कथित कोकरोच आंदोलन से परीक्षा लीक समस्या का क्या समाधान मिलेगा?

BSc(Ag), LLB, PGDJMC, MJ
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
Email : varshney20saurabh@gmail.com, Mo: 9673140113
Add: C-1/9, Third Floor, Front Side, Sanjay Enclave, Uttam Nagar,
Delhi-110059
कथित कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके 6 जून को भारत आ रहे हैं? वह परीक्षा में हुई धांधलियों और पेपर लीक के मुद्दों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं?
दीपके ने देश लौटने का ऐलान करते हुए कहा है कि वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे? क्या इनके आने से वर्तमान सत्ता से उपज रहा बेरोजगारों में असंतोष क्या कोई नये आंदोलन का रूप ले लेगा ?
जैसे पिछली दो बार ऐसे ही आंदोलनों ने सत्ता को सीट से उखाड़ फेंका था। वर्तमान में सरकार भी ६ जून को लेकर विशेष सर्तकता बरत रही है। यह समय के गर्त में है कि यह आंदोलन भी अन्य की तरह मुख्य मीडिया में कितना छाया रहता है ?
किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है या धांधली की खबर सामने आती है, तब केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों मेहनती अभ्यर्थियों का विश्वास भी टूटता है।

पिछले कुछ वर्षों में अनेक भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। इससे परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं, परिणामों में देरी हुई और अभ्यर्थियों को मानसिक, आर्थिक तथा सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
कई युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन कुछ लोगों की लालच और भ्रष्ट तंत्र की वजह से उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। अब देखना होगा कि यह समस्या कब समाप्त होगी। या यह सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने का तरीका रह जाता है।
हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी नामक डिजिटल अभियान और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके को लेकर देशभर में चर्चा तेज हुई है। यह आंदोलन बेरोजगारी, युवाओं की उपेक्षा और राजनीतिक असंतोष जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द सोशल मीडिया पर तेजी से उभरा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह अभी एक औपचारिक राजनीतिक दल से अधिक एक डिजिटल और प्रतीकात्मक जन-अभियान के रूप में देखा जा रहा है।
किसी भी आंदोलन में नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी आंदोलन का प्रमुख चेहरा स्वयं लोगों के बीच उपस्थित रहता है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है, संगठनात्मक गतिविधियों में गति आती है और मीडिया का ध्यान भी अधिक आकर्षित होता है।
ऐसे में यदि कथित कोकरोच पार्टी का मुखिया भारत आता है, तो आंदोलन के समर्थकों में उत्साह बढऩा स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि केवल किसी नेता की भौतिक उपस्थिति से कोई आंदोलन स्थायी रूप से मजबूत नहीं हो जाता। आंदोलन की सफलता उसके मुद्दों, जनसमर्थन, संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता पर निर्भर करती है।
इस अभियान ने सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चा बटोरी है और युवाओं के एक वर्ग में पहचान बनाई है। हालांकि भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऑनलाइन लोकप्रियता और वास्तविक जनाधार में बड़ा अंतर हो सकता है। कई बार डिजिटल अभियानों को व्यापक चर्चा तो मिलती है, लेकिन वे जमीनी संगठन में परिवर्तित नहीं हो पाते।
यदि मुखिया के भारत आगमन के बाद आंदोलन गांवों, कस्बों, विश्वविद्यालयों और रोजगार से जुड़े मंचों तक पहुंचता है, तभी इसे वास्तविक मजबूती मिलेगी।
इस आंदोलन को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद भी सामने आए हैं। विभिन्न न्यायालयों और संस्थाओं में इससे जुड़े मामलों पर सुनवाई और बहस जारी है। ऐसे विवाद आंदोलन को चर्चा तो दिलाते हैं, लेकिन कई बार उसके मूल मुद्दों को पीछे भी धकेल देते हैं।
इसलिए भारत आगमन के बाद नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह आंदोलन को केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में बदल सके।
कथित कोकरोच पार्टी के मुखिया का भारत आना आंदोलन को तत्काल ऊर्जा, प्रचार और समर्थकों का उत्साह अवश्य दे सकता है। लेकिन किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके नेता में नहीं, बल्कि उन मुद्दों में होती है जिनके लिए जनता खड़ी होती है।
यदि यह अभियान युवाओं की समस्याओं को संगठित और रचनात्मक रूप से उठाने में सफल होता है, तो उसका प्रभाव बढ़ सकता है। अन्यथा यह भी अनेक डिजिटल अभियानों की तरह कुछ समय बाद चर्चा से बाहर हो सकता है।
सोचात्मक दृष्टि से कहा जाए तो किसी आंदोलन की मजबूती किसी एक व्यक्ति के आगमन से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, स्पष्ट उद्देश्य और निरंतर जनसंपर्क से तय होती है।
६ जनू के भारत आने के घोषणा के बाद वह परीक्षा में हुई धांधलियों और पेपर लीक के मुद्दों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए ऐलान से दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे? हालांकि अभी विपक्षी दलों से इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है। तो क्या विपक्ष यह देख रहा है कि इस आंदोलन से नीति तैयार की जाये या पीछे से अन्ना आंदोलन की तरह इसे समर्थन देते हुए वर्तमान सत्ता को हिलाया जाये?
पेपर लीक और परीक्षा धांधली! क्या निकलेगा समस्या का स्थायी समाधान?
देश में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षाएं करोड़ों युवाओं के सपनों का आधार हैं। जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है या धांधली की खबर सामने आती है, तब केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों मेहनती अभ्यर्थियों का विश्वास भी टूटता है।
पिछले कुछ वर्षों में अनेक भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। इससे परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं, परिणामों में देरी हुई और अभ्यर्थियों को मानसिक, आर्थिक तथा सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन कुछ लोगों की लालच और भ्रष्ट तंत्र की वजह से उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
सरकारों ने इस समस्या से निपटने के लिए कड़े कानून बनाए हैं। दोषियों की गिरफ्तारी, संपत्ति जब्त करने और कठोर दंड जैसे प्रावधान किए गए हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि बिना कठोर कार्रवाई के ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाना मुश्किल है। लेकिन केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रक्रिया को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जाए।
डिजिटल सुरक्षा, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र प्रणाली, परीक्षा केंद्रों की सख्त निगरानी, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और समयबद्ध जांच व्यवस्था जैसे कदम महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। साथ ही, पेपर लीक के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिए ताकि दोषियों को शीघ्र सजा मिल सके।
इस समस्या का एक सामाजिक पहलू भी है। जब नौकरी पाने के लिए गलत रास्तों को बढ़ावा मिलता है, तब ईमानदार प्रतियोगिता कमजोर पड़ती है। इसलिए समाज को भी ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ खड़ा होना होगा। शिक्षा और रोजगार व्यवस्था में नैतिकता तथा पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
पेपर लीक और परीक्षा धांधली का स्थायी समाधान तभी संभव है जब सरकार, परीक्षा एजेंसियां, प्रशासन और समाज मिलकर काम करें। युवाओं का विश्वास किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ गया तो देश की प्रतिभा और विकास दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए अब समय आ गया है कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी सुधारों के माध्यम से इस समस्या का स्थायी समाधान सुनिश्चित किया जाए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है


