वायरल वीडियो: सिविल ड्रेस में लाठी लिए लोग कौन? पुलिस कार्रवाई पर उठे जवाबदेही के सवाल
इस वीडिओ में देखिये -सिविल ड्रेस में मौजूद ये कौन थे? जो छात्रों पर लाठीचार्ज कर रहे है ,जब मौके पर मौजूद जज ,मजिस्ट्रेट ,या कोई अधिकारी होता है तो क्या उसे तब ये सब दिखाई नहीं देता जो पुलिस को निःहथे नागरिकों पर पुलिस उत्पीड़न का आदेश दे देता है क्यों ,
रिपोर्ट –राजकुमार अग्रवाल /नई दिल्ली
हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने पुलिस कार्रवाई और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में पुलिस बल के साथ कुछ ऐसे लोग भी दिखाई दे रहे हैं जो सिविल ड्रेस में हैं और उनके हाथों में लाठी जैसी वस्तुएँ नजर आ रही हैं। वीडियो में कथित तौर पर छात्रों पर बल प्रयोग होता दिखाई दे रहा है, जिसके बाद इस कार्रवाई की प्रकृति और इसमें शामिल लोगों की भूमिका पर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है।
वीडियो के आधार पर यह स्पष्ट रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती कि सिविल ड्रेस में दिखाई दे रहे लोग कौन हैं। वे पुलिस के सादे कपड़ों में तैनात कर्मी हैं, किसी अन्य सरकारी एजेंसी से जुड़े हैं या कोई अन्य व्यक्ति—इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि मौके पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट, एसडीएम, जिला प्रशासन का कोई अधिकारी या अन्य सक्षम अधिकारी मौजूद था, तो क्या उसे सिविल ड्रेस में मौजूद लोगों की भूमिका की जानकारी थी? यदि थी, तो उनकी तैनाती किस अधिकार और किस आदेश के तहत की गई थी? यदि जानकारी नहीं थी, तो ऐसी स्थिति कैसे बनी?
कानून-व्यवस्था की किसी भी कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या बल प्रयोग के दौरान शामिल प्रत्येक व्यक्ति की पहचान दर्ज की गई थी और क्या पूरी कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप की गई?
https://x.com/AtalHind/status/2082925980549591213?s=20
छात्रों पर कार्रवाई के दौरान सिविल ड्रेस में लाठीधारी कौन थे? वायरल वीडियो पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं में प्रशासन की ओर से स्पष्ट स्पष्टीकरण देना आवश्यक होता है, ताकि किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके। यदि वीडियो में दिखाई दे रहे लोग वास्तव में किसी अधिकृत ड्यूटी पर थे, तो उनकी भूमिका और अधिकारों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं यदि किसी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है।
फिलहाल संबंधित प्रशासन या पुलिस की ओर से इस वीडियो में दिखाई दे रहे सिविल ड्रेसधारियों की पहचान और भूमिका को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में घटना से जुड़े सभी तथ्यों का पता केवल आधिकारिक जांच या प्रशासनिक स्पष्टीकरण के बाद ही चल सकेगा।
उठ रहे प्रमुख सवाल:
वीडियो में सिविल ड्रेस में दिखाई दे रहे लोग कौन हैं?
क्या वे किसी अधिकृत सरकारी ड्यूटी पर तैनात थे?
यदि हाँ, तो उनकी तैनाती किस आदेश के तहत हुई?
क्या मौके पर मौजूद कार्यपालक मजिस्ट्रेट या अन्य अधिकारी को उनकी भूमिका की जानकारी थी?
क्या पूरी कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों के अनुरूप की गई?
क्या इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
नई दिल्ली जिले के DCP सचिन शर्मा ने एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (कार्यपालक मजिस्ट्रेट) के तौर पर कार्रवाई करते हुए बल प्रयोग के लिखित आदेश दिए थे।
मामले के मुख्य बिंदु:
आदेश किसने और किस जिले में दिए?
यह आदेश नई दिल्ली जिले का है। DCP सचिन शर्मा जंतर-मंतर पर मौजूद सबसे वरिष्ठ एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने BNSS की धारा 149 (पुराने CrPC की धारा 130) के तहत RAF और CRPF को आंसू गैस, लाठीचार्ज और असलहों (पेलेट गन या रबर बुलेट आदि) के इस्तेमाल का लिखित आदेश दिया। यह आदेश 20 जुलाई 2026 की शाम करीब 5 बजे दिया गया था, जब Cockroach Janata Party (CJP) के छात्रों का ‘चलो संसद’ मार्च चल रहा था।
किसके कहने पर आदेश दिए गए?
दस्तावेजों के मुताबिक, यह DCP सचिन शर्मा का अपना फैसला था, जो उस वक्त मौके पर मौजूद सबसे बड़े मजिस्ट्रेट अधिकारी थे। पुलिस रिकॉर्ड्स (GD/RAF कार्ड) में भी उनके ही दस्तखत दर्ज हैं। इसमें सीधे तौर पर किसी मंत्री या नेता का नाम सामने नहीं आया है (हालांकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं)। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर इलाके में धारा 163 (पुरानी धारा 144) पहले से लागू कर रखी थी।
क्या मजिस्ट्रेट मौके पर मौजूद थे?
हां, पुलिस दस्तावेजों में साफ दर्ज है कि DCP शर्मा खुद जंतर-मंतर पर मौजूद थे और सबसे वरिष्ठ मजिस्ट्रेट के रूप में आदेश जारी कर रहे थे।
उन्हें हालात की जानकारी कैसे मिली?
मौके की स्थिति (प्रदर्शनकारियों का बैरिकेड तोड़कर संसद की तरफ बढ़ना), पुलिस रिपोर्ट और खुफिया जानकारियों के आधार पर। क्योंकि मौके पर दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात थे, इसलिए सीधी जानकारी उनके पास आ रही थी।
क्या छात्रों (दूसरे पक्ष) का पक्ष सुना गया था?
इसकी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने छात्र नेताओं से बात की थी या नहीं। इस तरह के आदेश भीड़ को तुरंत हटाने और कानून-व्यवस्था संभालने के लिए दिए जाते हैं। कानून के तहत मजिस्ट्रेट को तुरंत फैसला लेने का हक होता है, लेकिन इसमें ‘कम से कम बल प्रयोग’ का नियम लागू होता है। फिलहाल पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हैं।
पहला पक्ष कौन था?
मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस का पक्ष था, जिसे भीड़ को नियंत्रित करना था। धारा 163 (धारा 144) लागू होने के बावजूद जब प्रदर्शनकारी संसद की तरफ बढ़ने लगे, तो यह कार्रवाई की गई।
अतिरिक्त जानकारी:
उस समय नई दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) आईएएस अधिकारी श्री सनी कुमार सिंह थे, लेकिन मौके पर भीड़ हटाने का आदेश DCP सचिन शर्मा (मजिस्ट्रेट शक्तियों के साथ) ने दिया।
घटना में लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट गन/रबर बुलेट के इस्तेमाल के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने SIT जांच के आदेश दिए हैं।
पुलिस का दावा: प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की और बैरिकेड तोड़े।
छात्रों का दावा: शांतपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल किया।
यह पूरी जानकारी सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स, पुलिस दस्तावेजों और कोर्ट की सुनवाई पर आधारित है। पूरे मामले की सटीक जांच रिपोर्ट आना अभी बाकी है क्योंकि मामला अदालत में है
यह समाचार सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और उपलब्ध दृश्य सामग्री के आधार पर उठ रहे सार्वजनिक प्रश्नों को प्रस्तुत करता है। वीडियो में दिखाई दे रहे व्यक्तियों की पहचान अथवा उनकी भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आधिकारिक जांच या प्रशासनिक बयान आने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।)

