रोहतक मुठभेड़: जब दरिंदों ने चलती गाड़ी से मासूम को फेंका, हरियाणा में क्यों असुरक्षित है ‘कल का भविष्य’?
अटल हिन्द ब्यूरो | रोहतक/पानीपत | 13 जून 2026
एक मां, जो थर्मल प्लांट में एक्सईएन (XEN) के रूप में हरियाणा की बिजली व्यवस्था को रोशन कर रही है, उसके अपने घर का ‘दीया’ शुक्रवार की शाम से बुझने की कगार पर था। पानीपत की उस कॉलोनी में सन्नाटा था, जहाँ कभी 12 साल के कबीर की किलकारियां गूंजती थीं। डेढ़ करोड़ की फिरौती, एक मां की तड़प, और पुलिस की गोलियों की गूंज के बीच शनिवार को जो हुआ, वह केवल एक ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’ नहीं था, बल्कि हरियाणा की उस बदहाल सुरक्षा व्यवस्था पर एक तमाचा था, जिसे हम ‘सुशासन’ कहते हैं।
वह भयावह मंजर: ‘माँ, मुझे बचा लो!’
शुक्रवार की शाम जब कबीर की मां सुनीता काम से लौटीं, तो घर का दरवाजा खुला था। कबीर नहीं था। उस मां की चीख, जो शायद बादलों तक पहुंची होगी, का जवाब एक ‘व्हाट्सएप कॉल’ ने दिया। सामने वाला न कोई फरिश्ता था, न कोई दोस्त; वह हैवान था। उसने डेढ़ करोड़ मांगे और कहा— “पैसा नहीं मिला, तो बच्चा घर नहीं पहुंचेगा।”
शनिवार को रोहतक के किलोई गांव के पास जब पुलिस ने घेराबंदी की, तो बदमाशों ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं। खुद को घिरता देख, उन दरिंदों ने 12 साल के मासूम कबीर को चलती गाड़ी से सड़क पर फेंक दिया। सोचिए उस बच्चे के मन में क्या बीती होगी? एक मां का जिगर का टुकड़ा, जिसे लालच की भूख ने कंक्रीट की सड़क पर रौंदने की कोशिश की। मुठभेड़ के दौरान चली गोलियों में भले ही दो बदमाश ढेर हुए, लेकिन कबीर के जख्म क्या कभी भर पाएंगे?
हरियाणा का ‘काले गलियारे’ में दम घुटता बचपन: एक आंकड़े की हकीकत
यह घटना इकलौती नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (NCPCR) की हालिया रिपोर्टें हरियाणा में बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं।
आंकड़ों का आईना: NCRB के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में हर साल औसतन 1,500 से 2,000 बच्चों के अपहरण के मामले दर्ज किए जाते हैं। इनमें से सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बरामदगी की दर तो उच्च है, लेकिन उन बच्चों का ‘मानसिक ट्रॉमा’ किसी सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता।
क्यों हो रहा है ऐसा?: समाजशास्त्री इसे ‘अपराध का व्यावसायीकरण’ मानते हैं। कबीर के मामले में जिस तरह उसके परिचित छात्र ने ही उसे भरोसे का वास्ता देकर जाल में फंसाया, वह बताता है कि हमारे आसपास का ताना-बाना कितना खोखला हो गया है।
सरकारी एजेंसियां और दावों की पोल: भले ही हरियाणा पुलिस ‘ऑपरेशन मुस्कान’ जैसे अभियानों का ढिंढोरा पीटे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिरौती के लिए अपहरण करने वाले गिरोह अब अत्याधुनिक तकनीक (जीपीएस, रेंटेड कार) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि हमारी पुलिसिंग अभी भी पारंपरिक तरीकों पर टिकी है।
‘अपनों’ की दगा और खोता भरोसा
इस पूरे कांड का सबसे काला सच यह है कि कबीर को ले जाने वाला कोई अनजान व्यक्ति नहीं, बल्कि परिचित था। यह आज के हरियाणा का कड़वा सच है—जहाँ पैसा सब कुछ हो गया है। सरकारी नौकरियों में ऊंचे पद पर बैठे माता-पिता को ‘एटीएम’ समझने की मानसिकता ने एक 12 साल के बच्चे को बलि का बकरा बना दिया।
पानीपत के थर्मल कॉलोनी से लेकर रोहतक के किलोई गांव तक का यह सफर, पुलिस के लिए एक मुठभेड़ थी, लेकिन कबीर के लिए यह जीवन-मृत्यु का वह खेल था जिसे वह उम्र भर नहीं भूल पाएगा।
क्या हम बच्चों को सुरक्षित रख पा रहे हैं?
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर बच्चे को ‘गरिमा के साथ जीने’ का अधिकार है। लेकिन जब सरकारी आंकड़ों में बच्चों के अपहरण का ग्राफ ऊपर की ओर भागता है, तो राज्य की संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। क्या सीसीटीवी कैमरे लगाना ही सुरक्षा है? या फिर उस सामाजिक ढांचे को ठीक करना जरूरी है, जहाँ एक छात्र अपने ही दोस्त को फिरौती के लिए बेच देता है?
अंत में एक सवाल…
पुलिस ने 2 पिस्टल और 2 चाकू बरामद किए हैं। बदमाशों को अस्पताल भेज दिया गया है, कबीर अपने माता-पिता की बांहों में है। लेकिन क्या अगले हफ्ते किसी और मां को फिरौती की कॉल नहीं आएगी? यह सवाल आज हरियाणा के हर उस नागरिक के मन में है, जो अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय आज भी कांप उठता है।
आंकड़ों की जुबानी—हरियाणा में ‘अपहरण’ का खौफनाक सच
बीते 36 महीनों (जून 2023 से जून 2026) के आंकड़ों पर नजर डालें तो हरियाणा में बच्चों और किशोरों के अपहरण की बढ़ती घटनाएं राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक अलार्म बेल की तरह हैं।
| अवधि | दर्ज मामले (लगभग) | मुख्य कारण |
| जून 2023 – जून 2024 | 1,840 | पारिवारिक विवाद, फिरौती, पलायन |
| जून 2024 – जून 2025 | 1,920 | गिरोहों द्वारा फिरौती, तस्करी |
| जून 2025 – जून 2026 | 2,150 | डिजिटल जालसाजी, निजी दुश्मनी |
क्या कहते हैं विशेषज्ञ: बाल अधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, अपहरण के 65% मामलों में पीड़ित के परिचित या दूर के रिश्तेदार शामिल होते हैं।
संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनी: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने अपनी हालिया समीक्षा रिपोर्ट में हरियाणा सरकार को ‘चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट्स’ को जिला स्तर पर और अधिक सक्रिय करने के निर्देश दिए हैं।
बरामदगी की दर: पुलिस के आधिकारिक दावों के अनुसार, राज्य में बरामदगी की दर 85% से अधिक है, लेकिन बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं प्रशासन की ‘प्रोएक्टिव’ (अपराध रोकने वाली) नीति पर सवालिया निशान लगाती हैं।
अटल हिन्द फैक्ट: पिछले 3 सालों में अपहरण के मामलों में लगभग 16.8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इनमें से 40% मामले केवल 12 से 16 साल के बच्चों से जुड़े हैं।
अटल हिन्द की मांग है: सरकार केवल अपराध के बाद ‘मुठभेड़’ न करे, बल्कि ‘इंटेलीजेंस’ को इतना मजबूत करे कि अपराध की साजिश का अंकुर ही न फूटे। हरियाणा को मुठभेड़ नहीं, सुरक्षित बचपन चाहिए।
इस खबर पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का पतन ही इस अपराध का मुख्य कारण है? अपनी प्रतिक्रिया हमें कमेंट्स में बताएं।


