्ष शरीरदाताओं के परिवारों को आमंत्रित कर ‘कृतज्ञता समारोह‘ आयोजित करती हैं, जहाँ संचालक, प्राध्यापक और विद्यार्थी एक साथ आकर इन दानकर्ताओं के कार्य के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
शरीरदान की सामाजिक आवश्यकता और योगदान के दूरगामी पहलुओं को समझा जाना चाहिए। यह योगदान केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है। जटिल न्यूरोसर्जरी, कार्डियक सर्जरी, आर्थोपेडिक सर्जरी की नई तकनीकें पहले शरीरदान किए गए शरीरों पर प्रयोग करके ही पूर्ण की जाती हैं।
नव विकसित होने वाले चिकित्सा उपकरण – जैसे स्टेंट, पेसमेकर, कृत्रिम जोड़ – इनकी सुरक्षा जाँच मानव शरीर पर ही की जाती है। न्याय-चिकित्सा शास्त्र (फ़ॉरेंसिक मेडिसिन) के विद्यार्थियों को शरीर की सड़न प्रक्रिया, घावों की प्रकृति आदि का प्रशिक्षण भी ऐसे ही शरीरों पर होता है।
यदि किसी दुर्लभ बीमारी से मृत व्यक्ति का शरीर दान किया गया हो, तो उस रोग के स्वरूप को गहराई से समझकर इलाज ढूँढ़ने की दिशा मिलती है।
इसके अतिरिक्त, इसमें एक पर्यावरण-पूरक दृष्टिकोण भी छिपा है। एक मृत शरीर के दाह-संस्कार के लिए औसतन एक बड़ा पेड़ जलाया जाता है और धुएँ से भारी प्रदूषण होता है।
शरीरदान करने से यह पर्यावरणीय नुकसान टल जाता है। लेकिन इस सारे ज्ञान और योगदान की यात्रा में एक बड़ी बाधा है – सामाजिक अंधविश्वास और ग़लतफ़हमियाँ। “मरने के बाद शरीर अखंड रहना चाहिए, नहीं तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती”, “शरीर काटा गया तो अगले जन्म में विकलांगता आती है” – ऐसी रूढ़ धारणाएँ समाज में गहराई तक जमी हुई हैं।
लेकिन कोई भी धर्म मानव सेवा का विरोध नहीं करता; हिंदू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन सभी धर्मों में परोपकार ही सर्वोच्च धर्म माना गया है। शरीरदान तो अंतिम परोपकार का कार्य है।
इन बाधाओं पर काबू पाने के लिए स्कूलों-कॉलेजों में जन-जागृति, सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग, शिविर और सफल देहदाताओं के परिवारों के अनुभव-कथन की अत्यंत आवश्यकता है। शरीरदान ‘देहदान‘ नहीं, बल्कि यह ‘ज्ञानदान‘ है, यह भावना समाज के मन में बिठाई जानी चाहिए।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में, देहदान आंदोलन के प्रेरणादायक कार्यों और व्यक्तित्वों की ओर ध्यान खींचना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। मुंबई में ‘ज्येष्ठ स्थानिक नागरिक सेवा मंच‘ और समाजसेविका सविता घरत पिछले 15 वर्षों से बिना रुके इस आंदोलन को चला रही हैं।
सविता घरत, रश्मी परब और उनकी सहयोगी घर-घर जाकर, शिविर लगाकर, ऑनलाइन मार्गदर्शन देकर लोगों के मन से डर और बाधाएँ दूर कर रही हैं। अभी हाल ही में उन्होंने 92 वर्षीय श्री आर. के. सहगल से भेंट की। सहगल साहब, जो स्वयं अभियंता हैं और मेलबर्न विश्वविद्यालय के स्नातक हैं, वे पिछले दो वर्षों से संस्था की प्रतीक्षा में थे।
उनकी 90 वर्षीय पत्नी और वे, बच्चे विदेश में होने के बावजूद अपनी इच्छा से भारत में रहते हैं। उनके छोटे बेटे को न्यू जर्सी से विशेष रूप से बुलवाकर, सभी कानूनी पहलुओं पर चर्चा करके सविता घरत ने उनका देहदान और अंगदान का मार्ग सुगम किया। सहगल साहब का वह वाक्य दिल को छू लेता है
– “ज़िंदगी भर ईमानदारी से जीया, सब कुछ अच्छा ही रहा। लेकिन अब आखिरी वक़्त में भी मुझे समाज को कुछ देकर ही जाना है। इसमें कोई बाधा न आए इसलिए पहले से ही यह तैयारी हर किसी को कर लेनी चाहिए।”
ऐसे लोग चलते-फिरते प्रेरणास्रोत हैं। इसी तरह, 1988 से सक्रिय डोंबिवली के ‘महर्षि दधीचि देहदान मंडल‘ का कार्य भी अविस्मरणीय है। गुरुदासजी तांबे ने एक व्याख्यान से प्रभावित होकर मित्रों की सहायता से यह संस्था स्थापित की।
यह संस्था देहदान के साथ-साथ नेत्रदान, त्वचादान, रक्तदान और अंगदान का भी निःशुल्क प्रचार करती है। त्वचा दान करने पर जले हुए रोगियों पर त्वचा-रोपण किया जा सकता है; नेत्रदान से चार से छह अंध व्यक्तियों को दृष्टि मिल सकती है – इन सब जानकारियों का वे अविरल प्रसार कर रहे हैं।
इस आंदोलन की असली आत्मा समझनी हो, तो प्रत्यक्ष कार्यकर्ताओं के अनुभव सुनने होंगे। परभणी के विनोद डावरे, जिन्होंने 2015 में अपने पिताजी का देहदान किया था, बताते हैं, “मेरा एक डॉक्टर मित्र 35 साल बाद मिला और बोला, ‘तेरे पिताजी के देहदान की वजह से ही मैं आज यह डॉक्टर हूँ।
हमारी पूरी इमारत उसी शरीर पर टिकी हुई है। हम उस शरीर के साथ बातें करते हैं, एक रिश्ता बन जाता है। और सारी पढ़ाई पूरी होने के बाद बहुत ही साफ़-सुथरे ढंग से हम उनका अंतिम संस्कार करते हैं।‘” यह सुनकर उनके मन का सारा बोझ उतर गया और वे स्वयं इस क्षेत्र में सक्रिय हो गए। अब तक उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से 14 देहदान और 3 अंगदान करवाए हैं – इसमें उन्हें शून्य आर्थिक लाभ है, लेकिन सामाजिक बंधन के नाते वे यह कार्य कर रहे हैं।
वे पूछते हैं, “एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में 75 विद्यार्थी एक शरीर के चारों ओर स्टूल पर खड़े होकर शरीर रचना शास्त्र पढ़ रहे हैं। कल यही विद्यार्थी आपका इलाज करेंगे, तो इस शिक्षा की गुणवत्ता क्या होगी?”
यह सवाल हम सबको सोचने पर मजबूर करता है। इसीलिए, शरीरदान केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि समय की माँग है। स्वयं एक डॉक्टर मित्र ने एक देहदाता के परिवारजन से कहा था, “हम डॉक्टरों के लिए दुनिया में माँ-बाप के बाद सबसे सम्मानीय व्यक्ति अगर कोई है तो वह केवल यह देहदाता ही है।
हमारी पूरी चिकित्सा इमारत इस शरीर पर ही खड़ी है। हम शव-परीक्षण करते-करते लंच ब्रेक में हाथ धोकर खाना खाते हैं और तुरंत फिर उसी शरीर के साथ आत्मीयता के रिश्ते में जुड़ जाते हैं। यहाँ तक कि हम उस शरीर से बातें भी करते हैं।” चिकित्सा अध्ययन समाप्त होने के बाद उस शरीर के अवशेषों का किसी बेकार वस्तु की तरह निपटारा न करके, अत्यंत सम्मानपूर्वक, धार्मिक परंपरा के अनुसार या परिवारजनों की इच्छानुसार अंतिम संस्कार किया जाता है।
कुछ संस्थाएँ अस्थियाँ परिवारजनों को लौटा देती हैं, तो कुछ सामूहिक विसर्जन करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सम्मान एक अटल नियम है। डॉ. आशा कदम ने अपने अनुभव से बताया कि, “आज भी पोस्टमार्टम करते समय उस शरीर की पूरी देखभाल हम डॉक्टर और कर्मचारी करते हैं। मृत शरीर की गरिमा बनाए रखनी ही चाहिए –
यह अलिखित नियम सब मानते हैं।” यह सम्मान की परंपरा हज़ारों वर्षों से भारतीय संस्कृति में रची-बसी है; महर्षि दधीचि ने तीनों लोकों की शांति के लिए अपनी अस्थियाँ दान की थीं और वे सृष्टि के पहले देहदाता के रूप में जाने जाते हैं।
इस पूरी चर्चा से एक बात अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने आती है – शरीरदान का यह आंदोलन केवल मृत शरीर के उपयोग तक सीमित नहीं है। यह मानव जीवन की श्रेष्ठता, परोपकार की पराकाष्ठा और ज्ञानदान की अखंड परंपरा का मूर्त स्वरूप है। डॉ. आनंदीबाई जोशी, डॉ. द्वारकानाथ कोटणीस, डॉ. किशोर शांताबाई काले, डॉ. नीतू मांडके, डॉ. रवी बापट, डॉ. प्रकाश-मंदा आमटे, डॉ. तात्याराव लहाने जैसे न जाने कितने चिकित्सा जगत के दिग्गजों की परंपरा महाराष्ट्र ने देखी है,
जिन्होंने अपना जीवन मानव सेवा के लिए समर्पित किया। यही डॉक्टरों की सच्ची परंपरा है। गैरेज का मैकेनिक सुबह अपने औज़ारों को नमस्कार करता है, व्यापारी बही-खाते की पूजा करता है – यह अपने व्यवसाय के प्रति कृतज्ञता होती है। ऐसी ही भावना एक आदर्श डॉक्टर की अपने रोगियों के प्रति और शिक्षा का साधन बने शरीरदाता के प्रति होनी चाहिए।
‘पॉपुलर साइंस‘ में लिखने वाली ब्रूक बोरेल अपने एक लेख में लिखती हैं – विदेशों में विज्ञान, सुरक्षा और शिक्षा तथा अनुसंधान में मृत शरीरों का उपयोग किया जाता है। अनुसंधान के अनेक क्षेत्रों के लिए मृत शरीरों की ज़रूरत होती है।
उदाहरण के लिए, चोटों की बायोमैकेनिक्स का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक मानव शरीर पर कैसे चोट लगती है, यह समझना चाहते हैं। इससे वे चोटों को रोकने में मदद कर सकते हैं।
इसके लिए, वे मृत शरीर कितना आघात सह सकता है, यह समझने हेतु नियंत्रित परीक्षण करते हैं। इन परीक्षणों से प्राप्त मापों को किसी मॉडल या डमी पर लागू करने के बाद, वैज्ञानिक हमें सुरक्षित रखने वाले रक्षात्मक गियर (जैसे हेलमेट, सीट बेल्ट) का परीक्षण और पूर्णता जाँचते हैं।
वास्तविक शरीर का उपयोग कारों की सीट बेल्ट या ट्रेन की सीटों को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद कर सकता है। मस्तिष्क ऐसे हेलमेट डिज़ाइन करने में मदद कर सकता है, जिससे अमेरिकी फ़ुटबॉल खिलाड़ियों को कठोर टैकल में होने वाली मस्तिष्क की आघातजन्य चोटें कम होंगी।
इसी तरह, सैनिक को बम विस्फोट के झटके से होने वाली चोट कम करने के लिए भी इसका उपयोग हो सकता है। जब यह अनुसंधान पूरा हो जाता है, तब परिवार की इच्छा होने पर, मेरे दाह किए हुए अवशेष लिए जा सकते हैं। अन्यथा, दान दाता को अन्य दावा-रहित दाताओं के साथ किसी स्मारक पट्टिका, वृक्ष या गरिमामय वार्षिक समारोह के माध्यम से सम्मानित किया जा सकता है।
फ़ोरेंसिक वैज्ञानिक भी अपने काम में मृत शरीरों का उपयोग करते हैं। कुछ विश्वविद्यालय दान किए गए शरीरों को लेकर उन्हें ज़मीन में गाड़ देते हैं या किसी सुनसान जंगल में रख देते हैं।
फिर वैज्ञानिक समय मापते हैं कि मक्खियाँ, डर्मेस्टिड बीटल्स और अन्य सड़ांध खाने वाले कीट शरीरों को कंकाल बनाने में कितना समय लेते हैं। यह एक प्रकार का भिन्न पुनर्जन्म है – किसी खेत या जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बन जाना।
यह अंत भयावह लग सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया से मिला डेटा फ़ोरेंसिक अनुसंधानकर्ताओं को यह पहचानने में मदद करता है कि कोई व्यक्ति कब मरा और उसे किन चोटों का सामना करना पड़ा होगा। इससे कानून लागू करने वाले अधिकारियों को हत्या के मामले सुलझाने में सहायता मिलती है।
ऐसी प्रक्रिया में शरीर किसी विशिष्ट अपराध के उदाहरण के तौर पर – जंगल में लटकाया हुआ, या कार की डिक्की में भरा हुआ – जैसे दृश्यों की पुनर्रचना के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे मामला सुलझाने या किसी पुलिसकर्मी को हत्यारे को न्याय के कठघरे में लाने में मदद मिल सकती है। बाद में, कंकाल फ़ोरेंसिक संग्रह में किसी बक्से में विश्राम कर सकता है, कभी-कभार हड्डियों की उम्र बढ़ने पर अनुसंधान के रूप में जीवित रह सकता है।
लेकिन संपूर्ण शरीरदान के लिए एक और विकल्प है, जो चिकित्सा प्रशिक्षण की एक लंबी परंपरा है और मुझे अधिक उपयुक्त लगता है। हर पहले वर्ष के चिकित्सा विद्यार्थी को ‘ग्रॉस एनाटॉमी‘ नामक पाठ्यक्रम लेना होता है, जिसमें वे मानव मृत शरीर का विच्छेदन करते हैं। यह उनका पहला रोगी होता है। शायद यह उनका अब तक का देखा या छुआ पहला मृत शरीर हो।
जब वे ग्रॉस एनाटॉमी कक्ष में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें विभिन्न मृत शरीर दिखाई देते हैं – जिनमें से प्रत्येक मानव आकार की आश्चर्यजनक विविधता का उदाहरण होता है। चिकित्सा विद्यार्थी और उनके पहले मृत शरीर के बीच का संबंध विशेष होता है। मृत शरीर विद्यार्थी को वह ज्ञान देता है जो अन्यथा नहीं मिल सकता; विद्यार्थी इस उपहार के लिए विस्मित और कृतज्ञ होता है। ऐसा डॉक्टर मानते हैं।
शरीर भविष्य के डॉक्टरों को स्पाइनल टैप लगाने या अपेंडिसाइटिस को खारिज करने के लिए आवश्यक शारीरिक चिह्न सिखा सकता है। एक शल्य चिकित्सक मेरे हाथ की नाज़ुक नसों का विच्छेदन करना सीख सकता है। या, शायद, एक पैथोलॉजिस्ट मृत्यु से पूर्व और मृत्यु के बाद रक्त के थक्के के फ़र्क को महसूस कर सके।
रील्स और सोशल मीडिया के इस युग में, क्षणिक प्रसिद्धि के लिए नैतिकता की बलि देने की मानसिकता बढ़ गई है। डॉ. आशा कदम का यह डर सही है कि, “रील के चक्कर में हमारी अगली पीढ़ी कुछ ग़लत-गैर-ज़िम्मेदाराना तो नहीं बोल रही, देख तो नहीं रही, या फ़ॉलो तो नहीं कर रही, यह देखने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है।
” इस पृष्ठभूमि में, शरीरदान का संकल्प करना केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक वक्तव्य है – कि हम ज्ञान को, सेवा को और मानवता को सर्वोच्च स्थान देते हैं।
मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि शरीरदान के माध्यम से वह एक नई, अविरत सेवा और ज्ञानधारा का प्रारंभ बिंदु बनती है। लोग अपनी मृत्यु से जीवितों की मदद कर सकते हैं। उदासीनता, आलस्य, अज्ञानता और अंधविश्वास की मानसिक आहुति देकर, हम सभी को इस ज्ञानदान की पवित्र राह पर कदम रखना चाहिए। क्योंकि, हमारा शरीर मिट्टी में मिल जाने या राख हो जाने के बजाय, किसी के ज्ञान का प्रकाश बन जाए, तो उससे श्रेष्ठ कार्य दूसरा कोई नहीं हो सकता।
· कल्पना पांडे


