क्या कानून की धाराएँ केवल चुनिंदा मामलों में जागती हैं?
नेताओं की भाषा, पुलिस की सक्रियता और लोकतंत्र में समान न्याय पर उठते सवाल
प्रधानमंत्री के सम्मान की रक्षा आवश्यक है, तो संविधान द्वारा प्रदत्त प्रत्येक नागरिक के सम्मान की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
यदि किसी के विरुद्ध अपमानजनक भाषा पर कार्रवाई होती है, तो वही कसौटी सभी नेताओं पर लागू होनी चाहिए।
यदि किसी मामले में पुलिस स्वतः संज्ञान लेती है, तो उसे हर समान प्रकृति के मामले में भी वैसी ही निष्पक्षता दिखानी चाहिए।
नई दिल्ली /31 जुलाई 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स /राजकुमार अग्रवाल
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। यहाँ संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है और कानून के समक्ष सभी को बराबर मानता है। लेकिन समय-समय पर कुछ घटनाएँ ऐसे सवाल खड़े करती हैं, जिनका जवाब केवल अदालतों या पुलिस के पास नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को देना होता है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने के आरोप में एक कार्यक्रम से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता स्मृति सिंह चंदेल द्वारा रुचिका सिंह के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराए जाने की खबर सामने आई। यदि किसी नागरिक या संगठन को लगता है कि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो शिकायत दर्ज कराना उसका वैधानिक अधिकार है। इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
लेकिन इसके साथ एक बड़ा और असहज प्रश्न भी खड़ा होता है—
इस घटना के बाद आम जनता, बुद्धिजीवियों और न्यायप्रिय नागरिकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे देश में कानून का शिकंजा सिर्फ चुनिंदा मामलों में ही तेजी से कसता है, और क्या न्याय की यह तराजू हर नागरिक के लिए एक समान है?
भाषणों में गाली-गलौज और नेताओं पर त्वरित पुलिस केस क्यों नहीं दर्ज होते?
भारतीय राजनीतिक मंचों पर नेताओं द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ अभद्र भाषा, व्यक्तिगत हमले और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग आम बात हो गई है। इसके बावजूद उन पर तुरंत पुलिस केस या एफआईआर दर्ज न होने के पीछे कुछ विधिक और राजनीतिक कारण हैं:
सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं द्वारा अमर्यादित भाषा और संज्ञान का अभाव
यह सवाल भी पूरी तरह जायज है कि जब देश के प्रधानमंत्री या अन्य सत्ताधारी व विपक्षी दिग्गज नेता चुनावी रैलियों या सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं के प्रति, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ या विशिष्ट संदर्भों में आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तब पुलिस, निर्वाचन आयोग या कोई राजनीतिक दल स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता?

जब आम जनता या प्रदर्शनकारी कोई गलत शब्द बोलते हैं, तो उसे तुरंत ‘संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस’ और ‘लोक शांति भंग करने का प्रयास’ मानकर कानूनी शिकंजा कस दिया जाता है।
आपराधिक मानहानि का प्रावधान: भारतीय कानून के तहत, यदि कोई नेता किसी अन्य राजनेता या व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है, तो पुलिस सीधे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर आम मामलों की तरह तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं करती। इसके लिए पीड़ित पक्ष या संबंधित व्यक्ति को भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष व्यक्तिगत शिकायत (Private Complaint) दर्ज करानी पड़ती है।
इसके विपरीत, जब बड़े नेता मंचों से ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उसे अक्सर “चुनावी बयानबाजी” या “राजनीतिक कटाक्ष” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। न्याय प्रणाली के इस दोहरे मापदंड ने ही आम आदमी के मन में कानून की निष्पक्षता को लेकर गहरे सवाल खड़े किए हैं।
संवैधानिक विशेषाधिकार और भाषण की स्वतंत्रता: राजनेता अक्सर अपने भाषणों को ‘राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दायरे में सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। जब तक बयान सीधे तौर पर हिंसा भड़काने की श्रेणी में न आए, तब तक पुलिस कानूनी पेचीदगियों और राजनीतिक दबाव के कारण हाथ डालने से बचती है।
क्या कानून की यही सक्रियता हर मामले में दिखाई देती है?
यदि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा पर तुरंत शिकायत दर्ज हो सकती है, तो क्या वही संवेदनशीलता उन सभी मामलों में भी दिखाई देती है, जहाँ राजनीतिक नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से तीखी, आपत्तिजनक या महिलाओं के प्रति असम्मानजनक भाषा के प्रयोग के आरोप लगते रहे हैं?
क्या नेताओं की भाषा कानून से ऊपर है?
भारतीय राजनीति में चुनावी भाषणों का स्तर वर्षों से चिंता का विषय रहा है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, अनेक अवसरों पर नेताओं ने एक-दूसरे के लिए कठोर, व्यक्तिगत और कभी-कभी अशोभनीय शब्दों का प्रयोग किया है।
सवाल यह नहीं है कि किस दल ने अधिक किया।
सवाल यह है कि—
क्या हर ऐसे मामले में पुलिस स्वतः संज्ञान लेती है?,क्या हर बयान पर समान कानूनी कसौटी लागू होती है?,या फिर कार्रवाई व्यक्ति, पद,,राजनीतिक प्रभाव और परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती है?,यदि कानून समान है, तो उसका व्यवहार भी समान दिखाई देना चाहिए।
महिलाओं के सम्मान पर दोहरे मापदंड?
सार्वजनिक जीवन में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक नेताओं के भाषणों को लेकर यह आरोप लगते रहे हैं कि उनमें महिलाओं के प्रति अनुचित या असम्मानजनक टिप्पणियाँ की गईं। कई बार ऐसे बयानों की आलोचना हुई, कई बार राजनीतिक विवाद भी हुआ।
यदि किसी भी नेता—चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो, सांसद हो, विधायक हो या विपक्ष का नेता—के कथित बयान महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाते हों, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उन मामलों में भी पुलिस शिकायतें उसी सक्रियता से दर्ज होती हैं?
क्या किसी अधिवक्ता, राजनीतिक दल या पुलिस ने हर ऐसे मामले में समान रूप से कानूनी कार्रवाई की माँग की?यदि नहीं, तो जनता के मन में समानता को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि कानून के समान अनुप्रयोग के पक्ष में है।
वकीलों की भूमिका और समाज के अन्य गंभीर मुद्दों पर चुप्पी
सुप्रीम कोर्ट की वकील द्वारा प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी पर त्वरित कानूनी कदम उठाने के बाद समाज में यह वाजिब सवाल उठ रहा है कि क्या प्रबुद्ध और स्वतंत्र अधिवक्ता केवल हाई-प्रोफाइल राजनीतिक मामलों तक ही सीमित हैं?
क्या सक्रियता हर अन्याय के विरुद्ध भी दिखाई देगी?
जब कोई अधिवक्ता किसी मामले में जनहित का हवाला देकर शिकायत दर्ज कराता है, तो समाज स्वाभाविक रूप से उससे व्यापक संवैधानिक प्रतिबद्धता की अपेक्षा भी करता है।
लोग पूछते हैं—क्या यही सक्रियता उन मामलों में भी दिखाई देगी जहाँ महिलाओं के साथ जघन्य अपराध हुए हों?क्या भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में भी इसी तरह कानूनी पहल होगी?क्या गंभीर अपराधों के आरोपों का सामना कर रहे नेताओं के विरुद्ध भी जनहित याचिकाएँ और शिकायतें दर्ज होंगी?क्या पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों वाले मामलों में भी समान कानूनी सक्रियता दिखाई देगी?इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की अपेक्षा व्यक्त करना है।
बलात्कारियों, हत्यारों और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ ढिलाई: क्या ये प्रबुद्ध वकील देश की उन बेटियों के लिए, जघन्य बलात्कार के पीड़ितों के लिए, और जनता के हजारों करोड़ रुपये लेकर विदेश भागने वाले आर्थिक अपराधियों के खिलाफ उतनी ही आक्रामकता से स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिकाएं या कड़ी कानूनी लड़ाई लड़ते हैं?
छात्रों पर लाठीचार्ज और पुलिसिया बर्बरता: देश के विश्वविद्यालयों या सड़कों पर जब निहत्थे छात्र-छात्राएं अपनी जायज मांगों, रोजगार या परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तब पुलिसिया लाठीचार्ज और दमनकारी कार्रवाइयों के खिलाफ कितने वकील अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं? ऐसे मामलों में अक्सर न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी हो जाती है कि पीड़ित न्याय की उम्मीद ही छोड़ देते हैं।
कानून की नजर में सब बराबर हैं—यह बात संविधान की प्रस्तावना में जितनी सुंदर दिखती है, जमीन पर उतनी ही धुंधली नजर आती है। एक स्वतंत्र और प्रबुद्ध अधिवक्ता स्मृति सिंह चंदेल या विधिक समुदाय की सार्थकता तभी सिद्ध होती है, जब उनकी कानूनी सक्रियता सिर्फ राजनीतिक या वीआईपी (VIP) चेहरों की मानहानि तक सीमित न रहकर, देश के आम नागरिक, शोषित वर्ग, प्रताड़ित छात्रों और न्याय के लिए दर-दर भटक रहे गरीबों की आवाज भी बने। जब तक न्याय व्यवस्था में यह संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक कानून के शासन पर से आम जनता का संदेह पूरी तरह दूर नहीं हो सकता।
अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक विमर्श और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित विश्लेषण है। इसमें किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। किसी भी आपराधिक या अन्य आरोप का अंतिम निर्धारण सक्षम न्यायालय या वैधानिक प्रक्रिया द्वारा ही होता है।)

